ममी से मिला कैंसर का प्रमाण
बुधवार, 2 मई, 2012 को 02:36 IST तक के समाचार

लगभग तीन हजार साल पुराने ममी पर किए गए शोध से पता चला है कि लोगों की मौत कैंसर जैसे बीमारी से होती थी.
जो लोग मानते हैं कि कैंसर हाल-फिलहाल की बीमारी है, उन्हें यह कहने से पहले अब कई बार सोचना होगा.
डॉक्टरों को इस बात के प्रमाण मिले हैं कि कैंसर जैसी बीमारी से लोग पहले भी मरते रहे हैं. डॉक्टरों के एक दल ने करीब 2900 साल पुरानी एक ममी पर शोध करने के बाद पाया है कि मिस्र के एक आदमी की मौत कैंसर जैसी बीमारी से हुई थी.
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डॉक्टरों का यह भी कहना है कि जिस वक्त उस व्यक्ति की मौत हुई थी, उस वक्त वह मधुमेह से पीड़ित था और उसकी उम्र बीस वर्ष के आस-पास रही होगी.
स्पष्ट निशान
"पुराने समय में यह बीमारी बहुत ही घातक थी, लेकिन आजकल इसका इलाज संभव है"
ममी का अध्ययन कर रहे चिकित्सा दल के प्रमुख डॉक्टर मिशलाव काव्का
प्राचीन काल के उस ममी के शरीर पर एक स्पष्ट निशान भी है जिससे पता चलता है कि मौत से पहले उनकी क्या हालत हुई होगी और उनकी मौत कितनी घातक रही होगी.
यह ममी इस वक्त क्रोशिया में जागरेब विश्वविद्यालय के संग्रहालय में रखी है.
ममी का अध्ययन कर रहे चिकित्सक दल के प्रमुख और जागरेब विश्वविद्यालय के डॉक्टर मिशलाव काफ्का का कहना है, “ऐसा लगता है कि उस बीमारी ने उस व्यक्ति की हड्डी और अन्य दूसरे नाजुक (टीशू) को बुरी तरह प्रभावित कर दिया था.”
डॉक्टर काफ्का ने लाइव साइंस पत्रिका को बताया, “हम उनके उपर किए गए शोध के आधार पर कह सकते हैं कि यह एक प्रकार का कैंसर है.”
पुरूषों में थी बीमारी
हालांकि डॉक्टर अभी भी बीमारी की वजह को लेकर बहुत आश्वस्त नहीं हैं, लेकिन उनका मानना है कि यह बहुत ही असामान्य बीमारी है. डॉक्टरों के अनुसार यह बीमारी पांच लाख साठ हजार लोगों में से किसी एक व्यक्ति, खासकर किसी पुरूष में पाई जाती है.
डॉक्टर काफ्का का यह भी कहना है, “पुराने समय में यह बीमारी बहुत ही घातक थी, लेकिन आजकल इसका इलाज संभव है.”
पहले माना जाता था कि ममी के रूप में रखा गया यह ताबूत कारसेत नामक महिला का है जिसे लगभग 2300 वर्ष पहले वहां लाया गया था.

अलग-अलग समय में तीन ममी पर किए गए शोध से पता चला है कि पहले भी कैंसर की बीमारी होती थी
लेकिन काफ्का और उनके सहयोगी डॉक्टरों ने ममी का अध्ययन करने के लिए एक्स रे, सीटी स्कैन, एमआरआई और अन्य विकसित तकनीक की मदद से यह निष्कर्ष निकाला कि वह पुरूष है.
ममी का स्कैन करने के बाद पता चला कि इसकी खोपड़ी में बहुत बड़ा छेद हो गया है और एक आँख के सॉकेट को काफी क्षति पहुंची है.
प्रमुख शोधकर्ता डॉक्टर काव्का
"जब वह मरा होगा तो वह प्यासा रहा होगा, भूखा भी होगा और हो सकता है कि उसे पेशाब भी लगा हो"
शोधकर्ताओं का कहना है कि हो सकता है कि शव को ममी बनाने के दौरान लेप करते समय शरीर को नुकसान पहुंचा हो.
मधुमेह से पीड़ित
उसके अलावा वह मधुमेह से भी परेशान रहा होगा. स्कैन रिपोर्ट से पता चलता है कि ममी के पीयूष ग्रंथि का भाग छिछला हो गया है. इसका मतलब यह भी है कि पीयूष ग्रंथि को भी बीमारी से नुकसान पहुंचा था.
प्रमुख शोधकर्ता डॉक्टर काफ्का के अनुसार, “जब वह मरा होगा तो वह प्यासा रहा होगा, भूखा भी होगा और हो सकता है कि उसे पेशाब भी लगी हो.”
वैज्ञानिकों के बीच इस पर लंबे समय से बहस होती रही है कि प्राचीन काल में कैंसर की बीमारी थी या नहीं. पहले वैज्ञानिकों का मानना था कि जिन्दगी के अंतिम दिनों में प्रदूषण से यह बीमारी होती थी.
पुरानी बीमारी
वैसे कुछ वैज्ञानिकों का मानना था कि कैंसर की बीमारी तो होती ही थी लेकिन ये पता लगाना बहुत मुश्किल था कि यह बीमारी कैंसर ही है.
शोधकर्ताओं के मुताबिक यह प्राचीन मिस्र का तीसरा व्यक्ति है जिसमें कैंसर से उनके मरने का प्रमाण मिला है. डॉक्टर काफ्का का कहना है कि उस वक्त भी यह बीमारी आज की तरह उतनी ही मारक रही होगी.
इस तरह रंग और शब्द दोनों के मर्म को जानने के साथ ही उन्होंने संगीत के स्वरों को भी समझा। कथकली की कई मुद्राओं को उन्होंने एक कलाकार की दृष्टि से आत्मसात किया। इसी बीच एक दिन मद्रास के एक अखबार में तैलरंगों का एक विज्ञापन छपा। यह माध्यम उनके लिए नितांत अपरिचित और चुनौतीपूर्ण था। चाचा राजा-राजा रवि वर्मा ने अपने युवा भतीजे के लिए तैलरंगों को उपलब्ध कराया, लेकिन दिक्कत ये थी कि वे उसके इस्तेमाल की तकनीक से नितान्त अनभिज्ञ थे। उन्होंने त्रावणकोर के दरबार में पोर्टे्रट (व्यक्ति चित्र) बनाने के लिए आए एक ब्रिटिश चित्रकार थियोडोर जेनेसन से आग्रह किया कि वे उन्हें तैल रंगों में काम करने की तकनीक का प्रशिक्षण देने की अनुकम्पा करें, लेकिन जलरंग में राजा रवि वर्मा द्वारा किए गए काम को देख कर वह यह जान चुका था कि इस ऐसी अदम्य इच्छा से भरे प्रतिभाशाली युवक को तैलरंग का उपयोग सिखाना स्वयं के लिए एक खतरा मोल लेना होगा।
दरअसल, यह वह कालखण्ड था, जब औपनिवेशक सत्ता के विरुद्ध एक धीमी लपट लगभग सारे देश में उठ रही थी, क्योंकि भारतीयों को लग रहा था कि वे ब्रिटिश साम्राज्यवाद के शिकंजे में फंसकर अपनी अस्मिता खो रहे हैं। भारत की भव्य और विराट परम्परा पर वक्त की धूल जमती जा रही है।निश्चय ही उसकी तलाश में सिर्फ गर्दन मोड़कर पीछे देखा जा सकता था। निकट अतीत गड़बड़ था और भविष्य अस्पष्ट और एक गहरी धुंध के पार था। इसलिए निकट अतीत के उत्खनन को उन्होंने इरादतन रद्द करते हुए सुदूर अतीत अतीत या कहें कि पवित्र इतिहास की तरफ अग्रसर होना तय किया, क्योंकि वैराट्य और वैविध्य वहीं भर ही शेष था- जो ऊर्जा देने के विकल्प की तरह सामने था।शायद यही वह द्वंद्व थी, जिसने राजा रवि वर्मा को अपने चित्रों के विषयों को निर्धारित करने में एक बड़ी और निर्णायक भूमिका अदा की। उन्होंने संस्कृत नाटकों, गीत-गोविन्दम् और 'रसमंजरी` से मदद ली और योरपीय 'न्यू क्लासिकल रियलिज्म` की संभावनाओं का दोहन करते हुए, भारतीय पुराकथाओं और देवी-देवताओं का चित्रण आरंभ किया। किंचित् इसी कारण चित्रित देव-स्त्रियों की काया कुछ-कुछ पृथुल बनने लगीं।दरअसल, सौम्यभाव की निर्दोष सात्विकता को अपनी कला की गहरी ऐन्द्रिकता के जरिए अतिक्रमित किया।नतीजतन वे एक खा़स किस्म की सेंसुअसनेस से भरी स्त्रियां थीं, जो पूज्या से अधिक रूपविष्टता का भाव लिए हुए थीं। बहरहाल निर्विवाद रूप से यह कहा जा सकता है कि राजा रवि वर्मा की चित्रकृतियां रंग व्यवहार में राजा रवि वर्मा की क्षमताएँ रेम्ब्रां, गोया और टिशियन से रत्तीभर कम नहीं थी। अभी भी गोया की नेकेड माजा, रेम्ब्रां की 'सास्किया` या टिशियन की वीनस ऑफ अर्बिनो से राजा रवि वर्मा की किसी भी निवर्सना की तुलना बाआसानी की जा सकती है।बल्कि, यह कहा जा सकता है कि वे चित्रभाषा में भी योरोप के उपर्युक्त महान चित्रकारों के स्तर पर ठहरती हैं। कहना न होगा कि उनकी चित्रकृतियों में देह की कामाश्रयी अभिव्यक्ति, रंग-अभिव्यक्ति में काव्यात्मक लगती है। सेक्स को लिरिकल बनाने का यह अद्भुत उपक्रम था, जो हमारे रस-सिद्धान्त की समझ से पैदा हुआ था।
अत: उन्होंने अपने छोटे भाई के साथ उत्तर भारत की सांस्कृतिक यात्रा की ताकि वे उसकी सांस्कृतिक और भौगोलिक समग्रता को पूरी तरह आत्मसात कर सकें। बाद इसके ही उन्होंने अपनी चित्रकृतियों में भूदृश्य भी चित्रित करना शुरू किया।बहरहाल, चित्र में पृष्ठभूमि के रूप में जो लैंडस्केप होते, वह उनके अनुज किया करते थे। इस बीच दीवान शेषशय्या ने टी. माधवराव के जरिए राजा रवि वर्मा को बड़ौदा के सयाजीराव महाराज से मिलवाया, जहाँ रहकर उन्होंने पोर्टे्रट तो किए ही, देवी-देवताओं को विषय बनाकर कई अद्भुत ऐतिहासिक चित्रकृतियाँ तैयार की।उनकी कृतियों से प्रभावित होकर स्वामी विवेकानन्द ने 'वर्ल्ड रिलीजन कांग्रेस ऑफ शिकागो` में उनके चित्रकृतियाँ प्रदर्शनार्थ मंगवाई, जहाँ उन्हें पदक भी प्रदान किए गए।
उम्र के आखिरी वर्षों में निश्चय ही वे अपनी ख्याति के चरम पर थे। उन्हें एशिया का रेम्ब्राँ कहा जाने लगा था, लेकिन उन्हें लग रहा था कि कला का मर्म तो वे अब समझने लगे हैं। वे घंटों एक जगह खड़े होकर दिन-रात काम करते थे। इसी श्रम ने उनकी देह को तोड़ना शुरू कर दिया था। इसी बीच उन्हें तब के राजरोग कहे जाने वाले मधुमेह ने घेर लिया। वे थकने लगे थे। उन्हें विदेशों से आमंत्रण आते थे, लेकिन समुद्रऱ्यात्रा न करने वाली उस पुरानी अवधारणा के चलते उन्होंने वे तमाम आमंत्रण ठुकरा दिए। वे देश में रहकर ही दुनिया भर का हो जाना चाहते थे।शायद, वे सोचते थे कि अपनी जड़ों को अपनी ही मिट्टी में धंसे रहना चाहिए।
अब जबकि डेढ़ सदी गुज़र चुकी है, लेकिन भारतीय कलाजगत के लिए अभी भी वे एक बिरादरी बाहर चित्रकार हैं। लोग उन्हें पहले से कहीं ज्यादा नकारने के लिए उद्यत है। यहां तक कि कला की दुनिया में महान् करने के दावे के साथ आने वाला युवक, जिसे अभी न तो ठीक से रेखा खींचना आया है और न ही रंग का वाजिब उपयोग --वह भी राजा रवि वर्मा को कूड़ेदान में फेंकने के बाद अपना काम शुरू करता है। कला के बाजारमुखी (मार्केट-ड्राइवन) समय में जबकि भारत में जलरंग का परम्परागत माध्यम लगभग हाशिये पर है और अधिकांश चित्रकार तैलरंग में ही काम करते हैं। लेकिन भारत में सबसे पहले तैलरंग में काम करने की शुरुआत करने वाले इस चित्रकार को, तब अपने तैलरंग माध्यम के कारण ही निंदा का पात्र बनना पड़ा था।उन्हें स्वदेशी भावना के विरूद्ध काम करने वाला चित्रकार बताया गया था, क्योंकि तब तैलरंग एक अभारतीय माध्यम था।