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सोमवार, 27 जून 2011

लोक और जनजातीय कला

जीवन शैली, मूल्‍य और मान्‍यताएं

भारत एक विविध संस्‍कृति वाला देश है, एक तथ्‍य कि यहां यह बात इसके लोगों, संस्‍कृति और मौसम में भी प्रमुखता से दिखाई देती है। हिमालय की अनश्‍वर बर्फ से लेकर दक्षिण के दूर दराज में खेतों तक, पश्चिम के रेगिस्‍तान से पूर्व के नम डेल्‍टा तक, सूखी गर्मी से लेकर पहाडियों की तराई के मध्‍य पठार की ठण्‍डक तक, भारतीय जीवनशैलियां इसके भूगोल की भव्‍यता स्‍पष्‍ट रूप से दर्शाती हैं।
एक भारतीय के परिधान, भोजन और आदतें उसके उद्भव के स्‍थान के अनुसार अलग अलग होते हैं।

संस्‍कृति

भारतीय संस्‍कृति अपनी विशाल भौगोलिक स्थिति के समान अलग अलग है। यहां के लोग अलग अलग भाषाएं बोलते हैं, अलग अलग तरह के कपड़े पहनते हैं, भिन्‍न भिन्‍न धर्मों का पालन करते हैं, अलग अलग भोजन करते हैं किन्‍तु उनका स्‍वभाव एक जैसा होता है। तो चाहे यह कोई खुशी का अवसर हो या कोई दुख का क्षण, लोग पूरे दिल से इसमें भाग लेते हैं, एक साथ खुशी या दर्द का अनुभव करते हैं। एक त्‍यौहार या एक आयोजन किसी घर या परिवार के लिए सीमित नहीं है। पूरा समुदाय या आस पड़ासे एक अवसर पर खुशियां मनाने में शामिल होता है, इसी प्रकार एक भारतीय विवाह मेल जोल का आयोजन है, जिसमें न केवल वर और वधु बल्कि दो परिवारों का भी संगम होता है। चाहे उनकी संस्‍कृति या धर्म का मामला हो। इसी प्रकार दुख में भी पड़ोसी और मित्र उस दर्द को कम करने में एक महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

विज्ञान

भारत की वैश्विक छवि एक उभरते हुए और प्रगतिशील राष्‍ट्र की है। सच ही है, भारत में सभी क्षेत्रों में कई सीमाओं को हाल के वर्षों में पार किया है, जैसे कि वाणिज्‍य, प्रौद्योगिकी और विकास आदि, और इसके साथ ही उसने अपनी अन्‍य रचनात्‍मक बौद्धिकता को उपेक्षित भी नहीं किया है। आपको आश्‍चर्य है कि यह क्‍या है तो यह वैकल्पिक विज्ञान है, जिसका निरंतर अभ्‍यास भारत में अनंतकाल से किया जाता है। आयुर्वेद पूरी तरह से जड़ी बूटियों और प्राकृतिक खरपतवार से बनी दवाओं का एक विशिष्‍ट रूप है जो दुनिया की किसी भी बीमारी का इलाज कर सकती हैं। आयुर्वेद का उल्‍लेख प्राचीन भारत के एक ग्रंथ रामायण में भी किया गया है। और आज भी दवाओं की पश्चिमी संकल्‍पना जब अपने चरम पर पहुंच गई है, ऐसे लोग हैं जो बहु प्रकार की विशेषताओं के लिए इलाज की वैकल्पिक विधियों की तलाश में हैं।
आज के समय में व्‍यक्ति के जीवन की बढ़ती जटिलताओं के साथ लोग निरंतर ऐसे माध्‍यम की खोज कर रहे हैं, जिसके जरिए वे मन की कुछ शांति पा सकें। यहां एक और विज्ञान है, जिसे हम ध्‍यान के नाम से जानते हैं तथा इसके साथ जुड़ी है आध्‍यात्मिकता। ध्‍यान और योग भारत तथा भारतीय आध्‍यात्मिकता के समानार्थी हैं। ध्‍यान लगाना योग का सबसे महत्‍वपूर्ण घटक है, जो व्‍यायामों की एक श्रृंखला सहित मन और शरीर का उपचार है। ध्‍यान शब्‍द में अनेक अभ्यास शामिल हैं जो परिस्थितियों को साकार रूप में देखने, एक वस्‍तु या छवियों पर ध्‍यान केन्द्रित करने, एक जटिल विचार के माध्‍यम से सोचने अथवा एक उत्तेजक पुस्‍तक में हो जाने को भी शामिल करती हैं, ये सभी मोटे तौर पर ध्‍यान के प्रकार हैं। जबकि योग में ध्‍यान का अर्थ सामान्‍य रूप से मन को अधिक औपचारिक रूप से केन्द्रित करने और स्‍वयं को एक क्षण में देखने से संदर्भित किया जाता है। भारत और विदेश के कई लोग तनाव से छुटकारा पाने और मन को ताजा बनाने के लिए योग तथा ध्‍यान का आश्रय लेते हैं।
भारत में एक अन्‍य व्‍यापक रूप से प्रचलित विचाराधारा है कर्म की विचाराधारा, जिसके अनुसार प्रत्‍येक व्‍यक्ति को केवल सही कार्य करना चाहिए या एक व्‍यक्ति के रूप में इसके जीवन के पूर्ण वृत्त में वे ही तथ्‍य उसके सामने आते हैं।
पिछले दिनों भारत का एक अन्‍य महत्‍वपूर्ण पक्ष नए युग की महिला का प्रादुर्भाव है। भारत में महिलाएं मुख्‍य रूप से गृहिणियां हैं, जबकि अब यह परिदृश्‍य बदल रहा है। अनेक स्‍थानों पर, विशेष रूप से महानगरों और अन्‍य शहरों में महिलाएं घर के लिए रोजीरोटी कमाते हैं और वे अपने पुरुष साथियों के बराबर कार्य करती हैं। जीवन की लागत / अर्थव्‍यवस्‍थ में हुई वृद्धि से इस पक्ष के उठने में योगदान मिला है।
भारतीय नागरिकों की सुंदरता उनकी सहनशीलता, लेने और देने की भावना तथा उन संस्‍कृतियों के मिश्रण में निहित है जिसकी तुलना एक ऐसे उद्यान से की जा सकती है जहां कई रंगों और वर्णों के फूल है, जबकि उनका अपना अस्तित्‍व बना हुआ है और वे भारत रूपी उद्यान में भाईचारा और सुंदरता बिखेरते हैं।

लोक और जनजातीय कला

हमेशा से ही भारत की कलाएं और हस्‍तशिल्‍प इसकी सांस्‍कृतिक और परम्‍परागत प्रभावशीलता को अभिव्‍यक्‍त करने का माध्‍यम बने रहे हैं। देश भर में फैले इसके 35 राज्‍यों और संघ राज्‍य क्षेत्रों की अपनी विशेष सांस्‍कृतिक और पारम्‍परिक पहचान है, जो वहां प्रचलित कला के भिन्‍न-भिन्‍न रूपों में दिखाई देती है। भारत के हर प्रदेश में कला की अपनी एक विशेष शैली और पद्धति है जिसे लोक कला के नाम से जाना जाता है। लोककला के अलावा भी परम्‍परागत कला का एक अन्‍य रूप है जो अलग-अलग जनजातियों और देहात के लोगों में प्रचलित है। इसे जनजातीय कला के रूप में वर्गीकृत किया गया है। भारत की लोक और जनजातीय कलाएं बहुत ही पारम्‍परिक और साधारण होने पर भी इतनी सजीव और प्रभावशाली हैं कि उनसे देश की समृ‍द्ध विरासत का अनुमान स्‍वत: हो जाता है।
अपने परम्‍परागत सौंदर्य भाव और प्रामाणिकता के कारण भारतीय लोक कला की अंतरराष्‍ट्रीय बाज़ार में संभावना बहुत प्रबल है। भारत की ग्रामीण लोक चित्रकारी के डिज़ाइन बहुत ही सुन्‍दर हैं जिसमें धार्मिक और आध्‍यात्मिक चित्रों को उभारा गया है। भारत की सर्वाधिक प्रसिद्ध लोक चित्रकलाएं है बिहार की मधुबनी चित्रकारी, उड़ीसा राज्‍य की पता‍चित्र चित्रकारी, आन्‍ध्र प्रदेश की निर्मल चित्रकारी और इसी तरह लोक के अन्‍य रूप हैं। तथापि, लोक कला केवल चित्रकारी तक ही सीमित नहीं है। इसके अन्‍य रूप भी हैं जैसे कि मिट्टी के बर्तन, गृह सज्‍जा, जेवर, कपड़ा डिज़ाइन आदि। वास्‍तव में भारत के कुछ प्रदेशों में बने मिट्टी के बर्तन तो अपने विशिष्‍ट और परम्‍परागत सौंदर्य के कारण विदेशी पर्यटकों के बीच बहुत ही लोकप्रिय हैं।
इसके अलावा, भारत के आंचलिक नृत्‍य जैसे कि पंजाब का भांगडा, गुजरात का डांडिया, असम को बिहु नृत्‍य आदि भी, जो कि उन प्रदेशों की सांस्‍कृतिक विरासत को अभिव्‍यक्‍त करने हैं, भारतीय लोक कला के क्षेत्र के प्रमुख दावेदार हैं। इन लोक नृत्‍यों के माध्‍यम से लोग हर मौके जैसे कि नई ऋतु का स्‍वागत, बच्‍चे का जन्‍म, शादी, त्‍योहार आदि पर अपना उल्‍लास व्‍यक्‍त करते हैं। भारत सरकार और संस्‍थाओं ने कला के उन रूपों को बढ़ावा देने का हर प्रयास किया है, जो भारत की सांस्‍कृतिक पहचान का एक महत्‍वपूर्ण हिस्‍सा हैं।
कला के उत्‍थान के लिए किए गए भारत सरकार और अन्‍य संगठनों के सतत प्रयासों की वजह से ही लोक कला की भांति जनजातीय कला में पर्याप्‍त रूप से प्रगति हुई है। जनजातीय कला सामान्‍यत: ग्रामीण इलाकों में देखी गई उस सृजनात्‍मक ऊर्जा को प्रतिबिम्बित करती है जो जनजातीय लोगों को शिल्‍पकारिता के लिए प्रेरित करती है। जनजातीय कला कई रूपों में मौजूद है जैसे कि भित्ति चित्र, कबीला नृत्‍य, कबीला संगीत आदि आदि।
भारत के कुछ प्रसिद्ध लोक एवं जनजातीय जनजाति कला के बारे में अधिक जानकारी के लिए निम्‍नलिखित पर क्लिक करें।
  • तंजौर कला
  • मधुबनी चित्रकारी
  • वारली लोक चित्रकारी
  • पताचित्र चित्रकारी
  • राजस्थानी लघु चित्रकारी
  • कलमेजुथ

    तंजौर कला

    यह लोक कला कहानी किस्‍से सुनाने की विस्‍मृत कला से जुड़ी है। भारत के हर प्रदेश मे चित्रों का प्रयोग किसी बात की अभिव्‍यक्ति दृश्‍य चित्रण के माध्‍यम से करने के लिए किया जाता है जो कथन का ही एक प्रतिपक्षी रूप है। राजस्‍थान, गुजरात और बंगाल के ये कला रूप स्‍थान विशेष के वीरों और देवताओं की पौराणिक कथाएं सुनाती हैं और हमारे प्राचीन वैभव और भव्‍य सांस्‍कृतिक विरासत का बहुमूर्तिदर्शी चित्रण किया है। हर कृति अपने आप में एक पूर्ण वृतान्‍त है जो प्राचीन काल की एक झांकी प्रस्‍तुत करती है जिसे हमारे कलाकारों की प्रवीणता और निष्‍ठा ने जीवित रखा है।
    एक राजसी विरासत वाले धार्मिक चित्र तंजावर चित्रकारी, जिसे अब तंजौर चित्रकारी के नाम से जाना जाता है, की सर्वोत्तम परिभाषा है। तंजौर की चित्रकारी महान पारम्‍परिक कला रूपों में से है जिसने भारत को विश्‍व प्रसिद्ध बनाया है। इनका विषय मूलत: पौराणिक है। ये धार्मिक चित्र दर्शाते हैं कि आध्‍यात्मिकता रचनात्‍मक कार्य का सार है। कला के कुछ रूप ही तंजौर की चित्रकारी की सुन्‍दरता और भव्‍यता से मेल खाते हैं।
    चेन्‍नई से 300 कि.मी. दूर तंजावुर में शुरू हुई यह कला चोल साम्राज्‍य के राज्‍यकाल मे सांस्‍कृतिक विकास की ऊंचाई पर पहुंची। इसके बाद आने वाले शासकों के संरक्षण में यह कला आगे और समृद्ध हुई। शुरू में ये भव्‍य चित्र राजभवनों की शोभा बढ़ाते थे लेकिन बाद में ये घर-घर में सजने लगे।
    कला और शिल्‍प दोनों का एक विलक्षण मिश्रित रूप तंजौर की इस चित्रकारी का विषय मुख्‍य रूप से हिन्‍दू देवता और देवियां हें। कृष्‍ण इनके प्रिय देव थे जिनके विभिन्‍न मुद्राओं में चित्र बनाए गए है जो उनके जीवन की विभिन्‍न अवस्‍थाओं को व्‍यक्‍त करते हैं। तंजौर चित्रकारी की मुख्‍य विशेषताएं उनकी बेहतरीन रंग सज्‍जा, रत्‍नों और कांच से गढ़े गए सुन्‍दर आभूषणों की सजावट और उल्‍लेखनीय स्‍वर्णपत्रक का काम हैं। स्‍वर्णपदक और बहुमूल्‍य और अर्द्ध-मूल्‍य पत्‍थरों के भरपूर प्रयोग ने चित्रों को भव्‍य रूप प्रदान किया है। इन्‍होंने तस्‍वीरों में इस कदर जान डाल दी हैं कि ये तस्‍वीरें एक विलक्षण रूप में सजीव प्रतीत होती हैं। मानिक, हीरे और अन्‍य मूल्‍यवान रत्‍न-मणियों से जडित और स्‍वर्ण-पदक से सजी तंजौर के ये चित्र एक असली खजाना थे। लेकिन, आजकल, असली रत्‍न-मणियों की जगह अर्द्ध-मूल्‍यवान रत्‍नों का प्रयोग किया जाता है पर स्‍वर्ण-पत्रक का प्रयोग नहीं बदला है। तंजौर शैली की चित्रकारी में प्रयुक्‍त स्‍वर्ण पत्रकों की चमक और आभा सदैव बनी रहेगी।

मधुबनी चित्रकारी

मधुबनी चित्रकारी, जिसे मिथिला की कला (क्‍योंकि यह बिहार के मिथिला प्रदेश में पनपी थी) भी कहा जाता है, की विशेषता चटकीले और विषम रंगों से भरे गए रेखा-चित्र अथवा आकृतियां हैं। इस तरह की चित्रकारी पारम्‍परिक रूप से इस प्रदेश की महिलाएं ही करती आ रही हैं लेकिन आज इसकी बढ़ती हुई मांग को पूरा करने के लिए पुरूष भी इस कला से जुड़ गए हैं। ये चित्र अपने आदिवासी रूप और चटकीले और मटियाले रंगों के प्रयोग के कारण लोकप्रिय हैं। इस चित्रकारी में शिल्‍पकारों द्वारा तैयार किए गए खनिज रंजकों का प्रयोग किया जाता है। यह कार्य ताजी पुताई की गई अथवा कच्‍ची मिट्टी पर किया जाता है। वाणिज्यिक प्रयोजनों के लिए चित्रकारी का यह कार्य अब कागज़, कपड़े, कैनवास आदि पर किया जा रहा है। काला रंग काजल और गोबर को मिश्रण से तैयार किया जाता हैं, पीला रंग हल्‍दी अथवा पराग अथवा नीबूं और बरगद की पत्तियों के दूध से; लाल रंग कुसुम के फूल के रस अथवा लाल चंदन की लकड़ी से; हर रंग कठबेल (वुडसैल) वृक्ष की पत्तियों से, सफेद रंग चावल के चूर्ण से; संतरी रंग पलाश के फूलों से तैयार किया जाता है। रंगों का प्रयोग सपाट रूप से किया जाता है जिन्‍हें न तो रंगत (शेड) दो जाती है और न ही कोई स्‍थान खाली छोड़ा जाता है।
प्रकृति और पौराणिक गाथाओं के वही चित्र उभारे जाते है जो इनकी शैली से मेल खाते हों। इन चित्रों में जिन प्रसंगों और डिजाइनों का भरपूर चित्रण किया गया है वे हिन्‍दू देवी-देवताओं से संबंधित हैं जैसे कि कृष्‍ण, राम, शिव, दुर्गा, लक्ष्‍मी, सरस्‍वती, सूर्य और चन्‍द्रमा, तुलसी के पौधे, राजदरबारों के दृश्‍य, सामाजिक समारोह आदि। इसमें खाली स्‍थानों को भरने के लिए फूल-पत्तियों, पशुओं और पक्षियों के चित्रों, ज्‍यामितीय डिजाइनों का प्रयोग किया जाता है। यह हस्‍तकौशल एक पीढ़ी को सौंपती आई है, इसलिए इनके पारम्‍परिक डिजाइनों और नमूना का पूरी तरह से सुरक्षित रखा जाता है।
कृषि के अलावा आमदनी का एक साधन बनाए रखने की दृष्टि से अखिल भारतीय हस्‍तशिल्‍प बोर्ड और भारत सरकार महिलाओं को हाथ से बने कागज़ पर अपनी पारम्‍परिक चित्रकारी करके उसे बाज़ार में बेचने के लिए प्रोत्‍साहित करते रहे है। मधुबनी चित्रकारी अनेक परिवारों की आमदनी का एक मुख्‍य साधन बन गया है। पूरे विश्‍व में इस कला के चलने बाजार मिथिला की महिलाओं की उपाय कुशलता के लिए एक प्रशस्ति है, जिन्‍होंने भित्तिचित्र की अपनी तकनीकियों का कागज़ पर चित्रकारी के लिए सफल प्रयोग किया है।

वार्ली लोक चित्रकला

महाराष्‍ट्र अपनी वार्ली लोक चित्रकला के लिए प्रसिद्ध है। वार्ली एक बहुत बड़ी जनजाति है जो पश्‍चिमी भारत के मुम्‍बई शहर के उत्तरी बाह्मंचल में बसी है। भारत के इतने बड़े महानगर के इतने निकट बसे होने के बावजूद वार्ली के आदिवासियों पर आधुनिक शहरीकरण कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। 1970 के प्रारम्‍भ में पहली बार वार्ली कला के बारे में पता चला। हालांकि इसका कोई लिखित प्रमाण तो नहीं मिलता कि इस कला का प्रारम्‍भ कब हुआ लेकिन दसवीं सदी ई.पू. के आरम्भिक काल में इसके होने के संकेत मिलते हैं। वार्ली, महाराष्‍ट्र की वार्ली जनजाति की रोजमर्रा की जिंदगी और सामाजिक जीवन का सजीव चित्रण है। यह चित्रकारी वे मिट्टी से बने अपने कच्‍चे घरों की दीवारों को सजाने के लिए करते थे। लिपि का ज्ञान नहीं होने के कारण लोक वार्ताओं (लोक साहित्‍य) के आम लोगों तक पहुंचाने को यही एकमात्र साधन था। मधुबनी की चटकीली चित्रकारी के मुकाबले यह चित्रकला बहुत साधारण है।
चित्रकारी का काम मुख्‍य रूप से महिलाएं करती है। इन चित्रों में पौराणिक पात्रों, अथवा देवी-देवताओं के रूपों को नहीं दर्शाया जाता बल्कि सामाजिक जीवन के विषयों का चित्रण किया जाता है। रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी घटनाओं के साथ-साथ मनुष्‍यों और पशुओं के चित्र भी बनाए जाते हैं जो बिना किसी योजना के, सीधी-सादी शैली में चित्रित किए जाते हैं। महाराष्‍ट्र की जनजातीय (आदिवासी) चित्रकारी का यह कार्य परम्‍परागत रूप से वार्ली के घरों में किया जाता है। मिट्टी की कच्‍ची दीवारों पर बने सफेद रंग के ये चित्र प्रागैतिहासिक गुफा चित्रों की तरह दिखते हैं और सामान्‍यत: इनमें शिकार, नृत्‍य फसल की बुवाई, फसल की कटाई करते हुए व्‍यक्ति की आकृतियां दर्शाई जाती हैं।
शैली की दृष्टि से देखें तो उनकी पहचान यही है कि ये साधारण सी मिट्टी के बेस पर मात्र सफेद रंग से की गई चित्रकारी है जिसमें यदा-कदा लाल और पीले बिन्‍दु बना दिए जाते हैं। यह सफेद रंग चावल को बारीक पीस कर बनाया गया सफेद चूर्ण होता है। रंग की इस सादगी की कमी इसके विषय की प्रबलता से ढक जाती है। इसके विषय बहुत ही आवृत्ति और प्रतीकात्‍मक होते हैं। वार्ली के पालघाट, शादी-विवाह के भगवान को दर्शाने वाले बहुत से चित्रों में प्राय: घोड़े को भी दिखाया जाता है जिस पर दूल्‍हा-दुल्‍हन सवार होते हैं। यह चित्र बहुत पवित्र माना जाता है और इसके बाद विवाह सम्‍पन्‍न नहीं हो सकता है। ये चित्र स्‍थानीय लोगों की सामाजिक और धार्मिक अभिलाषाओं को भी पूरा करते हैं। ऐसा माना जाता है कि ये चित्र भगवान की शक्तियों का आह्वान करते हैं।
वार्ली के चित्रों में सीधी लाइन शायद ही देखने को मिलती है। कई बिन्‍दुओं और छोटी-छोटी रेखाओं (डेश) को मिलाकर एक बड़ी रेखा बनाई जाती है। हाल ही में शिल्‍पकारों ने अपने चित्रों में सीधी रेखाएं खींचनी शुरू कर दी है। इन दिनों तो पुरुषों ने भी चित्रकारी शुरू कर दी है और वे यह चित्रकारी प्राय: कागज़ पर करते हैं जिनमें वार्ली की सुन्‍दर परम्‍परागत तस्‍वीरें और आधुनिक उपकरण जैसे कि साइकिल आदि बनाए जाते हैं। कागज़ पर की गई वार्ली चित्रकार काफी लोकप्रिय हो गई है और अब पूरे भारत में इसकी बिक्री होती है। आज, कागज़ और कपड़े पर छोटी-छोटी चित्रकारी की जाती है पर दीवार पर चित्र अथवा बड़े-बड़े भित्ति चित्र ही देखने में सबसे सुन्‍दर लगते हैं जो वार्लियों के एक विशाल और जादुई संसार की छवि को प्रस्‍तुत करते हैं। वार्ली आज भी परम्‍परा से जुड़े हैं लेकिन साथ ही वे नए विचारों को भी ग्रहण कर रहे हैं जो बाज़ार की नई चुनौतियों का सामना करने में उनकी मदद करते हैं।

पत्ताचित्र चित्रकारी

चित्रकारी की पत्ताचित्र शैली उड़ीसा की सबसे प्राचीन और सर्वा‍धिक लोकप्रिय कला का एक रूप है। पत्ताचित्र का नाम संस्‍कृत के पत्ता जिसका अर्थ है कैनवास और चित्रा जिसका अर्थ है तस्‍वीर शब्‍दों से मिलकर बना है। इस प्रकार पत्ताचित्र कैनवास पर की गई एक चित्रकारी है जिसे चटकीले रंगों का प्रयोग करते हुए सुन्‍दर तस्‍वीरों और डिजाइनों में तथा साधारण विषयों को व्‍यक्‍त करते हुए प्रदर्शित किया जात है जिनमें अधिकांशत: पौराणिक चित्रण होता है। इस कला के माध्‍यम से प्रदर्शित एक कुछ लोकप्रिय विषय है: थे या वाधिया-जगन्‍नाथ मंदिर का चित्रण; कृष्‍णलीला-जगन्‍नाथ का भगवान कृष्‍ण के रूप में छवि जिसमें बाल रूप में उनकी शक्तियों को प्रदर्शित किया गया है; दसावतारा पति-भगवान विष्‍णु के दस अवतार; पंचमुखी-पांच सिरों वाले देवता के रूप में श्री गणेश जी का चित्रण। सबसे बढ़कर विषय ही साफ तौर पर इस कला का सार है जो इस चित्रों अर्थ को परिकल्पित करते हैं। इसलिए इसमें कोई आश्‍चर्य की बात नहीं है कि इस तरह की चित्रकारी करने की प्रक्रिया में पूरी तरह से ध्‍यान केन्द्रित करने और कुशल शिल्‍पकारिता की जरूरत होती है जिसमें केवल पत्ता तैयार करने में ही पांच दिन लग जाते हैं।
यह कार्य सबसे पहल पत्ता बनाने से शुरू किया जाता है। शिल्‍पकार जिन्‍हें चित्रकार भी कहा जाता है, सबसे पहले इमलह का पेस्‍ट बनाते हैं जिसे बनाने के लिए इमली के बीजों को तीन दिन पानी में भिगो कर रखा जाता है। इसके बाद बीजों को पीस कर पानी में मिला दिया जाता है और पेस्‍ट बनाने के लिए इस मिश्रण को मिट्टी के बर्तन में डालकर गर्म किया जाता है। इसे निर्यास कल्‍प कहा जाता है। फिर इस पेस्‍ट से कपड़े के दो टुकड़ों को आपस में जोड़ा जाता है और उस पर कई बार कच्‍ची मिट्टी का लेप किया जाता है जब तक कि वह पक्‍का न हो जाए। जैसे ही कपड़ा सूख जाता है तो उस पर खुरदरी मिट्टी के अन्तिम रूप से पालिश की जाती है। इसके बाद उसे एक नरम पत्‍थर अथवा लकड़ी से दबा दिया जाता है, जब तक कि उसको सतह एक दम नरम और चमड़े की तरह न हो जाए। यही कैनवास होता है जिस पर चित्रकारी की जाती है।
पेंट तैयार करना संभवत: पत्ताचित्र बनाने का सबसे महत्‍वपूर्ण कार्य है जिसमें प्राकृतिक रूप में उपलब्‍ध कच्‍ची सामग्री को पेंट का सही रूप देने में चित्रकारों की शिल्‍पकारिता का प्रयोग होता है। केथा वृक्ष की गोंद इसकी मुख्‍य सामग्री है और भिन्‍न-भिन्‍न तरह के रंग द्रव्‍य तैयार करने के लिए एक बेस के रूप में इस्‍तेमाल किया जाता है जिसमें तरह-तरह की कच्‍ची सामग्री मिलाकर विविध रंग तैयार किए जाते है। उदाहरण के लिए शंख को उपयोग सफेद रंग बनाने और काजल को प्रयोग काला रंग बनाने के लिए किया जाता है। कीया के पौधे की जड़ का इस्‍तेमाल सामान्‍यत: एक साधारण ब्रुश बनाने और चूहे के बालों का प्रयोग जरूरत होने पर बढिया ब्रुश बनाने के लिए किया जाता है जिन्‍हें लकड़ी के हैंडल से जो दिया जाता है।
पत्ताचित्र पर चित्रकारी एक अनुशासित कला है। इसमें चित्रकार अपनी रंग सज्‍जा जिसमें एक ही संगत वाले रंगों का प्रयोग किया जाता है, और नमूनों के प्रयोग की शैली का पूरी सख्‍ती से पालन करता है। स्‍वयं को इस कला के कुछ नियमों के दायरे में समेटकर ये चित्रकार इतनी सूक्ष्‍म अभिव्‍यक्ति करने वाले इतने सुन्‍दर चित्र प्रस्‍तुत करते है कि आश्‍चर्य होता है यह जानकर कि इसमें रंगों के विविध शेडो (रंगत) का प्रयोग निषिद्ध है। वास्‍तव में चित्रों में उभारी गई आकृतियों के भावों का प्रदर्शन ही इस कला का सुन्‍दरतम रूप है जिसे चित्रकार पूरे यत्‍न से सुन्‍दर रंगो से सजाकर श्रेष्‍ठ रूप में प्रस्‍तुत करते हैं।
समय के सा‍थ-साथ पत्ताचित्र की कला में उल्‍लेखनीय क्रांति आई है। चित्रकारों ने टस्‍सर सिल्‍क और ताड़पत्रों पर चित्रकारी की है और दीवारों पर लटकाए जाने वाले चित्र तथा शो पीस भी बनाए हैं। तथापि, इस प्रकार की नवीनतम से आकृतियों की परम्‍परागत रूप में अभिव्‍यक्ति और रंगो के पारम्‍परिक प्रयोग में कोई रूकावट नहीं आई है जो पीढ़ी दर पीढ़ी उसी रूप बरकरार है। पत्ताचित्र की कला की प्रतिष्‍ठा को बनाए रखने में इसके प्रति चित्रकारों की निष्‍ठा एक मुख्‍य कारण है और उड़ीसा में इस कला को आगे बढ़ाने के लिए स्‍थापित किए कुछ विशेष केन्‍द्र इसकी लोकप्रियता को उजागर करते हैं।

राजस्‍थानी लघु चित्रकारी

भारत में लघु चित्रकारी की कला का प्रारम्‍भ मुगलों द्वारा किया गया जो इस भव्‍य अलौकिक कला को फ़राज (पार्शिया) से लेकर आए थे। छठी शताब्‍दी में मुगल शासक हुमायुं ने फराज से कलाकारों को बुलवाया जिन्‍‍हें लघु चित्रकारी में विशेषज्ञता प्राप्‍त थी। उनके उत्तराधिकारी मुगल बादशाह अकबर ने इस भव्‍य कला को बढ़ावा देने के प्रयोजन से उनके लिए एक शिल्‍पशाला बनवाई। इन कलाकारों ने अपनी ओर से भारतीय कलाकारों को इस कला का प्रशिक्षण दिया जिन्‍होंने मुगलों के राजसी और रोमांचक जीवन-शैली से प्रभावित होकर एक नई विशेष तरह की शैली में चित्र तैयार किए। भारतीय कलाकारों द्वारा अपनर इस खास शैली में तैयार किए गए विशेष लघु चित्रों को राजपूत अथवा राजस्‍थानी लघु चित्र कहा जाता है। इस काल में चित्रकला के कई स्‍कूल शुरू किए गए, जैसे कि मेवाड (उदयपुर), बंदी, कोटा, मारवाड़ (जोधपुर), बीकानेर, जयपुर और किशनगढ़।
यह चित्रकारी बड़ी सावधानी से की जाती है और हर पहलू को बड़ी बारीकी से चित्रित किया जाता है। मोटी-मोटी रेखाओं से बनाए गए चित्रों को बड़े सुनि‍योजित ढंग से गहरे रंगों से सजाया जाता है। ये लघु चित्रकार अपने चित्रकारों के लिए कागज़, आइवरी पेन लो, लकड़ी की तख्तियों (पट्टियों) चमड़े, संगमरमर, कपड़े और दीवारों का प्रयोग करते हैं। अपनी यूरोपीय प्रतिपक्षी कलाकारों के विपरीत भारतीय कलाकार अपनी चित्रकारों में अनेक परिदृश्‍यों को शामिल किया है। इसके प्रयोग किए जाने वाले रंग खनिज़ों एवं सब्जियों, कीमती पत्‍थरों तथा विशुद्ध चांदी एवं सोने से बनाए जाते हैं। रंगों को तैयार करना और उनका मिश्रण करना एक बड़ी लंबी प्रक्रिया है। इसमें कई सप्‍ताह लग जाते हैं और कई बार तो सही परिणाम प्राप्‍त करने के लिए महीने भी लग जाते हैं। इसके लिए बहुत बढिया किस्‍म के ब्रुशों की जरूरत पड़ती है और बहुत अच्‍छे परिणाम प्राप्‍त करने के लिए तो ब्रुश आज की तारीख में भी, गिलहरी के बालों से बनाए जाते हैं। परम्‍परागत रूप से ये चित्र कला का एक बहुत शानदार, व्‍यक्तिपरक और भव्‍य रूप हैं, जिनमें राजदरबार के दृश्‍य और राजाओं की शिकार की खोज के दृश्‍यों का चित्रण किया जाता है। इन चित्रों में फूलों और जानवरों की आकृतियों को भी बार-बार चित्रित किया जाता है।
राजस्‍थान का किशनगढ़ प्रान्‍त अपनी बनी ठनी चित्रकारी के लिए प्रसिद्ध है। यह बिल्‍कुल भिन्‍न शैली है जिसमें बहुत बड़ी-बड़ी आकृतियां को चित्रित किया जाता है जैसे कि गर्दन, बादाम के आकार की आंखें और लम्‍बी-लम्‍बी अंगुलियां। चित्रकारी की इस शैली में बने चित्रों में अपने प्रिय देवता के रूप में अनिवार्य रूप से राधा और कृष्‍ण और उनके संगीतमय प्रेम को दर्शाया जाता है। अठारहवीं शताब्‍दी में राजा सावंत सिंह के शासनकाल के दौरान इस कला ने ऊंचाइयों को छुआ, जिन्‍हें बनी ठनी नाम की एक दासी से प्रेम हो गया था और इन्‍होंने अपने कलाकारों को आदेश दिया कि वे कृष्‍ण और राधा के प्रतीक के रूप में उनका और उनकी प्रेमिका का चित्र बनाएं। बनी ठनी चित्रकारों के अन्‍य विषय हैं: प्रतिकृतियां, राजदरबार के दृश्‍य, नृत्‍य, शिकार, संगीत, सभाएं, नौका विहार (प्रेमी-प्रेमिकाओं का नौका विहार), कृष्‍ण लीला, भागवत पुराण और अन्‍य कई त्‍योहार जैसे कि होली, दीवाली, दुर्गा पूजा, और दशहरा।
आज भी बहुत से कलाकार रेशम, हाथीदंत, सूती कपड़े और कागज पर लघु चित्रकारी करते आ रहे हैं। लेकिन समय के साथ-साथ प्राकृतिक रंगों की जगह अब पोस्‍टर रंगों का प्रयोग होने लगा है। लघु चित्रकला स्‍कूलों का भी व्‍यापारीकरण हो गया है और कलाकार अधिकांशत: प्राचीन कलाकारों के बनाए चित्रों की पुनरावृत्ति ही कर रहे हैं।

कालमेजुथु

रंगोली और कोलम आदि जैसे नाम हम लोगों के लिए नए नहीं है और न ही घरों और मंदिरों के प्रदेश द्वार पर इनके चित्राकंन की परम्‍परा ही नई है। वास्‍तव में यह हिन्‍दू परिवारों की दिनचर्या का ही एक हिस्‍सा है, जो घर में देवी-देवताओं के स्‍वागत के लिए देहली और आंगन में रंगोली के कुछ खास डिजाइनों के चित्रण को शुभ मानते हैं। कला का यह रूप आर्य, द्रविड़ और आदिवासी परम्‍पराओं का बहुत सुन्‍दर मिश्रण है।
कालम (कालमेजुथु) इस कला का एक विचित्र रूप है जो केरल में दिखाई देता है। यह अनिवार्य रूप से एक आनुष्‍ठानिक कला है जिसका प्रचलन केरल के मंदिरों और पावन उपवनों में जहां फर्श पर काली देवी और भगवान अथवा के चित्र बनाए जाते हैं। 'कालम' के स्‍वरूप कारकों को ध्‍यान में रखने की जरूरत होती है जैसे कि मंदिर अथवा पावन उपवन के मुख्‍य देवता, कालमेजुथु के अनुष्‍ठान का धार्मिक प्रयोजन और इसे सम्‍पन्‍न करने वाली एक खाख जाति। प्रत्‍येक मामले में इस कला के नियमों का कठोरता से पालन करते हुए नमूनों, सूक्ष्‍म ब्‍यौरों, आयामों और रंग योजना के बारे में निर्णय लिया जाता है। अवसरों के अनुसार इनके नमूने काफी भिन्‍न-भिन्‍न होते हैं परन्‍तु कलाकार द्वारा चुने गए नमूने विरले ही होते हैं।
कालमेजुथु के चित्रण प्राकृतिक रंग द्रव्‍यों और चूर्णों का प्रयोग किया जाता है और सामान्‍यत: ये पांच रंगों में होते हैं। चित्र केवल हाथों से बनाए जाते हैं और इनमें किसी अन्‍य का प्रयोग नहीं होता। तस्‍वीर बनाने का कार्य मध्‍य से शुरू किया जाता है और फिर एक-एक खण्‍ड तैयार करते हुए इसे बाहर की ओर ले जाते हैं। चूर्ण को अंगूठे और तर्ज़नी की मदद से चुटकी में भरकर एक पतली धार बनाकर फर्श पर फैला दिया जाता है। बनाए गए चित्रों में सामान्‍यत: क्रोध अथवा अन्‍य मनोवेगों की अभिव्‍यक्ति की जाती है। सभी चूर्ण और रंग द्रव्‍य पौधों से तैयार किए जाते हैं जैसे कि सफेद रंग के लिए चावल के चूर्ण, काले रंग के लिए जली हुई भूसी, पीले रंग के लिए हल्‍दी, लाल रंग के लिए नीबू और हल्‍दी के मिश्रण और हरे रंग के लिए कुछ पेड़ों की पत्तियों को प्रयोग में लाया जाता है। तेल से प्रदीप्‍त लैम्‍पों को कुछ खास-खास स्‍थानों पर रखा जाता है जिससे रंगों में चमक आ जाती है। कालमेजुथु कलाकार सामान्‍यतया कुछ समुदायों के सदस्‍य होते है जैसे कि करूप, थय्यपाड़ी नाम्बियार्स, थियाडी नाम्बियार्स और थियाड़ी यूनिस। इन लोगों द्वारा बनाए गए कालमों की अलग-अलग विशेषता है।
'कालम' पूरा होने पर देवता की उपासना की जाती है। उपासना में कई तरह के संगीत वाद्यों (नामत: इलाथलम, वीक्‍घम चेन्‍दा, कुझाल, कोम्‍बु और चेन्‍दा) को बजाते हुए भक्ति गीत गाए जाते हैं। ये भक्ति गीत मंत्रोच्‍चारण का ही रूप हैं, ये अनुष्‍ठान स्‍वयं कलाकारों द्वारा ही सम्‍पन्‍न किए जाते हैं। इन गीतों की शैली बहुत भिन्‍न-भिन्‍न होती है जिसमें लोक गीत से लेकर शास्‍त्रीय संगीत तब शामिल होते हैं। गीत की शैली इस बात पर निर्भर करती है कि किस देवता की पूजा की जा रही है। 'कालम' को पूर्व-निर्धारित समय पर बनाना शुरू किया है और अनुष्‍ठान समाप्‍त होते ही इसे तत्‍काल मिटा दिया जाता है।
(यह समस्त सामग्री साभार - 
http://bharat.gov.in/knowindia/lifestyle.php

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GHAZIABAD, Uttar Pradesh, India
कला के उत्थान के लिए यह ब्लॉग समकालीन गतिविधियों के साथ,आज के दौर में जब समय की कमी को, इंटर नेट पर्याप्त तरीके से भाग्दौर से बचा देता है, यही सोच करके इस ब्लॉग पर काफी जानकारियाँ डाली जानी है जिससे कला विद्यार्थियों के साथ साथ कला प्रेमी और प्रशंसक इसका रसास्वादन कर सकें . - डॉ.लाल रत्नाकर Dr.Lal Ratnakar, Artist, Associate Professor /Head/ Department of Drg.& Ptg. MMH College Ghaziabad-201001 (CCS University Meerut) आज की भाग दौर की जिंदगी में कला कों जितने समय की आवश्यकता है संभवतः छात्र छात्राएं नहीं दे पा रहे हैं, शिक्षा प्रणाली और शिक्षा के साथ प्रयोग और विश्वविद्यालयों की निति भी इनके प्रयोगधर्मी बने रहने में बाधक होने में काफी महत्त्व निभा रहा है . अतः कला शिक्षा और उसके उन्नयन में इसका रोल कितना है इसका मूल्याङ्कन होने में गुरुजनों की सहभागिता भी कम महत्त्व नहीं रखती.