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शनिवार, 24 अप्रैल 2010

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'आज तस्वीरों की जगह कचरा छप रहा है'

छायाकार रघु राय
रघु राय अपने छायाचित्रों के लिए दुनियाभर में ख्याति प्राप्त कर चुके हैं
रघु राय भारत में फ़ोटोग्राफ़ी का एक ऐसा नाम हैं जिसने इंदिरा गांधी का राजनीतिक सफ़र, गंगा के घाट, कलकत्ते की गलियाँ, भोपाल गैस त्रासदी, अखाड़ों के पहलवान और जीवन के, प्रकृति के बनते-बिगड़ते बिंबों को कैमरे में क़ैद करके अमर कर दिया.

इन फ़ोटोग्राफ़ों ने रघु राय को अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक पहचान दिलवाई और रघु राय भारत में फ़ोटोग्राफ़ी के सबसे बड़े नाम बन गए. पद्मश्री जैसे सम्मान रघु राय के झोले में आए.

पिछले दिनों रघु राय के साथ मैंने कुछ समय बिताया, फ़ोटोग्राफ़ी पर उनसे कुछ सबक लिए और बात की फ़ोटोग्राफ़ी के हुनर के उन तमाम पहलुओं पर जिन्हें रघु राय ने बरसों की मेहनत से हासिल किया है.

पढ़िए, इस बातचीत के कुछ ख़ास अंश-

रघु राय साहब, भारत में पिछले कुछ दशकों में फ़ोटोग्राफ़ी ने कई तरह के प्रयोग देखे हैं. बाज़ार में, मीडिया में और बाक़ी जगहों पर भी जिस तरह की फ़ोटोग्राफ़ी हो रही है, उसे आप किस तरह से देखते हैं.

देखिए, इस मामले में मैं ज़रा ज़ालिम आदमी हूँ और सच ही बोलूंगा. हमारे यहाँ जिस तरह की फ़ोटोग्राफ़ी हो रही है उसमें सुंदरता है, मिठास है, रंग भी है पर अधिकतर कामों में कोई ताज़गी, कोई प्रभाव नहीं है. बासी है.

इतना बड़ा देश, जिसे फ़ोटोग्राफ़र स्वर्ग कहते हैं, उसमें गिने-चुने फ़ोटोग्राफ़र हैं जो कुछ नया खोजकर सामने लाने की कोशिश कर रहे हैं. बाकी सब बस पुराने काम की नकल है, दोहराव है जो बहुत दुखद है.

न्यूज़पेपरों, मैगजीनों में कभी-कभार ही काम की कोई तस्वीर देखने को मिलती है. बाकी लगता नहीं है कि कोई विज़ुअल सेंसिटिविटी या इंटीग्रिटी हो.

छायाकार रघु राय का लिया एक चित्र
रघु राय अपनी तस्वीरों के विषय और संदेश के लिए जाने जाते हैं

अख़बारों में पेज थ्री के फ़ोटोग्राफ़ देखिए. वहां अभिजात्य वर्ग की पार्टियों की तस्वीरें मिलेंगी. यह तस्वीरें समाज के एक वर्ग के पहलुओं को बहुत प्रभावी ढंग से दर्शा सकती हैं लेकिन इन घटिया तस्वीरों में क्या दिखाया जाता है कि कोई झप्पी डाल रहा है, कोई ग्लास पकड़े खड़ा है, कोई किसी का चुंबन ले रहा है.

ये लोग तस्वीरों के नाम पर कचरा छाप रहे हैं.

क्यों फ़ोटोग्राफ़ी से आम आदमी, स्वाभाविक रंग जैसी बातें ग़ायब होती जा रही हैं. गिनेचुने कामों में ही स्वाभाविक रचनात्मकता देखने को मिलती है.

देखिए, अपनी रचनात्मकता के साथ फ़ोटोग्राफ़ी में प्रयोग करना बड़े दम की बात है. अगर हम सब इतने ही खोजी किस्म के होते तो यह दुनिया लाजवाब हो गई होती.

फ़ोटोग्राफ़ी को हर आदमी अपने-अपने तरीके से समझता है या जानने-समझने की कोशिश करता है. आपसे ही अगर पूछें तो फ़ोटोग्राफ़ी आपके लिए क्या है.

व्यक्तिगत स्तर पर तो फ़ोटोग्राफ़ी मेरे लिए पूरी दुनिया है.

फ़ोटोग्राफ़ी का उद्देश्य मेरे लिए बहुत स्पष्ट है. इसको लेकर न तो किसी तरह का भ्रम है और न ही इस बारे में कोई बदलाव की गुंजाइश है. यह एक एकदम अलग किस्म का माध्यम है.

एक उदाहरण देकर बताता हूं. 150 वर्ष पहले फ़ोटोग्राफ़ी शुरू हुई. उस दौरान कलकत्ते में दो अंग्रेज़ फ़ोटोग्राफ़र लाए गए ब्रिटिश राज के दौर की तस्वीरें लेने के लिए. इन्होंने इस दौरान काफ़ी अच्छी तस्वीरें खीचीं.

छायाकार रघु राय
मेरी वफ़ादारी किसी एक दल या व्यक्ति के प्रति नहीं थी. समाज के लिए थी

फ़र्ज़ कीजिए कि उस दौर में जिस जगह को फ़ोटो ली जा रही थी, उसी जगह की एक पेंटिंग कोई बड़ा पेंटर बना दे. डेढ़ सौ बरस बाद जब ये दोनों चीज़ें आप देखते हैं तो पेंटिंग देखकर मुँह से निकलता है वाह-वाह, अच्छी पेंटिंग है पर तस्वीर देखकर आपकी पहली प्रतिक्रिया होती है- अच्छा तो यह ऐसा था उस दौर में. एक आश्चर्य और सच को देख पाने का भाव होता है तब.

तो यह समझ लीजिए कि इतिहास को तो दोबारा लिखा जा सकता है पर तस्वीर दोबारा नहीं लिखी जा सकती. वो एक दौर का सच है जिसे बदला या सुधारा नहीं जा सकता. फ़ोटोग्राफ़ी को एक दायित्वबोध के साथ करने की ज़रूरत है. इस तरह से जैसे हम किसी दौर का दस्तावेज तैयार कर रहे हों.

जो आज आप खींचकर छोड़ जाएंगे, आने वाली पीढ़ियों के लिए वो एक दस्तावेज हो जाएगा. उनके पास यह सबूत होगा कि इतने बरसों पहले दुनिया कैसी थी.

आपका कहना है कि आप अपने लिए तस्वीरें खींचते हैं...

मैं कोई अलग बात नहीं कह रहा. आप एक संगीतकार को ही ले लीजिए. जो लोग दूसरों के लिए गाते हैं वो अच्छा नहीं गा पाते पर जो अपने लिए गाते हैं, दुनिया उनकी तारीफ़ करती है.

जो लोग कहते हैं कि आप अपने लिए काम करते हैं, हमारे लिए कब करेंगे उनसे मैं पूछता हूँ कि क्या उन्होंने मुझे कोई ज़िम्मेदारी दी थी, कोई नौकरी दी थी कि मैं उनकी आंखों के लिए जीऊं. मैंने तो आजतक ऐसा कोई वादा किसी से नहीं किया.

एक बात समझ लीजिए कि जो काम मन से किया गया है. अपनी अंतरआत्मा से किया गया है उसमें कोई छल नहीं होता और पूरी दुनिया उससे जुड़ जाती है.

फ़ोटोग्राफ़ी के संदर्भ में बार-बार कहा जाता है कि मीडिया में एक ज़िम्मेदाराना फ़ोटोग्राफ़ी की ज़रूरत है. इसे किस तरह से देखें.

छायाकार रघु राय
रघु राय भारत में आज के दौर की फ़ोटोग्राफ़ी से निराश हैं

मैं जब इंडिया टुडे में फ़ोटो एडिटर था तब भी यह बात कहा करता था कि एडिटर को और संपादकीय ज़रूरतों को ग़ौर से सुनो, समझो और फिर बाक़ी सब भूल जाओ.

मैंने इंदिरा गांधी की ऐसी भी तस्वीरें खीचीं जब लोग उन्हें देवी मानते थे. वो दूर्गा, लक्ष्मी की तरह पूजी जाती थीं. इसके बाद 1975 में जब वो चुनाव हारी तब भी मैंने उनकी तस्वीरें खीचीं जिसमें उनको रद्दी में डाल दिया गया था. लोगों ने मुझसे पूछा कि ऐसा क्यों किया आपने. इंदिरा जी ने तो आपको पद्मश्री दिया. सम्मान दिया. फिर आपने ऐसा कैसे किया.

दरअसल, मैंने कुछ नहीं किया. मेरा काम सच को दर्शाना है. मैंने वही किया. समाज जो बता रहा था, मैं उसका सच सामने ला रहा था. मेरी वफ़ादारी किसी एक दल या व्यक्ति के प्रति नहीं थी. समाज के लिए थी.

आपको अपने कौन से फ़ोटो सबसे ज़्यादा पसंद हैं.

कोई एक नहीं. इस बारे में कुछ भी कहना नहीं चाहता क्योंकि हर फ़ोटो एक क्षण की सच्चाई है. न कोई ज़्यादा अच्छा होता है और न कोई ख़राब. मैं इन्हीं तस्वीरों की देन हूं. मेरे लिए कोई ज़्यादा अच्छा या कम अच्छा नहीं है. यह चयन मैं आप लोगों पर छोड़ता हूँ.

आज इस मुक़ाम पर कहाँ पाते हैं आप अपने आप को...क्या कुछ करना बाक़ी है.

कितना बाकी है यह तो मैं नहीं जानता पर आगे हर क्षण बहुत क़ीमती है. कोई भी क्षण बेकार करने वाला नहीं है. जितना अनुभव बढ़ता है, उतनी ही संभावना दिखाई देती है और जितनी संभावना दिखती है, उतना ही डर भी लगता है कि क्या करूंगा इतने सब का.

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GHAZIABAD, Uttar Pradesh, India
कला के उत्थान के लिए यह ब्लॉग समकालीन गतिविधियों के साथ,आज के दौर में जब समय की कमी को, इंटर नेट पर्याप्त तरीके से भाग्दौर से बचा देता है, यही सोच करके इस ब्लॉग पर काफी जानकारियाँ डाली जानी है जिससे कला विद्यार्थियों के साथ साथ कला प्रेमी और प्रशंसक इसका रसास्वादन कर सकें . - डॉ.लाल रत्नाकर Dr.Lal Ratnakar, Artist, Associate Professor /Head/ Department of Drg.& Ptg. MMH College Ghaziabad-201001 (CCS University Meerut) आज की भाग दौर की जिंदगी में कला कों जितने समय की आवश्यकता है संभवतः छात्र छात्राएं नहीं दे पा रहे हैं, शिक्षा प्रणाली और शिक्षा के साथ प्रयोग और विश्वविद्यालयों की निति भी इनके प्रयोगधर्मी बने रहने में बाधक होने में काफी महत्त्व निभा रहा है . अतः कला शिक्षा और उसके उन्नयन में इसका रोल कितना है इसका मूल्याङ्कन होने में गुरुजनों की सहभागिता भी कम महत्त्व नहीं रखती.