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सोमवार, 23 अगस्त 2010

रविवार से से साभार - डॉ.लाल रत्नाकर

संवाद

अखिलेश का मायालोक

सुप्रसिद्ध चित्रकार अखिलेश से पीयूष दईया की बातचीत

अखिलेश के छाया चित्रः सैय्यद हैदर रज़ा

akhilesh-painter

1.अखिलेश के चित्रकर्म में देसी व मार्गी का विभेद नहीं बल्कि एकत्व सत्यापित व परीक्षित है. उनके रंगलोक के वृत्तान्त में यह कहना बहुत कठिन है कि वे रंगों की मातृभूमि में कब नहीं थे. वहां रंगों में शास्त्रीय परिष्कार व गर्वीला ऐश्वर्य है तो विदग्ध लालित्य, ऐंद्रीय मांसलता व आंचलिक प्रांजलता भी. उनके वर्णपट की बहुलता का रागसिक्त रंगात्म अनन्य है पर मनुष्य-मात्र को सम्बोधित भी. रंगोंष्म सांसों से दीप्त व निनादित फलक-सतहों का सुघर विन्यास-चपल चमक लिये-रूपंकृत अन्तश्चेतना से आलोकित जान पड़ता है तो अविवक्षित से गर्भित नई अर्थाभाएं व रूपाकार ताल-दीप्त लयों से रचित होते हुए व्यंजक. मानो फलक-व्योम के अभेदाकाश की चित्रास्मिता में ऐसा प्रतीकित सम्बोध जो कहीं से भी परिभाषक एकरेखीयता से कभी भी अपना उपजीव्य संघनित नहीं करता. इस चित्र-बोध में यह स्वयं अस्ति है जो भव में है और यह स्वयं भव है जो अस्ति में है-यहां आध्यात्मिकता पार्थिवता के रेशों से बनी है तो यह पार्थिवता स्वयं में अनिवर्चनीय कामवत्ता से उदात्तीकृत व उन्मोचित है. आद्यन्त चित्र-चेतना में व्याप्त यह कामवत्ता चित्रोच्चारित ऋचाएं है-शृंगारिक खिलाव में विकीरित ऊर्जा जो रंगों में अवतरित होती है और बहुत बार उत्तप्त शिराओं की तरह फैली रेखाएं या कभी ऐसे रूपाकार जैसे विकल शुक्राणु. ऐसा धोखा होता है कि उनके चित्रों में व्याप्त कामवत्ता वह कस्तूरी-सुगन्ध है जिसे पाने की तलाश में चित्र है जिसमें कि विभिन्न रंगाकार मृग है : कभी समंजस-समरस कुलांचे भरते, कभी स्वछन्द. व्क्ताव्यक्त के भीतर यूं धड़कते-स्पन्दित जान पड़ते मानो अखिलेश के स्पर्श तले अपने सन्दर्भ की तलाश में हो जिसे पा लेना दरअसल कस्तूरी पा लेना है. तत्वत: चाक्षुष मूलधर्मिता में कुछ इस तरह से पल्लवित कि अद्वितीय रूप से वह अखिलेशमय है. दृष्टि का ऐसा समास जिसकी कीमियागिरी अपूर्वानुमेय है-पूरी तरह से समरस. कहना न होगा कि इस चित्र-संसार में रचनात्मक जोख़िम उठाने के बीहड़ में आत्माविष्कार की जादुई लिपि भी है. हर बार स्वयं को पुनर्नवा करती. चित्रकला की परम्परा में सम्भवत: पहली बार घट रही एक विरल घटना. पुरूष-ऊर्जा का आद्य सूक्त जहां स्त्रैण-ऊर्जा शायद अनाद्य है.


गोया अपने गर्भगृह में रहस्यदर्शी अदृश्य जड़ों को पोसते-सींचते हुए. नयनानन्दकर.

2.कभी सुना था कि माया, देवताओं की लीला है जिसमें वे Absolute को व्यक्त करते हैं. क्या माया अवकाश में खिंचे-measured out-इस सांयोगिक संसार को ही व्यंजित नहीं करती ? यह अवकाश हमें घेरे है और हम इसका एक अंश है. ''माया'' शब्द ''मा'' मूल से आया है जिसका अर्थ है पैमाइश करना-to measure. और इसलिए भी माया अनिर्वचनीय है कि यह पैमाइश सम्भव नहीं हो पाती होगी. जैसे कि लीला-लोक में एकमात्र अबोधगम्य बात यह है कि यह बोधगम्य है.


गोया अखिलेश के विमोहन.

3.हिन्दी के विलक्षण कवि-कथाकार शिरीष ढोबले की एक कहानी का समापन यूं होता है: ''...शायद, आनन्द का ही एक पृष्ठ हमने अब तक समझा नहीं है.'' औपनिषदिक उक्ति है : ''आनन्दाद्येव खल्विमानि सर्वाणि भूतानि जायन्ते. :: आनन्द से ही सब जीव जन्म लेते हैं.'' समकालीन कला-परिदृश्य में अखिलेश की अद्वितीय उपस्थिति एक विरल उपस्थिति है.


गोया वे आनन्द प्रस्तावित कर रहे हैं, अपनी चित्रलीला से नि:सृत.

4.फरवरी, दो हज़ार आठ के शुरू में अखिलेश के साथ उनके कृतित्व-व्यक्तित्व पर एकाग्र बातचीत का सिलसिला बनने लगा. यह बातचीत अभी जारी है. प्रस्तुत पाठ इसी असमाप्त वार्तालाप के मंगलाचरण से बना है.


यह पाठ वत्सल संदीपनिर्मल के लिए.


ऐसा लगता है कि मानवीय कल्पना के अभाव में कला का आविर्भाव नहीं होता. आपके यहां कल्पना का यह स्वभाव उस अनुभूति-उत्स से निर्धारित होता जान पड़ता है जो एक ऐसे लुकाछिपी के खेल में व्यवहृत है जहां उस सन्दर्भ को खोजना-पाना है जो विभिन्न रंगों या रंग-युतियों के दरमियान कहीं छिपा है भी और नहीं भी, सम्भवत:. ''नज़र से छिपे हुए'' के सन्दर्भ में रेने माग्रीत के वाक्य आपको दिलचस्प लगेंगे : What is visible can be hidden—a letter in an envelope, for example, is something visible but hidden, it isn’t something invisible. An unknown person at the bottom of the sea is not something invisible, it’s something visible but hidden.


अब अगर उपर्युक्त वाक्य को ऑस्कर वाइल्ड के इस वाक्य के बरक्स रख कर देखें : ''हम कितनी ही कोशिश क्यों न करें, चीज़ों के रूप के पीछे हम वास्तविकता को नहीं पकड़ सकते. इसका भयानक-सा कारण यह हो सकता है कि चीज़ों के अनुभव से अलग उनकी कोई अलग वास्तविकता नहीं है-सिर्फ़ उथले लोग यह कहते हैं कि चीज़ों को उनके बाहरी रूप से नहीं जाना जा सकता. दुनिया का असली रहस्य दृश्य में निहित है, अदृश्य में नहीं.''


क्या हम यह जान सकते हैं कि यह संदर्भ स्वयं में क्या है, जो कि एक चित्र-सत्ता में उजागर होता है या कि उसमें व्याप्त है ? क्या यह प्रतीकात्मक तरह से सन्दर्भ को उससे सम्बन्धित करना है जिससे कि यह वास्ता रखता है-belong करता है ? क्या यह विभिन्न रंग-युतियों को अनुभूत करने के विकल्पात्मक ढंगों में उतरना है या यह रंग-युतियों और स्वयं को अनुभूत करने के विकल्पात्मक ढंगों का प्रकार है ?

रेने माग्रीत और ऑस्कर वाइल्ड के उदाहरण दिलचस्प हैं. माग्रीत का उध्दरण एक चित्रकार का उदाहरण है जो लेखक के नजरिये से दिया गया है. ऑस्कर वाइल्ड का उध्दरण ऐसा उदाहरण है जो चित्रकार के नजरिये से दिया गया है. जिस visible और hidden की बात रेने माग्रीत कर रहे है वह एक तरह से हमारी पिछली चर्चाओं में आए हरे की ही बात है. माग्रीत हरे शब्द में छिपे हुए अर्थ की बात कर रहे हैं. यह अर्थ कई हो सकते हैं. ऑस्कर वाइल्ड सरफेस पर दिख रहा दृश्य ही सत्य है, कह रहे हैं. चित्रकला के सन्दर्भ में चित्र सत्य है.

चित्र का हिडन अर्थ नहीं है. जो आपके सामने है, वही उसका अर्थ है. उसके कोई सन्दर्भ नहीं है. चित्र का सन्दर्भ वह स्वयं है. जबकि रेने माग्रीत के उध्दरण में उनका इशारा इसकी तरफ़ है कि जो दिख रहा है उसमें कुछ छुपा है. जो दिख रहा है वह हरा शब्द है लेकिन इसका अर्थ छिपा हुआ है. यह दो दिलचस्प उदाहरण हैं. रेने माग्रीत के बारे में मैं ज़रूर थोड़ा कह सकता हूं, ऑस्कर वाइल्ड के बारे में जानता नहीं हूं तो नहीं कह सकता हूं.

माग्रीत ने अपने चित्रों में यह संकेत, कि जो दिख रहा है उसका अर्थ उसके अलावा है, उनके चित्रों के केन्द्र में रहा है. उनका प्रसिध्द चित्र लें. “The Treachery of Image" रेने माग्रीत पद और पदार्थ के भेद की ओर इशारा कर रहे हैं. रेने माग्रीत उस वस्तु की तरफ़ इशारा कर रहे हैं और उस चित्र में उसके छिपा होने की तरफ़ इशारा कर रहे हैं. वे अपने चित्र में पाइप ''चित्र'' को पाइप ''शब्द'' की तरह ले रहे हैं. उन्होंने चित्र और शीर्षक के सम्बन्धों को बदल दिया. चित्र और उसके शीर्षक का आपस में कोई सम्बन्ध नहीं है. यह जो दिख रहा है और जो शीर्षक है, उसकी अन्तस्सम्बन्धता को वे प्रश्नांकित करते हैं. स्वयं चित्र और उसके शीर्षक का आपस में कोई सम्बन्ध नहीं है. वे दो अनुभूतियों को दृश्य और शब्द के रूप में रखते हैं : यह वर्ण के रूप में मौजूद है. वर्ण रंग और शब्द के अर्थ में. वर्ण बैग का, वर्ण आकाश से कोई सम्बन्ध नज़र नहीं आता. दार्शनिक सन्दर्भ में अर्थ ढूंढने जाय तब शायद वह एक हो जाय. यह दिलचस्प उध्दरण है. जो दिख रहा है वह नहीं है बल्कि वह जो छिपा है, जो नहीं दिख रहा है, वह है. ऑस्कर वाइल्ड दूसरी तरह से सेजां की बात कह रहे हैं. जो दृश्य है, वही सत्य है; शेष का कोई अर्थ नहीं है.

सेजां का वाक्य स्मरण हो आता है कि चित्र-they are about themselves. तब क्या यह सन्दर्भ भी स्वयं के अपने बारे में है या चित्र के अपने बारे में होने को प्रकट करने में ? पहली स्थिति में यह स्वयं चित्र के भीतर ही है और दूसरी स्थिति में पहले यह चित्र से बाहर है और फिर उसमें अध्यारोपित होकर, उसका यानी चित्र का है. या शायद हम इस तरह से भी विचार कर सकते हैं कि -एक फूल की पंखुरियां, फूल नहीं है लेकिन उन पंखुरियों का एक खास तरह से मिलना-संयोजन-फूल है. एक फूल जिन पंखुरियों के एक खास सन्दर्भित संयोजन से फूल के रूप में अस्तित्ववान होता है उसमें उन पंखुरियों के उस विशिष्ट सन्दर्भ को खोज-पा लेना जिससे कि वे पंखुरियां मिलकर एक फूल-रूप बन जाती है. शायद यही वह बात है जिसे आप लुकाछिपी के खेल से अभिहित करना पसंद करते हैं. इसका मतलब दरअसल यह भी हो सकता है कि वह सन्दर्भ भी दरअसल चित्र-सत्ता के भीतर ही है. शायद उस रूपक की तरह जिसमें कस्तूरी मृग के भीतर ही है.

akhilesh painter

यहां सारे प्रतीकात्मक अर्थ झर चुके हैं. चित्र/रंग अपनी सत्ता में खड़ा है.

अखिलेश

यह दूसरा वाला ठीक है. मैं रंग या आकार का ऐसा कोई सन्दर्भ नहीं खोजता हूं जिसे दूसरे रंग या आकार के सन्दर्भ में लाना है. मेरा प्रयास दोनों के बीच के सम्बन्ध को उजागर करने का है. जैसे रेने माग्रीत बैग और आकाश के बीच के सम्बन्धों को उजागर कर रहे हैं. वे कोई सन्दर्भ नहीं खोज रहे हैं, न सन्दर्भ बना रहे हैं. वे सन्दर्भ पाते हैं. यह सन्दर्भो को पाना मेरी यात्रा का एक अंश हो सकता है जिसमें मैं इन नये सन्दर्भों को पाने की कोशिश कर रहा हूं. पहली बार मैं किसी एक रंग को किसी दूसरे रंग के सन्दर्भ में रख रहा हूं और इन दोनों का नया सन्दर्भ चित्र में पैदा हो रहा है. यह सन्दर्भ स्वयं उस चित्र का है.


इस अर्थ में यह ठीक जान पड़ता है कि यहां प्रतीक बनाने की कोशिश नहीं है. वह प्रतीक अपने में बन जाता है. स्वामीनाथन अपने चित्रों में यह करते रहे हैं. वे अपने चित्रों को शीर्षक देते हैं-sign becomes symbol. यह प्रतीक संकेत बन गया है. वह फिर से एक प्रतीक बन गया है. वह प्रतीक उसकी चित्रात्मक आभा है, जिसमें वह आलोकित है. उसके बाक़ी सन्दर्भ झर गये हैं. अब वह अपने सन्दर्भ में खड़ा है. सारे चित्रकार अपने को उसी तरफ़ बरतने की कोशिश करते हैं. जहां किसी एक प्रतीक का सहारा न लेते हुए वे उस प्रतीक के अपने सन्दर्भ का रास्ता खोजते या पाते हैं.


रज़ा के चित्र में रंग अपने सन्दर्भों से परे हैं. उनका सन्दर्भ वे स्वयं बन जाते हैं. रज़ा चित्रों का भूत या भविष्य नहीं बल्कि रंगों का वर्तमान चित्रित कर रहे होते हैं. मसलन इस चित्रण में लाल रंग की ऐसी सत्ता उजागर होती है जो सफ़ेद की तरह है. यह अद्भुत उपलब्धि है. आप रंग का एक नया सन्दर्भ उजागर कर लेते हैं या उद्धाटित कर देते हैं. यहां सारे प्रतीकात्मक अर्थ झर चुके हैं. चित्र/रंग अपनी सत्ता में खड़ा है.

अपनी मां के निधन के बाद जब रोलां बार्थ उनके छाया-चित्र देख रहा था तो वह उनके सांस्कृतिक सन्दर्भो या उसकी मां को सिर्फ़ एक नामात्मक व संख्यात्मक अस्मिता देने की प्रवृत्ति के उथलेपन से बहुत विचलित हुआ. वह लिखता है : It was not she, and yet it was no one else. I would have recognized her among thousands of other women, yet I did not ‘find’ her. I recognized her differentially, not essentially.


बार्थ के लिए यह एसेंस बिलकुल वैयक्तिक है-यह ''पाना व खोजना''. जैसा कि वह आगे लिखता है :
Since photography (this is its noeme) authenticates the existence of a certain being, I want to discover that being in the photograph completely, i.e. in its essence, “as into itself....' beyond simple resemblance, whether legal or hereditary.


फलत: यहां व्यक्ति को पूर्णत: कैप्चर करने की इच्छा है और इस बात का कोई संकेत नहीं है कि इस व्यक्ति को किसी और के सन्दर्भ में (इन रिलेशन टू एनीथिंग एल्स) समझा जाना है या नहीं. यहां शायद ध्यान देने वाला एक बिन्दु यह भी है कि अपनी मां के इन चित्रों में उन्हें असंतोष इस बात का था कि ये छाया-चित्र उनकी मां की केवल पहचान या फिर सादृश्यमूलकता को ही जगाते हैं, उसके सत्य को नहीं. क्योंकि अगर वे सत्य को जगाते होते तो वे सत्वभूत (essential) होते जिसे उन्होंने find से अभिहित किया है.


कहना न होगा कि मेरी जिज्ञासा का एक पहलू यह जानना भी है कि आपके लिए वह क्या है जिसे आपने पहले भी ''खोजना-पाना'' कहा है.


एक चित्र-कृति में जिसमें कि आप वांछित रंग-युतियों को बिठा लेने से/के जरिये वह सन्दर्भ पा लेते हैं तब वह सन्दर्भ क्या अपने में एक ऐसी सत्ता है जो इन रंग-युतियों से स्वतन्त्र खड़ी हो जाती हो ? या कि इन रंग-युतियों को पा लेना ही अपने में वह सन्दर्भ है ? तब इन रंग-युतियों के अपने सन्दर्भो का क्या होता है ? क्या ये वहां अपने में सन्दर्भ-रिक्त तरह से अस्तित्ववान है ?

जो रंग सन्दर्भ आप पा लेते हैं वही उसकी वास्तविकता है और वही उसका अभीष्ट है. वह सन्दर्भ जो दो रंगों के पास में आने से बना है, वही अभीष्ट है लेकिन यह उस चित्र के लिए ही अभीष्ट है. हो सकता है कि मैं उन्हीं दो रंगों से एक दूसरा सन्दर्भ अपने अगले चित्र में पा लूं. यह ऐसा मसला है जो एक ही चित्र के सन्दर्भ में काम करने वाला है-इसे दूसरे चित्र पर लागू नहीं कर सकते. एक चित्र की वास्तविकता व सन्दर्भ उस चित्र का अपना है. मसलन एक ही रंग या दो ही रंग से बने दो चित्रों के भीतर पैदा होने वाला स्पन्दन भिन्न है. दोनों अलग होंगे, दोनों की वास्तविकता भी अलग होगी. दोनों का कथ्य भी अलग हो सकता है जिसमें एक दूसरे में कोई साम्य न हो.


यह वास्तविकता का प्रश्न, चित्रात्मक वास्तविकता का है. यह उसी चित्र के सन्दर्भ में सही है, किसी अन्य चित्र के लिए उसे मापदंड बना लेना किसी हल की तरफ़ नहीं ले जाता.

क्या यह दरअसल एक ही साथ अपने में एसेंशियल भी है और डिफरेंशियल भी ?

डिफरेंशियल दूसरे चित्र के सन्दर्भ में और एसेंशियल वह अपने सन्दर्भ में है. अपनी मां के उदाहरण में रोलां बार्थ भौतिक रूप से उपस्थित शरीर और दार्शनिक अस्तित्व की बात कर रहे हैं. अन्तर/ डिफरेंशियल और अनिवार्य/एसेंशियल की बात दोनों के भीतर उनका भौतिक और दार्शनिक रूप से होना मौजूद है. उनकी मां का निधन हो चुका है. मां की उपस्थिति अब नहीं है. दूसरी तरह की उपस्थिति अनिवार्य नहीं है, वह हमेशा विभेदक है. चित्र के साथ ऐसा नहीं है. चित्र में आकार, रंग मौजूद है. आखिरी दम तक चित्र के नष्ट होने तक. चित्र में विभेदक और अनिवार्य दोनों उपस्थितियां मौजूद है.

akhilesh painter

सन्दर्भ से निर्बन्ध होना चित्रकार का प्रयास नहीं है. चित्र का उद्धाटित होना, उसका होना है.

अखिलेश


यह उध्दरण फ़ोटोग्राफ़ी के सन्दर्भ में ज़रूर रखा जा सकता है. फ़ोटोग्राफ़ के लिए ख़ुद रोलां बार्थ ने कहा है कि वह सन्दर्भगत/refferential है इसलिए कला नहीं है. उसका सन्दर्भ है और एक समय के बाद वह सन्दर्भ ख़त्म हो गया है. फ़ोटोग्राफ़ वही बना हुआ है, इससे उसकी वास्तविकता नष्ट नहीं हो रही. फ़ोटोग्राफ़ उतना ही वास्तविक है जितना उसके सन्दर्भ का न होना वास्तविक है. अन्तत: फ़ोटोग्राफ़ रेफरेंशियल है ही. रोलां बार्थ का कहना है कि किसी भी व्यक्ति में एक फ़ोटोग्राफ़ के प्रति जिज्ञासा तभी जाग्रत होगी जब फ़ोटोग्राफ़ का सन्दर्भ उसे पता चलता है. अगर सन्दर्भ नहीं पता है तब वह फ़ोटोग्राफ़ एक काग़ज़ का टुकड़ा मात्र है.

तब एक चित्रकृति का अपने सत्य तक या उसके नज़दीक तक आना क्या दरअसल उस रेफरेंशियल से निर्बन्ध हो जाने जैसा है ?

हां. मेरे खयाल से सन्दर्भ से निर्बन्ध होना चित्रकार का प्रयास नहीं है. चित्र का उद्धाटित होना-प्रकाश में आना-वही उसका होना है. जिसमें चित्र का कोई सन्दर्भ नहीं है, चित्र स्वयं अपना सन्दर्भ है.


चित्र की निर्मिति में प्रकृति का सन्दर्भ कुछ इस तरह का है जैसे एक पकवान बनाने के लिए आप सौ तरह के मसालों का इस्तेमाल करते हैं. मसालों का अपने में कोई एक सन्दर्भ है. जैसे ही मसाले पकवान में डलते हैं, वे उस पकवान के सन्दर्भ में अपने को उद्धाटित करते हैं. अब उनका अपना कोई सन्दर्भ नहीं बचा. जो सन्दर्भ पैदा हुआ है वह अन्य सारे अवयवों के साथ मिल कर बना है. वह पकवान में रस पैदा करता है. इन सारे सन्दर्भों का तिरोहित होना एक कलाकृति है. कलाकृति के रस का पैदा होना सन्दर्भ है. मसालों का अपना कोई सन्दर्भ अब नहीं बचा.


एक पकवान में नमक डला है तब नमक तिरोहित हो जाने वाला है. अपना स्वाद वह पकवान में छोड़ देगा. उस स्वाद से पैदा हुआ रस खाने वाले को मिलता है. दर्शक को मिलता है. अगर नमक नमक बना रहा तब खाना बेस्वाद हो जाएगा. उसमें रस नहीं पैदा हो सकेगा. यह सारे सन्दर्भ-जिन अवयवों का इस्तेमाल किया गया है वे-झर जाने वाले हैं. फिर ये मिलकर अपना एक नया सन्दर्भ पैदा करते हैं. यह सन्दर्भ कलाकृति में जन्म लेता है. वह सन्दर्भ उसी कलाकृति का है. किसी और कलाकृति के लिए वह काम नहीं करेगा.

तब क्या इसका मतलब यह है कि वह सन्दर्भ स्वयं में बहुल भूमिकाओं में है ?

बिलकुल ठीक. एक मनुष्य भी बहुल भूमिकाओं में है. वह अपने पिता होने, पुत्र होने, पति होने में ख़ुद को अलग अलग ढंग से बरतता है. अपने पिता के साथ वह किसी दूसरे पक्ष का इस्तेमाल नहीं करता है-वह वहां पुत्र के सन्दर्भ में ही होगा. ऑस्कर वाइल्ड का कहना कि ''असली रहस्य दृश्य में है, अदृश्य में नहीं,'' वह उस सन्दर्भ में एकदम ठीक है. एक अच्छा कलाकार उन अवयवों की मात्राओं पर ध्यान देता है. यहां उसका कारीगर का कौशल काम आता है. वह सही मात्रा में मिलाए गये मसालों से एक बेहतर रस पैदा कर लेता है.

इसका ताल्लुक़, उसके देखने में जो अवबोध अन्तर्निहित है, उससे भी बनता है ?

हां.


एक कलाकार पसंद नापसंद पर भी काम करता है. कलाकार उन रंग-योजनाओं को नहीं चुनता जो उसकी पसंद की नहीं हैं. वह उन्हीं रंग-योजनाओं को चुनता है जो उसके अपने स्वभाव से मेल खाती हो. हो सकता है कि ऐसा होना तात्कालिक हो.

आप एक चित्रकार के कला-संसार में Drawing/रेखा-चित्र/रेखांकन को किस तरह से लेते हैं ? ऐसे बहुत सारे चित्रकार है जिनके लिए रेखांकन अपने चित्र की पूर्व तैयारी के रूप में रहता है तो कुछ अन्यों के लिए यह असल में अपने अभी तक अज्ञेय चित्र में प्रवेश का एक रास्ता है जिसके मार्फत वे अपने चित्राकार की ओर संक्रमण करते हैं. लेकिन इन दोनों ही स्थितियों में ''रेखांकन'' की भूमिका एक तरह से माध्यम या जिसे हम निमित्त-मात्र कहते हैं, वह है. जबकि रेखांकन स्वयं में एक स्वायत्त सत्ता भी हो सकता है-किसी और चीज़ का निमित्त या साधन या एक औज़ार या महज़ रियाज़ से कहीं ज्यादा अपने में एक स्वतन्त्र कलाकृति. आपके लिए रेखा-चित्र क्या है ?


यह जिज्ञासा स्वत: जन्म लेती है कि क्या वे आपके चित्रों की आधार-सामग्री मात्र है-या इसके पीछे एक गहरी creative urge है ? और यह urge क्या आपके चित्र-कर्म का ही विस्तार या एक आयाम है अथवा उनसे बिलकुल भिन्न एक दूसरी अज्ञात ज़मीन ? भले ऊपरी तौर पर इन दोनों माध्यमों (चित्र और रेखांकन) में समानता और सार्धम्यता हों ?

मेरे लिए रेखांकन एक स्वायत्त सत्ता व स्वतन्त्र विधा है. चित्रकला के पूर्वाभ्यास या पूर्वतैयारी अथवा चित्रकला को समझने के उपक्रमों आदि से रेखांकन का सम्बन्ध नहीं है. रेखांकन पूर्ण रूप से गम्भीर माध्यम है. एक माध्यम बरतना समर्पण चाहता है. चित्र बनाने के लिए ख़ुद को तैयार करना होता है.


दरअसल दोनों स्वतन्त्र विधाएं हैं, स्वतन्त्र माध्यम है. दोनों की अपनी महत्ता है. दोनों को इस तरह से नहीं मिला कर देखा जा सकता कि एक दूसरे के लिए पूर्वतैयारी का निमित्त या औज़ार है. यथार्थवादी चित्रण या आकृतिमूलक काम में संलग्न चित्रकार भी रेखांकन को इस तरह से नहीं देख सकता. रेखांकन अपने में एक सम्पूर्ण विधा है. किसी भी स्तर पर रेखांकन का नैमित्तिक होना मुझे स्वीकार नहीं है. मैं रेखांकन को एक औज़ार की तरह नहीं देख सकता हूं.

यह अकादमिक स्तर पर हो सकता है. तब नहीं जब आप एक चित्रकार की तरह अपने को बरत रहे हैं. तमाम आदिवासी समुदाय रेखांकन में रत हैं. उन्हें क्या कहेंगे ? आदिवासी चित्रों को क्या कहेंगे कि यह चित्रों की पूर्व तैयारी है ?

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अकादमिक स्तर पर ज़रूर ऐसा हो सकता है लेकिन जब मैं कॉलेज में पढ़ रहा था तब भी ऐसा नहीं करता था कि एक मॉडल बैठा है जिसका पहले मैं ड्राइंग करूं, फिर चित्र करूं. यह मैं कभी नहीं करता था. हमें बताया जाता था कि पहले रफ स्केच कर लो ताकि संयोजन और चित्रकला के अन्य तत्वों पर पकड़ बन सके लेकिन यह उन के लिए है जो संयोजित नहीं कर पाते. मैं सीधे काम शुरू करता था. मुझे कभी रेखांकन को औज़ार बनाने की ज़रूरत नहीं महसूस हुई. रेखांकन अपने में सशक्त विधा है. वह अपने ढंग से अस्तित्ववान है. मैं स्वयं सालों से रेखांकन बनाता रहा हूं. यदि आप मेरे रेखांकन देखें तो वे सब अपने में स्वतन्त्र चित्र है. वे किसी चित्र की तैयारी में किये गये रेखांकन नहीं है. रेखांकन अपने में एक सम्पूर्ण कृति है.


पश्चिमी चित्रकला सीखने और करने में रेखांकन का एक और स्थान है जो कि चित्र की पूर्व तैयारी का है. यूरोप में ज़रूर यह प्रचलन में रहा है लेकिन स्कूल कॉलेज के स्तर पर ही कि अभ्यास-चित्र बनाते हैं. अभ्यास-चित्र के लिए रेखांकन करते हैं. रेखांकन से अपने चित्र को विकसित करते हैं. जो चाहिए और नहीं चाहिए उन सभी को रेखांकन के स्तर पर ही हटाते या रखते हैं. एक चित्रकार की तरह काम कर रहे होने में दोनों बराबर से महत्वपूर्ण है. सम्भवत: पहले शिक्षा का यही माध्यम रहा हो जहां स्कूल न होने से विद्यार्थी गुरू के पास रहकर काम करते और सीखते रहे. रेखांकन करना और चित्र बनाना मेरे लिए हमेशा दो भिन्न सौगातें रही हैं. रेखांकन के लिए बिलकुल अलग ही तौर तरीके चित्र बनाने से रहे आते हैं. इन दोनों को मिलाकर भी रखा जा सकता है.


मैं रेखांकन को चित्र बनाने के औज़ार की तरह नहीं देखता. न ही चित्र बनाने को रेखांकन करने का उद्दीपक. दरअसल इन दोनों को अलग कर देखने की दुविधा में मैं कभी रहा नहीं. इस प्रश्न के कारण पहली बार आप इन्हें दो माध्यमों की तरह देखते हैं किन्तु मेरे लिए कोई भी कमतर नहीं है. यह भेद कि मूर्तिकला और छापाकला या इनमें चित्रकला और रेखांकन अलग अलग है और एक दूसरे को करने के लिए औज़ार है ऐसा मैं नहीं देख पाता. कई मूर्तिकार यह कहते हुए मिल जाते हैं कि चित्रकला में कोई झंझट नहीं है चित्र बनाया, रोल किया ले चले और प्रदर्शित कर दिया मगर हमारे यहां हर काम में परेशानी. पत्थर काटने वाले को लाने से ले जाने तक. मुझे ऐसा नहीं लगता. परेशानी न चित्र बनाने में है न शिल्प में. यह सबमें आनन्द है. रस की उत्पत्ति आनन्द का कारण है. इसमें रमने का आनन्द है. मैं सांस्कृतिक चित्र नहीं बना रहा हूं. जो कि किसी एक संस्कृति की धरोहर है या उससे उपजे हैं. मैं चित्र बना रहा हूं जिसका रस सभी मनुष्यों के लिए समान रूप से उपलब्ध है.


इसमें मैं इस तरह का भेद करके नहीं चल रहा होता हूं कि मैं रंग लगा रहा हूं या रंग नहीं लगा रहा हूं. रेखांकन करते हुए भी रंगीन पेंसिल और रंगों का इस्तेमाल किया जा सकता है. चित्र और रेखांकन दोनों आपस में स्वतन्त्र विधाएं हैं.


मैंने रेखांकन इसलिए नहीं किये हैं कि मुझे अपना चित्र समझना है. मैंने रेखांकन बनाए हैं और वे स्वतन्त्र चित्र हैं. मेरी पहली चित्र-प्रदर्शनी रेखांकन की प्रदर्शनी थी. वह एक रेखा-चित्र था.

चित्रकारिता के जिन मूल्यों को आप सर्वोपरि मानते रहे हैं वे ही मूल्य क्या कमोबेश रेखांकन-विधा के लिए भी बने रहते हैं या इनमें फ़र्क़ हैं ?

मेरे लिए लगभग वे ही हैं. अन्तत: अपना संयोजन होता है. रेखांकन में भी वही होता है और चित्र में भी. सरोकार नहीं बदलेंगे. दृष्टि या स्वभाव नहीं बदलता है. माध्यम महत्वपूर्ण नहीं है जितना कि कथ्य. मैं रेखांकन कर रहा हूं या चित्र बना रहा हूं या सिल्क स्क्रीन में काम कर रहा हूं, इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता. मेरा लक्ष्य अपने देखने को बेहतर ढंग से रखने का है. चित्रकला के तीन प्रमुख तत्व है-रंग, रूप और रेखा : तीनों में मैं अपने को बराबर से बरतता हूं. कैनवास में भी वह रेखा, वह आकार, वह रंग मौजूद है जो रेखांकन में है. मेरे कैनवास पर लगभग रेखांकन बाहर नहीं होता. वह हमेशा मौजूद रहता है. रेखांकन से मेरे चित्रों में रूपाकार की गति तय होती है. मैंने कभी रेखांकन छोड़ा नहीं है-वह चित्र में भी दिखता है.

पढाई के दौरान बनाए गये रेखांकनों में अक्सर एक हिस्सा वह रहता है जिसमें आप पहले से रची किसी और कृति को (मिसाल के तौर पर लोकशिल्प को) उसके पूरे विवरण और विस्तार और तकनीकी बारीकियों में जानने-समझने-बूझने की कोशिश करते हैं-उन पर अपने रेखांकनों को बनाने के जरिये-मानो एक समर्पित विद्यार्थी. कि वह शिल्प अन्तत: किन घटकों से मिलकर बना है-मुझे रेखांकनों का यह प्रकार भी बहुत दिलचस्प लगता है क्योंकि एक ओर तो रेखांकनकार उस लोक-शिल्प को समझने के सिलसिले में उससे साझा करता है तो दूसरी ओर वह स्वयं अपने कलाकार को भी उस शिल्प के जरिये गढता है. ठीक वैसे ही जिसके लिए हम कह सकते हैं कि कैसे पारम्परिक व लोक समाजों में ''waste material'' की अलग से कोई धारणा नहीं रही है बल्कि वहां एक स्वरूप से ही दूसरे स्वरूप का जन्म उसी तरह होता चला जाता है जैसे पारम्परिक आख्यानों में कहानी में से कहानी निकलती चली जाती है-शायद यह उस चीज का एक पहलू है जिससे एक परम्परा बनती है.

ऐसे भी देखा जा सकता है : आदिवासी समुदायों के कलाकारों में रेखांकन का क्या Idea/आइडिया है ? उनके लिए रेखाचित्र का क्या अर्थ है ? क्या वह वास्तव में है ? या नहीं है ? या रेखाचित्र बनाने के पीछे उनका अपना क्या सोच है ?

जहां प्राकृतिक यथार्थवाद चित्रकला का विषय है वही पर रेखांकन का अभ्यास-चित्र के अर्थ में महत्व मौजूद है. अन्य जगहों पर रेखांकन उतना ही सहज सरल माध्यम है जिसमें कोई भी चित्रकार अपने को बरतता है. जब एक यथार्थवादी चित्र बनाने की चेष्टा होती है-हमारे सारे चित्रकला महाविद्यालयों के पाठयक्रम में यह है-तब हम रेखांकन को इस तरह से घटा कर देखते हैं कि वह चित्र बनाने की पहले की स्थिति है. दुनिया भर के तमाम आदिवासी समुदायों में यह विचार काम नहीं करता. चाहे अफ्रीका हो या हिन्दुस्तान. आदिवासी चित्रकार के लिए रेखांकन एक स्वतन्त्र विधा व महत्वपूर्ण माध्यम ठीक उसी तरह है जिस तरह कि उन चित्रकारों के लिए जो यथार्थवादी शैली में काम नहीं करते. जिन कलाकारों के लिए प्रकृति का यथार्थवादी चित्रण ही चित्रकला है, वही रेखांकन को अभ्यास-चित्र या नैमित्तिक ढंग से बरतते हैं शेष सारी जगहों पर ऐसा नहीं होता होगा. रेखांकन को इस तरह से घटा कर देखना अविनय है. यह दृष्टि साफ़ होनी चाहिए कि हम किसी एक मापदण्ड से किसी एक माध्यम को कहीं जमा तो नहीं कर रहे.

akhilesh painter

मेरे चित्र विचार से नहीं बनते हैं, न मैं उनमें किसी विचार को आने देता हूं.

अखिलेश

हमारी बातचीत में कला के पाठयक्रमों का सवाल उठना एक और महत्वपूर्ण मोड़ है.

चित्रकला में किसी तरह का शिक्षण सम्भव नहीं है. चित्रकला का पाठयक्रम बन सके, ऐसा सम्भव नहीं है. एक ऐसा माहौल ज़रूर खड़ा किया जा सकता है जिसमें एक व्यक्ति चित्रकला के स्पन्दन को जान, देख व सुन सके, महसूस कर सके. यह चित्रकला को जानने-देखने-करने का पाठयक्रम बन सकता है. अन्यथा कोई किसी को चित्रकला सीखा नहीं सकता. किसी भी पाठयक्रम से कोई भी व्यक्ति चित्रकला नहीं सीख सकता है. इसका उदाहरण बहुत तरह से हम देखते हैं. कला विद्यालयों से निकलने वाले कितने छात्र कलाकार बनते हैं ? यह प्रतिशत लगभग शून्य है. चित्रकार बिलकुल ही अलग रास्ते से आता है. फिर इसमें आदिवासी कलाकारों को कहां रखेंगे ? क्या उन्हें कलाकार मानने से इनकार किया जा सकता है ? ऐसी बहुत सारी बातें हैं. मुझे नहीं लगता कि पाठयक्रम चित्रकला के लिए या चित्रकार बनने के लिए सहायक अंग है.

आपके कुछ रेखांकनों को देखकर ऐसा लगता है जैसे स्याही ने इन आकारों संग ब्याह रचा लिया हो. यह एक वर्णी काला क्या अपार्थिव को उजागर कर रहा है ? या शून्य या ऐन्द्रियता का अनुभव-अवकाश में मनुष्य ? क्या यह उस पहली भाषा को पाने का प्रयत्न है जिसके जरिये संसार अनुभूत किया गया-चेतना की आरम्भिक निर्मितियां ? आद्यावस्था से सम्बन्ध की खोज ? चेतना के नये रूपों की ओर बढ़ना-जिनके लिए आपने कहा था कि वे अपरिचित इसलिए है क्योंकि पहली बार एक चित्र-कृति में उजागर हो रहे हैं-क्या स्मृति-कर्म से निपजता है जिसे Hegel/हीगल recollection से अभिहित करते हैं ? मुझे ध्यान आता है कि आप universal memory पर भी बात करते रहे हैं.

मेरे चित्र विचार से नहीं बनते हैं, न मैं उनमें किसी विचार को आने देता हूं, न मैं ये सारी चीज़ें सोच कर चित्रित करता हूं. मैं एक खेल शुरू करता हूं और ख़ुद उसमें शामिल हो जाता हूं. परिणामस्वरूप वह चित्र होता है. जब खेल से बाहर निकलता हूं तब मेरे सामने एक चित्र होता है. ये सारे attempt मेरे बिलकुल नहीं होते. इनमें से कुछ भी मैं attempt नहीं करता हूं. न चेतना के स्तर पर, न विचार के स्तर पर.

अपने रेखांकन-कर्म में आपका प्रयास वही है जो आपके चित्रों में है ?

हां. वही है.

अपने पूर्ववर्तियों से एक कलाकार अपना एक सम्बन्ध बनाता है. आपके हाल के दौर के रेखांकनों से और आपकी कुछ चित्रकृतियों के आकारों से गुजरने पर मुझे अनेक स्थलों पर कभी पॉल क्ले से मुलाक़ात हो जाती है, कभी आदिम कृतियों से. पॉल क्ले के साथ आप किस तरह का सम्बन्ध महसूस करते है ?

मेरा यह मानना है कि मैं एक ऐसे परिवार का सदस्य हूं जिसमें सारे चित्रकार शामिल है. लियोनार्दो दा विंची से लेकर स्मृति दीक्षित तक. इन सबसे मैं कुछ समझते-सीखते, देखते -परखते हुए ही अपनी चित्र समझ का परिष्कार करता हूं. सचेतन तौर पर मैं कुछ भी attempt नहीं करता हूं. सो पॉल क्ले भी attempt नहीं करता हूं या कोई और चित्रकार.


यह बात ज़रूर है कि इस चित्रित संसार से मैं बहुत ज्यादा प्रभावित/obsessed हूं. वे आ जाते होंगे पर सायास नहीं. अनायास अवचेतन में बैठे हैं, आ गये हैं और बाद में ऐसा देखते हैं, ठीक है. इसको आप मिटाते नहीं है. छोड़ते या हटाते नहीं है. मैं अपनी परम्परा से ही सारा कुछ जान समझ रहा हूं और उसी से मेरा सामना होता रहता है. ऐसे बहुत सारे चित्रों में, किसी न किसी का प्रभाव, दिख सकता है.

प्रभाव या सार्धम्यता नहीं, काव्यात्मक अनुगूंजें : मेरा संकेत व आशय इस ओर है. इन दिनों आप कृष्णमूर्ति व डेविड बॉम के बीच की बातचीत भी पढ़ रहे हैं.

यह किताब पढ़ते हुए मुझे बहुत आनन्द आ रहा है. किताब में कृष्णमूर्ति यह बता रहे है कि मनुष्य की एक Universal Memory है. और यह मनुष्य की वैयक्तिकता में बिला जाती है. खो जाती है. मुझे लगता है कि Universal Memory की ओर कृष्णमूर्ति का इशारा दरअसल कलाओं में नज़र आता है. संगीत-चित्र-नाटक-काव्य में उनका गुंफन, उनकी अनुगूंज सुनायी पड़ती, दिखायी पड़ती है. हो सकता है कई बार यह कलाकारों की सचेतन कोशिश हो और कई बार अवचेतन से आती हो. या इस यूनिवर्सल मेमोरी के कारण आ जाती हो. कृष्णमूर्ति का वह विचार दिलचस्प है जिसमें वे Universal Memory की बात कर रहे है. और Individuality/वैयक्तिकता को इतनी तवज्जो नहीं है. अभी पूरी किताब पढ़ी नहीं है, पढ़ रहा हूं.


मुझे लगता है कि सारी कलाओं का आपस में जो सम्बन्ध नज़र आता है वह यूनिवर्सल मेमोरी के कारण ही नज़र आता होगा. पॉल क्ले के बहुत सारे चित्रों में भीमबैठका के चित्रों की अनुगूंजें नज़र आती हैं. या स्वामीनाथन के चित्रों में. पिकासो के ऐसे कई चित्र हैं जो प्रागैतिहासिक काल में किये गये चित्रों की याद दिलाते हैं. इसका मतलब यह बिलकुल नहीं है कि पिकासो ने उनकी नक़ल की. वह अपनी उस यूनिर्वसल मेमोरी के बहुत नज़दीक पहुंच गया जहां पर उसने भीमबैठका के चित्रकार की तरह अपने को बरता. यही सम्बन्ध नज़र आता है. जैसे कोई गायक गा रहा होता है और आप को उस्ताद की याद आ जाती है.

क्या उसके केन्द्र में चेतना है ?

मुझे नहीं लगता कि यह चेतना का काम है. चेतना वहां पर अवचेतन तरह से है. आप जान कर नहीं कर सकते है, जान कर नक़ल कर सकते है. नकल में रस पैदा होने वाला नहीं है. जो हो चुका है उसको रचने में मजा नहीं है. रस नहीं है इसलिए रचते भी नहीं है. आप अपने ढंग से अपने को बरतते है. इसमें चेतना का कोई स्तर नहीं है.

तब वह क्या है जो पॉल क्ले और भीमबैठका के चित्रों को एक कर देती है ?

akhilesh painter

सभी कलाओं के प्रकटन में यह सम्भावनाएं है कि वे Universal Memory के नज़दीक जा सके.

अखिलेश

वह Universal Memory है.

यह चेतना-तत्व नहीं है ?

वह कैसे हो सकता है ? वह चित्रित करते वक्त क़ैसे हो सकता है ? मान लीजिए, भीमबैठका का चित्रकार चित्र बना रहा है तब वह अपनी शुरुआत ऐसे कर सकता है कि मुझे चित्र बनाना है, यह चेतना है उसकी. शुरू में एक चेतना से चित्रांकन कर रहा है पर जब वह आनन्द में चित्र बना रहा है तब ऐसा कुछ उसके पास है नहीं जिस पर वह दावा कर सके. चेतना से चित्रित करने का अर्थ यह है कि एक चित्रकार अपने जीवन में सौ कलाकृतियां बनाए और सभी विलक्षण/अद्वितीय हो. ऐसा दिखाई नहीं देता है. लियोनार्दो अपने पूरे रचनाकाल में ''मोना लिसा'' एक ही बना पाते है.

Universal Memory वह है जो पॉल क्ले और भीमबैठका के चित्रों के आपसी सम्बन्धों को.....

यह Universal Memory पशुओं में ज्यादा दिखाई देती है. मनुष्य में नहीं दिखाई देती. एक मुर्गी के बच्चे को यह ज्ञान या बोध है कि चील दुश्मन है. यह उसकी कौन सी है स्मृति है ? यहां Universal Memory काम कर रही है. एक हिरण के बच्चे को मालूम है कि शेर दुश्मन है. उसे कोई बता नहीं रहा है. मनुष्य के नामकरण संस्कार के साथ ही उसका वैयक्तिक होना शुरू हो जाता है. उसकी ''पहचान'' उसका संकट बन जाती है. वह अपनी Universal Memory से दूर होता चला जाता है.


सभी कलाओं के प्रकटन में यह सम्भावनाएं है कि वे Universal Memory के नज़दीक जा सके. यह सभी के लिए बराबर है. सभी के लिए एक है.

चित्र-फलक के रूप में कैनवास के अलावा आपने हाथ-काग़ज़ को भी फलक व माध्यम के बतौर लिया है. जब आपने अपने चिरपरिचित, आजमाए हुए व बरते गये माध्यम कैनवास व रंगों से बाहर आकर काग़ज़ व अन्य रचना-सामग्री को अपनी सर्जना का आधार बनाया (-सम्भवत: एक बार फिर अपनी चित्रभाषा, शैलीगत पहचान व रूपाविष्कृतियों के व्याकरण से बिलकुल बाहर आकर एक नयी जमीन तोड़ी, न केवल माध्यम व मटीरियल के स्थूल व तकनीकी मगर सारभूत अभिप्रायों में, बल्कि अपनी समस्त रूप-दृष्टि के अर्थ में भी-लेकिन इन बिन्दुओं पर बाद में.) तब सबसे पहले इसका विचार आपके मन में कैसे जगा ? इसके पीछे किस तरह की कलात्मक ज़रूरतें, तत्व व कारण सक्रिय रहे ? एक माध्यम/फलक का/में यह रचनात्मक उत्खनन-जिससे कई चित्र-कृतियों का जन्म हुआ-किस प्रकार का रहा ?


रूप-गोठ का खेल बड़ा दिलचस्प रहा होगा. मसलन आप फलक पर एक कौडी रखते है और हो सकता है वह आंख में बदल जाय. अब एक कौडी का यह जो आंख में का कायान्तरण है या यह जो एक नया स्वरूप ले लेना है-उसे आप अपनी दृष्टि के सन्दर्भ में किस तरह से लेते है ?


जिन वस्तुओं को अपने कोलाजों के लिए आपने चुना है उसमें स्वयं उन वस्तुओं की अस्मिता को अक्षुण्ण रखते हुए उन सभी के परस्पर संयोजन से चित्र-कृति की निष्पत्ति हो सके, इस ओर आपका ध्यान रहा या फ्लक पर रखते ही इनके आपसी सहवर्तित्व से स्वयं इनकी बध्द अस्मिता के झर जाने के चमत्कार का भी. बल्कि यह देखना भी दिलचस्प है कि फलक से बाहर उस कौडी की पहचान उसके अपने कौडी होने में पूरी है लेकिन यही कौडी जब फलक पर आती है तो इसकी अर्थवत्ता अन्य चीज़ों के संग होने पर ही निष्पादित होती है-ऐसा धोखा होता है कि यहां वह अपने इस परिवर्तित स्वरूप के लिए अन्योन्याश्रित है. लेकिन शायद यह एक अधूरा सच है क्योंकि जैसा कि आपने बहुत सुंदर तरह से यह बताया था कि दरअसल हर रंग में हर रंग छिपा है. यह मुझे अचम्भित करता है कि कैसे फलक पर ये सभी चीज़ें अपनी आपसी सापेक्षता में होने मात्र से-एक अर्थ में स्वयं-सत्ता का आत्मोत्सर्ग करके-चित्र-सत्ता को जीवन देती है. मानो सभी अपनी पहले की सीमित इयत्ता की आहुति दे, एक नये स्वरूप में खिल आने के लिए. एक चित्र-कृति की निर्विकल्पक उपस्थिति में जहां फिर से वह कौडी एक नये स्वरूप में इस तरह से सांस ले रही है कि वहां उसकी इयत्ता दूसरी वस्तुओं के सन्दर्भ से भी आलोकित है और स्वयं के होने से भी.


फिर एक जिज्ञासा यह भी है कि अपने कोलाजों के लिए जिन वस्तुओं का आपने चयन किया उसके पीछे कौन से तत्व प्रमुख रहे ? चुनाव के पैमाने व मापदण्ड ? मसलन जब आप कौडी या चश्मे चुन रहे थे तब क्या मन में कहीं यह पूर्वाभास था कि यह कौडी चित्र में किस या किन तरहों का स्वरूप ले सकती है ?


-आपने हाथ-काग़ज़ भी स्वयं ही बनाए थे, ज़रूर इसके पीछे भी कुछ तत्व काम कर रहे होंगे.


-यह बात भी मुझे सूझती है कि इनके आकार बड़े नहीं रहे.


-और फिर आपके इन कोलाजों में फलक सहित हर वस्तु स्वयं में एक रंग-उपस्थिति भी है. बल्कि वे बहुल भूमिकाओं में हैं.
आपसे रूप-गोठ के इस रहस्यमय खेल के बारे में जानना चाहूंगा.


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GHAZIABAD, Uttar Pradesh, India
कला के उत्थान के लिए यह ब्लॉग समकालीन गतिविधियों के साथ,आज के दौर में जब समय की कमी को, इंटर नेट पर्याप्त तरीके से भाग्दौर से बचा देता है, यही सोच करके इस ब्लॉग पर काफी जानकारियाँ डाली जानी है जिससे कला विद्यार्थियों के साथ साथ कला प्रेमी और प्रशंसक इसका रसास्वादन कर सकें . - डॉ.लाल रत्नाकर Dr.Lal Ratnakar, Artist, Associate Professor /Head/ Department of Drg.& Ptg. MMH College Ghaziabad-201001 (CCS University Meerut) आज की भाग दौर की जिंदगी में कला कों जितने समय की आवश्यकता है संभवतः छात्र छात्राएं नहीं दे पा रहे हैं, शिक्षा प्रणाली और शिक्षा के साथ प्रयोग और विश्वविद्यालयों की निति भी इनके प्रयोगधर्मी बने रहने में बाधक होने में काफी महत्त्व निभा रहा है . अतः कला शिक्षा और उसके उन्नयन में इसका रोल कितना है इसका मूल्याङ्कन होने में गुरुजनों की सहभागिता भी कम महत्त्व नहीं रखती.