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सोमवार, 24 मई 2010

HUSAIN MF

हुसैन की भारत माता पर न्यायमूर्ति कौल का फैसला

मकबूल फिदा हुसैन के खिलाफ़ अश्लीलता और अपमान के आरोपों वाली तीन याचिकाओं ( ११४/२००७, २८०/२००७ और २८२/२००७) जिनमें कि बहुउल्लेखित और चर्चित भारतमाता वाले चित्र वाली याचिका भी शामिल है, पर दिल्ली हाईकोर्ट ने ८ मई २००८ को फ़ैसला सुनाते हुए, खारिज कर दिया था। इस फ़ैसले में न सिर्फ़ कला पर वरन और भी कई मानसिकताओं पर पुरजोर टिप्पणियां की गई हैं।

दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति संजय किशन कौल द्वारा, कला की गहराइयों, कलाकार के नज़रिये, अन्य देशों के कानूनों और न्यायिक मतों, भारत में ही पूर्व मामलों, कलात्मक स्वतंत्रता और अश्लीलता, सामयिक मापदंडों, सौन्दर्यबोध अथवा कलात्मक प्रवृति, साहित्यकारों/कलाविदों की राय, अभिव्यक्ति की आज़ादी, आम आदमी की कसौटी, सामाजिक उद्देश्य या मुनाफ़ा, और दायित्वों की कड़ी कसौटी के मापदंड़ों पर इस मामले को कसते हुए, दिये इस फ़ैसले के कुछ उद्धरणों और चित्र की व्याख्याओं को यहां प्रस्तुत किया जा रहा है। (भारत माता का चित्र नीचे दिया गया है)



अपने फैसले में न्यायमूर्ति कौल ने कहा है--

. अश्लीलता पर भारत और विदेशों में बने कानूनों की कसौटियों पर ऊपर विचार विमर्श किया जा चुका है और वे स्पष्ट हैं। इन कसौटियों के मुताबिक मेरे विचार में यह पेंटिंग भादंवि की धारा २९२ के तहत अश्लील नहीं है। न तो यह पेंटिग कामोत्तेजक है और न ही कामवासना को बढावा देती है। न ही उसे देखने वाला कोई व्यक्ति भ्रष्ट अथवा पतित हो सकता है। दूसरे शब्दों में यह पेंटिंग किसी भी व्यक्ति में कामवासना नहीं भड़काती और न ही उसे भ्रष्ट करती है। इसके बावज़ूद कि कुछ लोग बुरा महसूस करेंगे कि तथाकथित भारतमाता को नग्न दिखाया गया है, पर मेरी राय में इसे अश्लीलता की कसौटी पर ठीक ठहराने के लिए कोई तर्क नहीं है। यह पेंटिंग जिसमें भारत को एक मानवाकृति में दिखाया गया है, किसी अवधारणा का नग्न चित्र होने के नाते किसी तरह से आम आदमी को शर्मिंदा नहीं करती। क्योंकि वह उसका कलात्मक मूल्य भी नहीं खोती।

. कलाकार/याचिकाकर्ता के नज़रिए से इस पेंटिंग को समझने के प्रयास से पता चलता है कि कैसे चित्रकार ने एक अमूर्त अभिव्यक्ति के जरिए एक राष्ट्र की अवधारणा को व्यथित स्त्री के रूप में दिखाया है। कोई संदेह नहीं कि राष्ट्र की अवधारणा लंबे समय से मातृत्व के विचार से जुड़ी हुई है। लेकिन सिर्फ़ इसलिए कि चित्रकार ने इसे नग्न रूप में अभिव्यक्त किया है, अश्लीलता की कसौटी पर सही नहीं उतरती है, क्योंकि इस कसौटी में कहा गया है कि सेक्स अथवा नग्नता अकेले को ही अश्लील नहीं ठहराया जा सकता। यदि पेंटिंग को संपूर्णता में देखा जाए तो यह साफ़ होता है कि प्रतिवादियों के वकील की जो दलील कि यह नग्न है, उसके विपरीत किसी भी देशभक्त भारतीय के मन में इसे देखकर घृणा का भाव नहीं उठेगा और न ही इसमें आंखों को चुभने वाली कोई चीज़ है। तथ्य यह है कि जिसे नग्नता के रूप में अश्लीलता कहा जा रहा है, उसकी वज़ह से पेंटिंग में भौंचक्काकर देने वाला कलाबोध आ गया है, जबकि नग्नता इतनी गैरमहत्वपूर्ण हो गई है कि उसे आसानी से नज़रअंदाज़ किया जा सकता है।

. कभी हैंस हॉफमैन ने कहा था और मैं जिसका उल्लेख कर रहा हूं : “कोई भी कलाकृति अपने आपमें एक दुनिया होती है, जो कलाकार की दुनिया की संवेदनाएं और भावनाएं प्रतिबिंबित करती है”। इसे ही दूसरे शब्दों में एड़वर्ड़ हॉपर ने कहा है : “महान कला किसी भी कलाकार की अंदरूनी ज़िंदगी की बाहरी अभिव्यक्ति होती है”। यदि ये बातें ठीक हैं तो यह कहना अनुचित नहीं होगा कि याचिकाकर्ता हमारे राष्ट्र की बढ़ती हुई अव्यक्त पीड़ा से व्यथित है और उसने उसे कैनवास पर उतारने का प्रयास किया है। इस पेंटिंग में कलाकार की सृजनशीलता का साक्ष्य है। उसमे एक महिला के आंसुओं या अस्तव्यस्त, उलझे हुए खुले बालों के जरिए एक चित्रकार हमारे देश के दुःखी और हताश चहरे की तस्वीर खींचना चाहता है, जो कि घोर वेदना और व्यथा के दौर से गुजर रहा है। इसमें एक महिला के दुःख को उसके लेटने के तरीके जिसमें उसने अपने चहरे को हाथ से ढ़ंका हुआ है, आंखें बंद की हुई हैं और उनमें एक आंसूं छलक रहा है, से व्यक्त किया गया है। महिला को नग्न दिखाना भी उसी अभिव्यक्ति का हिस्सा है और उसका मकसद किसी दर्शक की कामवासना को भड़काना नहीं है, बल्कि उसके दिमाग़ को झकझोरकर रखना है ताकि वह भारत की वेदना से जुड़ सके तथा इसके लिए दोषी व्यक्तियों से घृणा करने पर मजबूर हो। जो भी व्यक्ति पेंटिंग को देखेगा, उसकी प्रतिक्रिया आंसुओं में, मौन या इससे मिलती-जुलती होगी, परंतु कामवासना के रूप में तो कतई नहीं हो सकती। इस पेंटिंग की कई व्याख्याएं हो सकती हैं। एक व्याख्या यह भी हो सकती है कि वह पेंटिंग एक हताशा से भरे हुए भारत को दिखाती है जो कई समस्याओं से घिरा है, मसलन भ्रष्टाचार, अपराधीकरण, नेतृत्व का अभाव, बेरोजगारी, गरीबी, अधिक आबादी, निम्न जीवनस्तर, सिद्धांतों एवं मूल्यों का क्षरण आदि। एक व्याख्या यह भी हो सकती है कि भारतमाता को वंचना से जूझ रहे एक रूपक के तौर पर चित्रकार ने प्रयुक्त किया हो, क्योंकि जिस समय पेंटिंग बनाई गई, उस वक्त देश में भूकंप से काफ़ी बरवादी हुई थी। एक व्याख्या यह भी हो सकती है कि हिमालय की श्रेणियों को एक महिला के खुले बालों और रंगों के उदात्त उपयोग द्वारा दर्शाया गया है। यह कलाकृति को कलाबोध प्रदान करता है।
. इस संदर्भित पेंटिंग में नग्न महिला ऐसी मुद्रा या भंगिमा, में नहीं है और न ही उसके आसपास के वातावरण को इस तरह चित्रित किया गया है कि वह बददिमाग़ लोगों में सेक्सी भावनाएं जगाए, जिसे असम्मानजनक कहा जा सके, जैसी कि प्रतिवादियों की दलील थी।……….यदि भिन्न विचार लिया जाए कि अगर चित्रकार भारत को मानवीय रूप में दिखाना चाहता था तो यह अधिक उपयुक्त होता कि उसे साड़ी या किसी लंबे कपड़े इत्यादि से लपेट देता, परंतु केवल इतना ही उसे दोषी ठहराने में पर्याप्त नहीं है। यह अलग बात है कि कुछ लोग भारतमाता को न्यूड पेंट करने पर कुछ कट्टरपंथी तथा दकियानूसी विचार रखते हों। लेकिन याचिकाकर्ता जैसे व्यक्ति पर इसके लिए अपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता, जो संभवतः भारतमाता को चित्रित करने में और आज़ादख्याल हो। हमारे संविधान में दी गई आज़ादी, समानता और बंधु्त्व की संकल्पना दूसरे विचारों के प्रति असहिष्णुता से नफ़रत करती है।………..

. जिस चीज़ ने कुछ लोगों के दिमाग़ बंद कर दिये हैं, उन्हें स्वामी विवेकानंद का एक कथन अवश्य पढना चाहिए--
” हम हर किसी को अपने मानसिक विश्व की सीमा से बांधना चाहते हैं और उसे
हमारे सिद्धांत, नैतिकता, कर्तव्यबोध और यहां तक कि उपयोगिता का बोध भी
सिखाना शुरू कर देते हैं। सारे धार्मिक संघर्ष दूसरों के ऐसे मूल्यांकन की देन हैं।
यदि हम सचमुच मूल्यांकन करना चाहते हैं तो यह ‘उस व्यक्ति के ख़ुद के आदर्श
के मुताबिक करना चाहिए, न कि किसी दूसरे के’। यह महत्वपूर्ण है कि दूसरों के
दायित्वों को उनकी नज़रों से देखा जाए और दूसरों के रीतिरिवाज़ों तथा प्रथाओं
को हमारे मापदंड़ों से नहीं देखा जाए“।

. हम एक ऐसे चौराहे पर खड़े हैं, जहां हमें आत्मावलोकन करने की जरूरत है, ताकि भीतर और बाहर दोनों देख सकें। ……आधुनिक भारत में समाज के मानदंड़ तेजी से बदल रहे हैं और इसलिए अब आधुनिकता के जमाने में हमें विभिन्न सोच-विचारॊं को खुले दिल से अपनाना चाहिए। लेकिन जहां कलाकार को अपनी कलात्मक स्वतंत्रता मिलनी चाहिए, वहीं वह वो सब करने के लिए स्वतंत्र नहीं है, जो सब वह चाहता है। एक वह कला है जो सुंदरता की अभिव्यक्ति है और दूसरी वह कला है जो अप-संस्कृति की फ़ूहड़ अभिव्यक्ति से भरे दिमाग़ की उपज है। इन दोनों कलाओं में फ़र्क करना होगा। अशिष्ट चीज़ो को बढ़ावा देने वाली कला को सभ्य दुनिया से हटाने की जरूरत है।

. मानवीय व्यक्तित्व तभी भरपूर फलेगा-फूलेगा और इंसानीयत उसी वातावरण में गहरी जड़ें जमा सकेगी और सुगंध दे सकेगी, जहां सभी मिलकर सहिष्णुता औए आज़ाद ख्याली का परिचय दें।

. हमारी सबसे बड़ी समस्या फिलहाल कट्टरपंथ है, जिसने लोकतंत्र की आत्मा का हरण कर लिया है। एक आज़ाद समाज में सहिष्णुता मुख्य विशेषता होती है। ख़ासतौर पर तब जब वह एक बड़ा और जटिल किस्म का समाज हो, जिसमें अलग-अलग मतों और हितों वाले लोग रहते हों। ……………यह समझा जाना चाहिए कि असहिष्णुता विचार-विमर्श और विचार की आज़ादी पर प्रतिबंध लगाती है। इसका प्रतिफल यह होता है कि असहमतियां सूख जाती हैं। और तब लोकतंत्र अपना अर्थ खो देता है।

. कला की आलोचना हो सकती है, बल्कि एक नागरिक समाज में विभिन्न मत व्यक्त करने के कई मंच व तरीके हो सकते हैं। लेकिन अपराध न्याय प्रणाली को किसी कला के खिलाफ़ आपत्ति दर्ज़ करने के लिए उपयोग नहीं करना चाहिए। इसे किसी अविवेकी के हाथ में औज़ार नहीं बनने देना चाहिए, जो इसका दुरुपयोग लोगों के अधिकारों के गंभीर उल्लंघन में करे। खास तौर पर सृजन क्षेत्र के लोगों के।………….

” दुर्भाग्य से इस दिनों कुछ लोग हमेशा पलीता लगाते रहते हैं। और प्रदर्शन करने
जो अक्सर हिंसक हो जाता है, के लिए उत्सुक रहते हैं। मुद्दा दुनिया की कोई भी
चीज़ हो सकती है, कोई किताब, पेंटिंग अथवा फिल्म आदि हो सकती है, जिसने
उनके समुदाय की ‘भावना को ठेस’ पहुंचा दी हो। ऐसी खतरनाक प्रवृतियों पर
लगाम कसनी चाहिए। हम एक राष्ट्र हैं और हमें अनिवार्य रूप से एक दूसरे का
सम्मान करना चाहिए और सहनशीलता रखनी चाहिए“। …………..

. उपरोक्त नज़रिए से याचिकाकर्ता के खिलाफ़ आदेश दिया जाना और गिरफ़्तारी वारंट निकाला जाना रद्द किया जाता है और उनके खिलाफ़ दायर पुनरीक्षण याचिकाओं को मंजूरी दी जाती है……..

उपसंहार

. विभिन्न नज़रियों के प्रति सहिष्णुता किसी का नुकसान नहीं करती। इसका मतलब सिर्फ़ आत्मनियंत्रण से है। लेखन, पेंटिंग अथवा दृश्य मीडिया के जरिए अभिव्यक्ति की विविधता बहस को बढावा देती है। किसी बहस को कभी बंद नहीं किया जाना चाहिए। ‘मैं सही हूं’ का अर्थ यह नहीं होता कि ‘तुम गलत हो’। हमारी संस्कृति विचार और कार्यों में सहिष्णुता को बढ़ावा देने वाली है। इस फ़ैसले को लिखते वक्त उम्मीद है कि यह कला क्षेत्र के लिए खुली सोच और व्यापक सहिष्णुता की भूमिका बनेगा। ९० साल की उम्र के एक चित्रकार को उसके घर पर होना चाहिए–कैनवास पर चित्र उकेरते हुए।


हस्ताक्षर


८ मई, २००८ न्यायमूर्ति संजय किशन कौल


(हुसैन को लेकर सारी बहस ये मान कर हो रही है कि उन्होंने देवी देवताओं की नंगी तस्वीरें बनाईं। मुझे शुरू से इस बात पर आपत्ति है। इस लिहाज से न्यायमूर्ति कौल का ये फैसला बेहद अहम है। मुझे ये रवि कुमार के ब्लाग सृजन और सरोकार में मिला। मूल फैसले का सुनील सोनी ने अनुवाद किया था जिसे उद्भावना के अंक 85 में छापा गया। मैं दोनों महानुभावों के प्रति आभार व्यक्त करते हूं कि उन्होंने एक बेहद जरूरी काम को अंजाम दिया।)

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मेरे बारे में

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GHAZIABAD, Uttar Pradesh, India
कला के उत्थान के लिए यह ब्लॉग समकालीन गतिविधियों के साथ,आज के दौर में जब समय की कमी को, इंटर नेट पर्याप्त तरीके से भाग्दौर से बचा देता है, यही सोच करके इस ब्लॉग पर काफी जानकारियाँ डाली जानी है जिससे कला विद्यार्थियों के साथ साथ कला प्रेमी और प्रशंसक इसका रसास्वादन कर सकें . - डॉ.लाल रत्नाकर Dr.Lal Ratnakar, Artist, Associate Professor /Head/ Department of Drg.& Ptg. MMH College Ghaziabad-201001 (CCS University Meerut) आज की भाग दौर की जिंदगी में कला कों जितने समय की आवश्यकता है संभवतः छात्र छात्राएं नहीं दे पा रहे हैं, शिक्षा प्रणाली और शिक्षा के साथ प्रयोग और विश्वविद्यालयों की निति भी इनके प्रयोगधर्मी बने रहने में बाधक होने में काफी महत्त्व निभा रहा है . अतः कला शिक्षा और उसके उन्नयन में इसका रोल कितना है इसका मूल्याङ्कन होने में गुरुजनों की सहभागिता भी कम महत्त्व नहीं रखती.