Digital clock

सोमवार, 23 अगस्त 2010

बहस

प्रेम गली अति सांकरी

कृष्ण बिहारी



प्रेम. यह शब्द जितना सम्मोहक है उतना ही भ्रामक भी. एक विचित्र-सी मनोदशा का नाम प्रेम है. यह कब होगा, किससे होगा और जीवन में कितनी बार होगा, इसका कोई अता-पता किसी को नहीं होता. जब-जब मुझसे किसी ने इसके बारे में सवाल किया है या मैंने खुद से पूछा है कि आख़िर यह मामला है क्या, तो मुझे केवल एक उत्तर ही देते बना है कि प्रेम वासना से उपजी मनोस्थिति है.

प्रेम नहीं सेक्स


मैं इसे कभी स्वीकार नहीं कर सकता कि प्रेम में वासना का कोई स्थान नहीं है. मैं न स्वयं से झूठ बोल सकता हूं और न दूसरों से. प्रेम में आदर्श और अशरीरी जैसी स्थिति की जो लोग वकालत करते हैं, वह मेरी समझ में केवल लाचारी है. हमारे देश में चूंकि प्रेम को लेकर समाज स्त्री- पुरूष की सोच में बंटा हुआ है और स्त्री आज भी यह कह पाने की स्वतंत्र स्थिति में नहीं है कि उसने अपने प्रेमी के साथ जिस्म शेयर किया है. इसलिए वह ज़ोर देकर झूठ बोलती है कि प्रेम में शरीर की मांग बेमानी है. वह डरती है कि यदि उसने शरीर के सच को स्वीकार किया तो उसका भविष्य नष्ट हो जाएगा.

मतलब यह कि यदि वह अपने पति से कहे कि उसने किसी और से बाखुशी संबंध बनाए हैं तो पति खो देगी और प्रेमी से कहे कि उससे पहले वह किसी और से जुड़ी थी और उस जुड़ाव में जिस्म शामिल था तो प्रेमी उससे दूर चला जाएगा. या हो सकता है कि नया प्रेमी भी उसके शरीर का उपभोग करने के बाद उसे कैजुअल समझे और ताना देते हुए किसी नई प्रेमिका की तलाश में किसी और दिशा में निकल जाए. इसलिए औरत हमेशा स्वयं को अनछुई या किसी अन्य से न छुई होने का भरम फैलाए रहती है.

असल में इस झूठ को वह इस तरह जीती है कि उसे यह सच लगता है कि किसी के साथ हमबिस्तर हो चुकने के बाद भी वह पाकीजा है. मैं नब्बे-पंचानबे प्रतिशत स्त्रियों की बात कर रहा हूं न कि उन पांच दस प्रतिशत की जिन्होंने समाज को ठेंगा दिखा दिया है. ये ठेंगा दिखाने वाली महिलाएं आर्थिक रूप से या तो स्वतंत्र हैं या फिर वेश्याएं हैं. वेश्या सबसे अधिक स्वतंत्र होती है.

मैं यहां यह भी कहना चाहता हूं कि आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर महिला पुरूष बदलने के मामले में वेश्याओं से भी आगे है और ज्यादा आजाद है. नब्बे-पंचानबे प्रतिशत स्त्रियां ज़िंदगी भर सती-सावित्री होने का ढोंग जीती हैं. ये करवा चौथी महिलाएं चलनी से चांद देखने के बाद ही अन्न-जल ग्रहण करती हैं.

मैं यहीं यह बात भी स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि भारतीय मर्द का मानस तो और भी बदतर है. वह इतना भी खुला नहीं है कि स्त्री की वास्तविकता को खुले मन से स्वीकार कर सके. वह तो और भी दकियानूस है. उसे नकली सती-सावित्री के साथ जीवन गुज़ारना संतुष्टि देता है. एक आज़ाद खयाल औरत के साथ प्रेम करना तो उसे जंचता है. कम से कम कपड़ों में उसे साथ लेकर घूमना अच्छा लगता है. उसका संसर्ग उसे रुचता है. लेकिन उसी लालित्य को वह अपनी पत्नी में नहीं बरदाश्त कर पाता. यह दोगली मानसिकता है. मैं जो परिस्थितिजन्य हालातों में अनेक महिलाओं के साथ अनेक स्तरों पर जीता आया हूं. अपनी पत्नी को वह आज़ादी देने के पहले हजार बार सोचूंगा और अन्तत: इस निष्कर्ष पर पहुंचूंगा कि बीवी को बीवी होना चाहिए. क्यों औरत केवल बीवी ही क्यों हो, यहां मैंने 'मैं’ का उल्लेख किया है. कारण साफ है कि प्रश्न करने वाले यह नहीं सोचेंगे कि ये विचार किसी रचनाकार के हैं. वे सीधे पूछेंगे कि तुम अपने बारे में बताओ कि क्या अपनी बीवी को दूसरे के बिस्तर पर जाने दोगे. मैं उनसे पूछता हूं कि क्या उनकी बीवी उनको बताकर किसी अन्य के बिस्तर पर गई है. यदि वे इसे जानते भी हैं तो क्या इस सच को दुनिया के सामने स्वीकार करेंगे.

मैं जानता हूं कि मैंने एक जटिल विषय को हाथ में लिया है. मैं प्रेम के इस पक्ष की अनदेखी नहीं कर सकता कि प्रेम पूर्ण समर्पण चाहता है. प्रेम में आना पाई का हिसाब नहीं होता कि प्रेम हाट में बिकने वाली वस्तु नहीं है. सबकुछ लुटा देने वाला ही प्यार कर सकता है. सीस उतारे भुंई धरे तब पैठे घर मांहि...वाली बात है. प्रेम का रास्ता तो तरवारि की धार पे धावनो है. प्रेम बनियागिरी नहीं है. वहां भी लिखा होता है- उधार प्रेम की कैंची है. प्रेम में उधार नहीं चलता. सब नकद होता है और लेन -देन में लेने से अधिक देने का मन होता है. सच तो यह है कि प्रेम में लेना कुछ भी नहीं होता. देना और केवल देना होता है.

प्रेम का सफर जब शुरू होता है तो हमसफर के अलावा सारी दुनिया बेमायने हो जाती है. किसी दूसरे का होना तो छोड़िए, अपना ही अता-पता नहीं होता. पल प्रतिपल प्रिय की मूरत आंखों में बसी रहती है. प्रेम भूख-प्यास भुला देता है. सच तो यह है कि प्रेम रुला देता है. यह इनसान को तिल- तिल घुला देता है. लेकिन यह सब होता है प्रेम के जन्म से और उसके नष्ट होने के बीच. क्षरण की प्रक्रिया के साथ. नष्ट होने से पहले प्रेम इनसान को नष्ट कर चुका होता है और यह सारी फजीहत देह की चाह के साथ जुड़ी है.

वैसे तो हर रिश्ता केयरिंग होता है. लेकिन प्रेम का रिश्ता अतिरिक्त केयरिंग होता है. दोनों को लगता है कि प्रिय की जितनी भाल प्रेमी कर सकता है या प्रिया कर सकती है, उतना कोई नहीं कर सकता. लेकिन यह कितनी क्रूर सचाई है कि प्रेम का क्षरण शुरू होते ही प्रिय की किसी भी स्थिति के प्रति कोई सजगता नहीं बचती. कोई ध्यान नहीं होता. उसकी उपेक्षा होने लगती है और तकलीफदेह तो यह है कि प्रिय की असहनीय पीड़ा भी किसी को नहीं दिखती. इसे ऐसे भी कहा जा सकता है कि कोई देखकर भी नहीं देखता. जहां कभी प्रिय को घास के तिनके या फूल से भी छू जाने की स्थिति दूसरे को दुखद चोट का एहसास कराती थी, वहीं विपरीत अवस्था में कुछ भी दुखद नहीं लगता बल्कि दोनों एक दूसरे को घातक चोट पहुंचाने से भी गुरेज नहीं करते. उनसे कहां तो एक-दूसरे का दुख देखा नहीं जाता था और कहां वे एक दूसरे को दुख की चरमसीमा में फंसा हुआ पाकर सुख पाते हैं. मैं इसे हिंसा का नाम देता हूं.

प्रेम ने रक्तपात कराया है. प्रेम ने कभी रक्तपात रूकवाया नहीं है. प्रेम भयंकर रूप से हिंसक है. प्रिय के साथ भी और अपने परिवेश के साथ भी. प्रेम नदी में आई अचानक बाढ़-सी बरबादी लाता है, उजाड़ देता है, सब कुछ बहा ले जाता है एक दुनिया अपने साथ. यह मनुष्य को विवेकशून्य बनाता है. प्रेम और विवेक का कोई आपसी या अन्योन्याश्रित संबंध नहीं है. कहते हैं, प्रेम अंधा होता है. अंधा होना क्या बहुत अच्छी बात है. किसी आंखों वाले को अन्धा कहकर तो देखें कि वह कितना अंधा है. ढ़ाई आखर प्रेम का किसी को पंडित नहीं बनाता. वह वाद-विवाद प्रतियोगिताओं को जीतने के लिए उद्धरण के रूप में प्रयोग करने के लिए अच्छा है. जीवन में उसकी स्थिति क्या है. यह चचा गालिब कह चुके हैं- इश्क ने हमको निकम्मां कर दिया ग़ालिब, वरना आदमी हम भी थे काम के...

अब जब दो विपरीतलिंगी एक दूसरे के सामिप्य में रहेंगे तो क्या बिना दैहिक हुए रहेंगे. यदि सामीप्य में भी बिना दैहक संपर्क के हैं तो निश्चित रूप से उनके सामने लाचारी है कि वे मिलन का एकांत नहीं पा रहे.


मैं साफ कर देना चाहता हूं कि मुझे अब तक ऐसा कोई जोड़ा नहीं मिला जिसे एक दूसरे से वाहियात शिकायतें न हों. चाहे वे पति-पत्नी हों या फिर लिविंग टुगेदर की रिलेशनशिप में रहते हों. ये वही लोग हैं, जो शुरूआत में त्यागमयी थे. धीरे-धीरे इन्होंने ही अपने त्याग की पूरी कीमत वसूली है. एक-दूसरे को डंसते हुए इन्हें मजा आने लगा है. न तो ये एक दूसरे को छोड़ेंगे न खुद चैन से रहेंगे. इन्हें बरबादी में रहना रुचता है. ऐसे लोग ही परपीड़क कहलाते हैं जिनका सिद्धान्त है कि न खेलेंगे न खेलने देंगे, खेल बिगाड़ देंगे. ये अपने उसी प्रिय का सबकुछ बिगाड़ देते हैं जिसका सबकुछ बनाने की कसम खाते हुए उसकी ज़िंदगी में शामिल हुए थे. क्या यही वह प्यार है जिसकी बुनियाद पर इन्होंने घर बसाया था.

यह सही है कि तय न हो पाया कि चुम्बन वासना या प्यार, मगर मेरी दृष्टि में सही यही है कि बिना वासना के मर्द और औरत का चुम्बन अर्थहीन है. मैं जानता हूं कि शुचितावादी मुझे मौत की सजा देने के अलावा और कुछ नहीं सोचेंगे लेकिन क्या मेरा अनुभूत् सत्य ग़लत है, क्या यह बहुसंख्य का अनुभूत नहीं है. इसलिए मैं एक बात और साफ कर देना चाहता हूं कि जब मैं स्त्री और प्यार के मामले में लिख रहा हूं तो केवल मर्द और औरत की बात कर रहा हूं. मां बहन और बीवी को इस बहस से दूर रखना चाहता हूं और यदि कोई इन तीन रिश्तों के अलावा कुछ भी नहीं सोच सकता तो उससे यही कह सकता हूं कि तुम्हारे लिए सभी महिलाएं, मां और बहनें हैं. औरत तुम्हारे लिए बनी ही नहीं है. तुम झूठ में जन्में हो और उसी झूठ को जीते हुए मरोगे.

औरत और मर्द में एक दूसरे के लिए आकर्षण जन्मजात् है, जो जिसको अच्छा लगता है उसके सामीप्य को पाने का मन भी करता है. अब जब दो विपरीतलिंगी एक दूसरे के सामिप्य में रहेंगे तो क्या बिना दैहिक हुए रहेंगे. यदि सामीप्य में भी बिना दैहक संपर्क के हैं तो निश्चित रूप से उनके सामने लाचारी है कि वे मिलन का एकांत नहीं पा रहे. मेरा आशय बेखटके एकांत का है. जहां किसी किस्म का कोई खतरा नहीं है. निष्कंटक मिलन ही बता सकता है कि वासना कितनी प्रबल होती है और दैहिक प्रेम उसे कितना सघन बना देता है, ऊं अस्थि चर्ममय देह मम.. फोर प्ले और आफ्टर प्ले स्मृति है उसके बीच सब कुछ विस्मृति है और सचाई यह है कि नब्बे या पच्चानबे प्रतिशत दैहिक रिश्तों में न तो फोर प्ले है न ऑफ्टर प्ले ऑफ्टर प्ले तो खैर है ही नहीं, करवट बदलकर सो जाना है.

कहने का मतलब है कि रोज की दाल-रोटी है सेक्स, प्रेम का कहीं अता पता नहीं यह सच एक बड़ा सच है. मैं यदि देहधारी नहीं होता तो क्या कोई स्त्री मुझे प्रेम करती, यदि कोई अपने वज़ूद के साथ मुझे न बांधता तो क्या मैं उसके बारे में सोचकर अपना समय नष्ट करता. अशरीरी प्रेम को बहुत महत्व देने वालो, ऐसा कौन सा अशरीरी रिश्ता है जो तुम्हारे साथ ज़िंदा है.

मैं यह पंक्ति इस लेख में नहीं लिखना चाहता था लेकिन बाध्य होकर लिख रहा हूं कि तुम मर्द औरत अपने बच्चों को क्यों प्यार करते हो क्या वे बिना देह के हैं. क्या दूसरे के बच्चों को भी तुम उसी सांद्रता के साथ प्यार करते हो, कर सकोगे तो झूठ क्यों बोलते हो अपना अपना ही होता है. अब यह अपना वह भी है जो आपके साथ अपना है. वही आपको चाहता है और चाहत का केवल एक और एक अर्थ है-दैहिक रूप से पाना, पहचानना. हो सकता है कि दैहिक रूप के माध्यम से कोई मन की तह तक उतरने का प्रयास भी करे लेकिन उससे पहले की स्थिति तो देह से होकर ही गुजरती है.

यह दुनिया एक से एक सुन्दर और अदभुत् रूप से आकर्षक स्त्री-पुरूषों से भरी हुई है. क्या सभी के साथ आप सम्पर्क स्थापित कर सकते हैं, दैहिक संपर्क को छोड़िए, केवल सामान्य संपर्क भी सबसे रख पाना संभव नहीं है. कोई आपको अच्छा लगता है उसे आप
अच्छे नहीं लगते या आप उस दायरे में नहीं आते, जिसमें अच्छा लगने वाला आपके संपर्क में आता हो तो बात साफ हो जाती है कि आप उसी को पाने की वासना से ग्रस्त होते हैं, जिसके सम्पर्क का अवसर सहज हो. ऐसा न होने पर करोड़ों जिस्म और उनके चेहरे केवल चकाचौंध उत्पन्न कर हमेशा के लिए आपके हर विजन से गायब हो जाते हैं. वे स्वप्न में भी दस्तक नहीं देते.

प्रेम यदि केवल देख लेने या देखते ही पैदा हो जाने की स्थिति होती तो तीन चौथाई दुनिया पागलखाने में होती. देखना और चाहना मात्र वासना है. पूरी हो जाए तो ठीक अन्यथा यह दिमाग से उतर जाती है. एक दूसरी स्थिति यह है कि आप किसी को चाहने लगते हैं, वह आपकी पहुंच में तो है लेकिन आपको घास नहीं डालता तो आप भीतर ही भीतर पीड़ित होते हैं. उसके लिए आपकी कसक बढ़ती ही चली जाती है. लेकिन वही यदि आपकी आंखों से इतनी दूर हो जाए कि दिखना ही बन्द हो जाए, उससे सम्वाद का कोई ज़रिया ही न रह जाए तो फिर धीरे-धीरे वह आउट ऑफ साइट, आउट ऑफ माइण्ड होता जाता है और एक दिन उसकी स्मृति हमेशा-हमेशा के लिए आपकी स्मृति से गायब हो जाती है. उसके लिए न तो कसक होती है और न उसे न पाने की टीस उठती है. यदि भूले-भटके कभी किसी वजह से उसकी याद आती भी है तो एक हास्यास्पद भाव उभरता है कि यह बेवकूफी के अलावा कुछ और नहीं था.
प्रेम नहीं सेक्स


इसका सीधा अर्थ है कि जिस्म है और पहुंच में है तो जहान है नहीं तो कुछ भी नहीं है.

अब प्रेम के उस उदात्त पक्ष को भी एक नजर देखें जिसका चरबा चबाए बिना आदर्शवादियों को हमेशा अपच का रोग लगा रहता है. उनकी कथनी के अनुसार प्रेम त्याग और बलिदान से ओत-प्रोत भावना है. प्रेम एक पवित्र भावना है. इसमें शरीर तो कहीं से आता ही नहीं. यह तो आत्मा की बात है. जो आत्मा से प्रेम करेगा उसी का प्रेम अमर होगा.मैं साफ कर देना चाहता हूं कि आत्मा से पेम कोई सामान्य इन्सान नहीं कर सकता. ऐसा प्रेम असामान्य व्यक्ति ही करेगा. प्रेम भूत-पिशाच से नहीं होता, प्रेम हाड़- मांस के लोग करते हैं. दो विपरीतलिंगी जिन्दा लोगों के एक दूसरे के प्रति आकर्षण का नाम प्रेम है. यह सहज व्यवहार है जो होने के बाद व्यक्ति को असहज कर देता है.

मैं मानता हूं कि प्रेम का प्रारंभिक स्वरूप वासनात्मक होने के बावजूद निर्मल, निश्छल, त्यागमय और उदात्त रहता है. छटपटाहट भी होती है, यदि दोनों पक्ष एक दूसरे की भावनाओं से अवगत हों तो, और जो यह छटपटाहट होती है उसमें कारण केवल मिलन की समस्या है. दोनों एकांत में मिलना चाहते हैं. यह एकांत की चाह क्यों ? एकांत में मिलकर दोनों करेंगे क्या ? वे एकांत क्यों चाहते हैं ? वे सारी दुनिया में ऐसी जगह क्यों खोजते हैं, जहां उनके अलावा दूसरा कोई न हो ? क्यों ? ऐसा क्या है जिसे वे सबकी नज़रों से बचाकर करना चाहते हैं ?

यह मात्र एक दूसरे को स्पर्श के माध्यम से और अधिक जानने की प्यास है, जो वासना है. दैहिक मिलन की लालसा है.यह देह ही है जिसे मैं प्रेम की जड़ मानता हूं. जब दो लोगों के बीच प्रेम स्वीकृत हो जाता है तो वहीं से देह के लिए प्यास जो पहले केवल नवांकुर के रूप में थी, वह अचानक वृक्ष बन जाती है. वह प्यास छांह बनकर सुकून नहीं देती बल्कि तपन बनकर दंश देती है.जलाती है. एक दूसरे के लिए त्याग और बलिदान की सारी बात प्यार की स्वीकृति से पहले की स्थिति है. उस स्थिति में जान तक कुरबान हो सकती है. उस समय तक प्रेम बांधता नहीं बल्कि मुक्त करता है. प्रेम की वही स्थिति उदात्त होती है. प्रेमी अपने प्रिय के लिए कुछ भी कर सकता है.उसे किसी भी अवस्था में स्वीकार करने के लिए तैयार होता है. सब कुछ पवित्र होता है. यहां तक कि मर्द के लिए एक रण्डी भी स्वीकार्य होती है. एक सावित्री के लिए एक लुहेड़ा भी स्वीकार्य होता है.

लेकिन जैसे ही प्रेम स्वीकृत हुआ, बन्धन हो जाता है.परेशानी यहीं से शुरू होती है.प्रेम पजेसिव होता जाता है.यह करो. ऐसे रहो. मेरे अलावा किसी और के कभी न हो. आदि आदि.मगर क्यों उदात्त प्रेम को ऐसे बन्धन को मनवाने की जरुरत क्यों पड़ी. उदात्त हमेशा के लिए उदात्त क्यों नहीं रहता ?

प्रेम शंका में जीता है. प्रेमी और प्रिय दोनों शंका में जीते हैं कि न जाने कब कौन प्रेम करना छोड़ दे.यह ख़तरा है. जब तक देह हस्तगत् नहीं होती तब तक तो हर तरह की शर्तों पर कसमों के साथ-साथ वायदे भी चलते रहते हैं. त्याग और बलिदान भी होता रहता है. लेकिन देह के मिलने की स्थिति होते-होते स्थिति असहनीय होती जाती है.शर्तें ही शर्तें. प्रेम का क्षरण यहीं से शुरू होता है.यानी कि जैसे ही प्रेम स्वीकृत हुआ वहीं से उसके नाश की प्रक्रिया शुरू हो जाती है. कुछ भी शाश्वत नहीं है प्रेम भी. लेकिन यदि कोई एकतरफा प्रेम करता हो तो उसका प्रेम समय के साथ सूख जाता है.और यदि दूसरा प्रेम को अस्वीकार दे तो चोट पहुंचती है. वहां आत्म आहत होता है. अपमान बोध होता है और स्थिति कभी कभी तो आत्महत्या तक पहुंच जाती है.आत्महत्या न भी करे तो भी कभी कभी घाव हरा हो जाता है. लेकिन ऐसा केवल उंगलियों पर गिनी जा सकने वाली नाम मात्र की स्थितियों में होता है.सहज स्थिति यही होती है कि तू नहीं और सही.प्रेम की गहराई और सचाई यही है.

यदि प्रेम स्वीकृत हो गया तो अगला कदम पूर्व नियोजित देह पाने की लालसा है. देह पर अधिकार. यानी तुम्हीं से शुरू और तुम्हीं पर खत्म. इसके बाद की स्थिति है कि फिर किसी और से शुरू. इसके भी कारण हैं. पहला तो यही कि जब यह होता है तो केवल उद्दीपन से ही जुड़ता है. यानी कि आकर्षण के कारण प्रमुख होते हैं. विकर्षण तो मिलन के बाद से शुरू होता है. तो जिस सांद्रता के साथ प्रेम शुरू होता है, उसकी दुगनी सांद्रता के साथ निगेटिविटी शुरू होती है. एक को दूसरे के वे सभी दुर्गुण, जो गुणों से ज्यादा अच्छे लगते थे, वही भयानक रूप से अप्रिय लगने लगते हैं. स्थिति तो गुणों की भी दुर्गति तक ही जाती है.

प्रेम नहीं सेक्स


प्रेम जब तक अलभ्य है तभी तक उदात्त और त्यागमय है. जहां एक रिश्ता बना चाहे वह शादी का हो या फिर लिविंग टुगेदर ही क्यों न हो, बनते ही नष्ट होने लगता है. लिविंग टुगेदर भी एक रिश्ता है. रिश्ता बनने के पहले जो अच्छाइयां दिखती थीं, बनने के बाद वे खुर्दबीन और दूरबीन दोनों की सहायता के बाद भी नहीं दिखतीं. और रिश्ता तल्ख़ होने की शुरूआत होते देर नहीं होती. शुरूआत तानों और व्यंग्य से होती है. कुछ समय मान-मनुहार में निकलता है. उसके बाद की स्थिति चुप्पी की आती है और फिर तीसरा पड़ाव समझौतों की कोशिश होती है.समझौता जैसा कि सभी जानते हैं, मजबूरी है. समझौते होते ही टूटने के लिए हैं. कोई पक्ष कभी भी तोडऩे के लिए स्वतंत्र होता है.

अब सवाल यह है कि जब इस रिश्ते की दुर्गति होनी है और दुनिया बता भी चुकी है कि अंत यही होना है तो भी लोग इस रिश्ते के लिए व्याकुल क्यों होते हैं ? उत्तर साफ है, यह दैहिक आवश्यकता है. सवाल हो सकता है कि अगर यह केवल दैहिक आवश्यकता है तो कहीं भी पूरी की जा सकती है फिर प्रेम की ज़रूरत क्यों ? प्रेम दैहिक आवश्यकता होने के बाद भी तारीफ का भूखा होता है. उसे प्रशंसा चाहिए. कोई हो, जो कहे कि तुम सुन्दर हो. गुणवान हो. तुम्हारी उपलब्धियां अनुपम हैं. तुम जैसा कोई दूसरा नहीं है. यह मनुष्य की स्वाभाविक कमज़ोरी है. कोई बिरला ही होगा जो अपनी प्रशंसा से फूला न समाए. परन्तु प्रशंसा करने की स्थिति हमेशा के लिए स्थायी नहीं होती. कोई आपकी तारीफ एक बार करेगा. दो बार करेगा. दस बार करेगा. हर बार नहीं करेगा. प्रेम स्वार्थी होता है. उसे तारीफ हमेशा चाहिए. जहां तारीफ बन्द होना या कम होना शुरू हुई, वहीं पहला अविश्वास पनपता है कि प्रेम कम होने लगा या कि एक को दूसरे की ज़रूरत कम होने लगी. प्रेम के ठंडेपन की यह शुरूआत है, जहां से आरोप-प्रत्यारोप की कड़ियां गुत्थियां बनने लगती हैं. आगे चलकर इन्हें सुलझाना मुश्किल होने लगता है. तब समझौते शुरू होते हैं, कोसना शुरू होता है, जो सबसे अच्छा लगता था वही दुनिया का सबसे बुरा दिखता है.

प्रेम एक ऐसा मर्ज़ है जो सबको जुकाम की तरह पकड़ता और छोड़ता है. कुछ लोगों को यह बार-बार पकड़ता और छोड़ता है. अगर यह उनकी आदत न बनी हो तो उन्हें हर बार पहले से ज्यादा दुखी करता है. प्रेम पहला हो या उसके बाद के किसी भी क्रम पर आए, होने पर पाने की छटपटाहट पहले से ज्यादा होती है और टूटने पर पहले से भी तगड़ा झटका लगता है. यह टूटना इनसान को बिखरा और छितरा देता है.जिनकी आदत ओछेपन की होती है और जो अवसर पाते ही अपना मतलब पूरा करने में लग जाते हैं उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता. उनको ही क्रमश: लम्पट और छिनाल कहा जाता है. इस प्रवृत्ति के लोग प्रेम नहीं करते.ये एक किस्म की अलग लाइफ स्टाइल जीते हैं.

प्रेम इनके लिए एक शौक होता है. गन्दा शौक. इस शौक को पूरा करने के लिए इनकी लार हर किसी के दैहिक सम्पर्क को पाने के लिए टपकती रहती है. अपमान की चिन्ता इन्हें नहीं होती क्योंकि सम्मान से इनका कोई सम्बन्ध नहीं होता.

प्रेम ईर्ष्यालु, शंकालु और हिंसक होता है. प्रेम ही एक मात्र ऐसा मानवीय व्यवहार है जिसमें सबसे अधिक अमानवीयता है. प्रेम बनाता नहीं, बरबाद करता है. यह अलग बात है कि बरबाद करने वाले की कोशिश कभी कभी नाकाम हो जाती है. मैं कभी नहीं मान सकता कि रत्नावली या विद्योत्तमा ने तुलसीदास या कालिदास को अमर कर दिया.

प्रेम नहीं सेक्स


किसी में सुधार न करना और उसे अपमान की आग में झोंक देना व्यक्तित्व निर्माण की दिशा में उठाया गया सकारात्मक कदम नहीं कहा जा सकता. इसी तरह किसी भी महिला के निर्माण में किसी मर्द की कोई भूमिका नहीं है. यदि कोई बना है तो उसे बनाने में उसके परिवेश के अलावा उसकी प्रतिभा का योगदान होता है. प्रतिभा व्यक्तित्व निर्माण में आगे-आगे चलती है.यह कहना कि यदि स्त्री का प्रेमपूर्ण सहयोग न मिला होता तो बहुत से तथाकथित सफल लोग गुमनामी के अंधेरे में खो जाते आंशिक रूप से सही हो सकता है. यह पूरा सच नहीं है. जिसे प्रेमपूर्ण सहयोग कहा जाता है, वह पारिवारिक जीवन जीने की सदियों से चली आ रही दिखावटी पद्धति है. इसमें जीवन को किसी तरह घसीटते हुए जिया जाता है और इसी को कभी कर्तव्य तो कभी प्रेमपूर्ण निर्वाह की संज्ञा दी जाती है.

मैं जब इस लेख को लिखते हुए अपने परिवेश में इसकी चर्चा कर रहा हूं तो इस सभ्य समाज के लोग इसे मेरा व्यक्तिगत मत कहते हुए मुझे ख़ारिज करने में लगे हैं कि प्रेम कतई दैहिक नहीं है. प्रेम आत्मा की बात है. वासना का इससे कोई लेना-देना नहीं. प्रेम ही है कि दुनिया बची हुई है. मेरा मन इसे स्वीकार नहीं कर रहा. मैं समझता हूं कि करूणा है जिससे दुनिया बची हुई है. प्रेम और करूणा में अन्तर है .करूणा का जहां असीम विस्तार है, वहीं प्रेम एक संकरी गली है. प्रेम राजपथ नहीं है कि उस पर एक साथ और सबके साथ दुनिया चले. प्रेम में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है.

मैं कहना चाहता हूं कि यदि प्रेम में देह ग़ैरहाजिर है तो इस रिश्ते की मौज़ूदगी ही नहीं है. सेक्स को आप नकार कैसे सकते हैं, जब प्रेम की अंतिम परिणिति वही है. वही एकमात्र पल है, जब आप प्रेमी के होते हैं.वही आत्म विस्मृति के क्षण हैं. सेक्स के बिना तो यह बिल्कुल ग़ैरज़रूरी रिश्ता होगा. जितनी भी प्रेम कहानियां हैं, अधिकांश दुखांत हैं. यही दुखांत कहानियां लोगों को याद भी हैं. जिनका अंत सुखद है, यदि उन कहानियों का फॉलोअप मिले तो पता चलेगा कि अंत तक आते-आते वे भी दुखांत ही हो गईं. दुखांत कहानियों में शरीर से न मिल पाने का दुख है तो सुखांत कहानियों के दुख का कारण प्रेम में अनवरत क्षरण और अन्तत: उसका नष्ट हो जाना है.

राम ने सीता को प्रतियोगिता में जीता था. तब जोड़ी बनी थी. राम ने रावण से लड़ाई अपनी इज्जत के लिए की थी. सीता को वापस पाने के बाद राम ने उन्हें असहाय अवस्था में छोड़ दिया था. यह कहीं से भी आदर्श जोड़ी की बात को चरितार्थ नहीं करता.


यदि प्रेम अमरत्व जैसी स्थिति का नाम होता तो वह जीवन में केवल एक बार होता जबकि ऐसा नहीं है. प्रेम कई बार हो सकता है. यहां तक कि दो प्रेमी जो एक दूसरे के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं करते, वही एक दूसरे के जीते जी किन्हीं दूसरों के साथ आमने-सामने जीने लगते हैं. बहुधा उनका दुबारा शुरू किया गया जीवन पहले से अच्छा होता है.

मैं प्रेम के स्वरूप से इंकार नहीं करता. इंकार इस बात से भी नहीं कि प्रेम महत्त्वपूर्ण नहीं है, लेकिन मैं प्रेम को त्यागमय उदात्त और कुरबानियों का पुलिंदा नहीं समझता. यह एक अनिश्चयपूर्ण मानसिक स्थिति है, जिसमें सुख क्षणिक और दुख स्थायी है जबकि अपने आप में यह रिश्ता क्षणजीवी है.

जब मैंने अपनी बात शुरू की थी तभी कहा था कि मैं मर्द और औरत के बीच पनपने वाले इस रिश्ते की बात कर रहा हूं. इसी बात को दो उदाहरणों के साथ समाप्त करना चाहूंगा. राम और सीता की जोड़ी को आदर्श कहा जाता है. राधा और कृष्ण के प्रेम को जगत आदर्श मानता है. मैं असहमत हूं. राम ने सीता को प्रतियोगिता में जीता था. तब जोड़ी बनी थी. राम ने रावण से लड़ाई अपनी इज्जत के लिए की थी. सीता को वापस पाने के बाद राम ने उन्हें असहाय अवस्था में छोड़ दिया था. यह कहीं से भी आदर्श जोड़ी की बात को चरितार्थ नहीं करता. दिखने में जो आदर्श जोड़ी लगे वह जीवन व्यवहार में भी आदर्श होगी, इसकी कोई गारंटी नहीं है. राधा और कृष्ण का प्रेम, प्रेमी और प्रेमिका का नहीं बल्कि सख्य भाव का था. इसलिए स्त्री और पुरूष के प्रेम को इन मिथकों के साथ नहीं जोडऩा चाहिए.

रविवार से से साभार -

डॉ.लाल रत्नाकर

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

ब्लॉग आर्काइव

मेरे बारे में

मेरी फ़ोटो
GHAZIABAD, Uttar Pradesh, India
कला के उत्थान के लिए यह ब्लॉग समकालीन गतिविधियों के साथ,आज के दौर में जब समय की कमी को, इंटर नेट पर्याप्त तरीके से भाग्दौर से बचा देता है, यही सोच करके इस ब्लॉग पर काफी जानकारियाँ डाली जानी है जिससे कला विद्यार्थियों के साथ साथ कला प्रेमी और प्रशंसक इसका रसास्वादन कर सकें . - डॉ.लाल रत्नाकर Dr.Lal Ratnakar, Artist, Associate Professor /Head/ Department of Drg.& Ptg. MMH College Ghaziabad-201001 (CCS University Meerut) आज की भाग दौर की जिंदगी में कला कों जितने समय की आवश्यकता है संभवतः छात्र छात्राएं नहीं दे पा रहे हैं, शिक्षा प्रणाली और शिक्षा के साथ प्रयोग और विश्वविद्यालयों की निति भी इनके प्रयोगधर्मी बने रहने में बाधक होने में काफी महत्त्व निभा रहा है . अतः कला शिक्षा और उसके उन्नयन में इसका रोल कितना है इसका मूल्याङ्कन होने में गुरुजनों की सहभागिता भी कम महत्त्व नहीं रखती.