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सोमवार, 5 जुलाई 2010

हम पर शक न कीजिए

हम पर शक न कीजिए
भानु भारती
Story Update : Sunday, July 04, 2010 9:47 PM

यह एक बहुत बड़ा भ्रम है कि लेखक और कलाकार सामाजिक रूप से सक्रिय नहीं होते और हमेशा यूटोपिया में जीते रहते हैं। कलाकारों का काम चौराहे पर खड़े होकर भाषण देना नहीं, बल्कि सृजन करना है। यह एक ऐसा काम है, जिसका शाश्वत महत्व है, जबकि राजनीति तो अल्पजीवी और सामयिक है। चूंकि लेखक और कलाकार समाज में रहते हैं, ऐसे में, यह कहना और भ्रामक है कि वे समाज से जुड़े नहीं होते। अगर वे समाज से जुड़े नहीं होते, तो रचनात्मकता का निर्वाह कैसे करते हैं। अगर वे आदर्शलोक में जीते, तो वर्तमान और भविष्य के लिए रास्ता दिखाने का काम भला कैसे करते हैं?
सवाल यह है कि सामाजिक सक्रियता को आप किस रूप में देखते हैं? मैं नाटक करता हूं, क्योंकि नाटक एक सामाजिक अनुष्ठान है। रंगमंच एक सामाजिक कला है और यह समाज के बीच ही संभव है। मैंने अब तक जितने भी नाटक किए हैं, वे सब समाज के बीच से ही उठाए गए हैं। यही नहीं, मेरे हरेक नाटक में आपको राजनीतिक चेतना मिलेगी। ‘डूबी लड़की’ मेरा नया नाटक है, जो गोगोल की कहानियों पर आधारित है। इसे लोगों ने खूब पसंद किया, क्योंकि इसमें विख्यात रूसी कथाकार को मैंने बिलकुल अलग तरीके से पेश किया है। अब मेरे सामाजिक बोध का इससे बड़ा सुबूत क्या होगा कि मैंने देश के सबसे प्राचीन और अविकसित-उपेक्षित समुदाय पर काम किया है, क्योंकि मैं मानता हूं कि नाटकों की जड़ वहीं है।
मैं मानता हूं कि आज समाज पहले की तरह नहीं रह गया है। समाज में लोगों की सामूहिकता अब पहले जैसी नहीं रही। इसमें आदमी अकेला हो गया है। लेखक और कलाकार इसी को अपनी रचनाओं में प्रतिबिंबित करते हैं। समाज से जुड़े होना अलग बात है और समकालीन राजनीति पर टिप्पणी करना अलग बात। यह सही है कि महंगाई, राजनीतिक पार्टियों की संवेदनहीनता और जनता की परेशानी आदि ऐसे अनेक मुद्दे हैं, जिन पर जनता कलाकारों को मुखर होते देखना चाहती है। लेकिन याद रखना चाहिए कि ये सामयिक मुद्दे हैं, स्थायी नहीं। ऐसे मामलों में सक्रिय होना और सड़कों पर उतरकर नारे लगाना राजनेताओं का काम है, कलाकारों का नहीं। फिर ऐसा भी नहीं है कि कलाकार ऐसे मुद्दों पर चुप्पी साधे रहते हैं या मुंह चुराते हैं। मैंने पिछले दिनों एक अखबार में विशुद्ध रूप से राजनीतिक लेख लिखा। चूंकि नाटकों में मैं यह काम उस तरह नहीं कर सकता था, इसलिए मैंने लिखकर अपनी भूमिका अदा की। इसके बाद भी अगर लोगों को हम कलाकारों की सामाजिक प्रतिबद्धता पर शक है, तो यह दूसरी बात है।

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कला के उत्थान के लिए यह ब्लॉग समकालीन गतिविधियों के साथ,आज के दौर में जब समय की कमी को, इंटर नेट पर्याप्त तरीके से भाग्दौर से बचा देता है, यही सोच करके इस ब्लॉग पर काफी जानकारियाँ डाली जानी है जिससे कला विद्यार्थियों के साथ साथ कला प्रेमी और प्रशंसक इसका रसास्वादन कर सकें . - डॉ.लाल रत्नाकर Dr.Lal Ratnakar, Artist, Associate Professor /Head/ Department of Drg.& Ptg. MMH College Ghaziabad-201001 (CCS University Meerut) आज की भाग दौर की जिंदगी में कला कों जितने समय की आवश्यकता है संभवतः छात्र छात्राएं नहीं दे पा रहे हैं, शिक्षा प्रणाली और शिक्षा के साथ प्रयोग और विश्वविद्यालयों की निति भी इनके प्रयोगधर्मी बने रहने में बाधक होने में काफी महत्त्व निभा रहा है . अतः कला शिक्षा और उसके उन्नयन में इसका रोल कितना है इसका मूल्याङ्कन होने में गुरुजनों की सहभागिता भी कम महत्त्व नहीं रखती.