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रविवार, 15 जुलाई 2012

क्या फिर लुप्त हो जाएगा मोहनजोदड़ो?


http://www.bbc.co.uk/hindi/pakistan/2012/06/120628_mohenjodaro_ak.shtml

क्या फिर लुप्त हो जाएगा मोहनजोदड़ो?

 गुरुवार, 28 जून, 2012 को 18:08 IST तक के समाचार
पाकिस्तानी अधिकारियों का कहना है कि वे अपने यहाँ के सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल मोहनजोदड़ो के अवशेषों की रक्षा के लिए हरसंभव प्रयास कर रहे हैं. मगर कुछ विशेषज्ञों की राय है कि यदि कुछ बड़े क़दम नहीं उठाए गए तो कांस्य युग की ये ऐतिहासिक धरोहर सदा के लिए लुप्त हो जा सकती है.
4500 साल पुराने एक घर के बीच से गुज़रना एक अभिभूत कर देनेवाला अनुभव है.
ख़ासतौर से तब जब वो घर वैसा ही हो जैसा कि आज के दिनों में होता है, जहाँ आगे और पीछे दो दरवाज़े हों, एक-दूसरे से जुड़े कमरे, साफ़-सुथरी पकी ईंटें, यहाँ तक कि एक साधारण शौचालय और नाले भी.
हैरानी ये सोचकर होती है कि जिस घर की बात हो रही है, वो दो मंज़िलों वाला घर था.
मगर इससे भी अधिक रोमांच तब होता है जब आप कांस्य युग की इस असल गली से गुज़रें और इसके दोनों तरफ़ क़तारों में बने घरों को देखें.
और फिर इन रास्तों से गुज़रते-गुज़रते आप पहुँचें एक जगह जहाँ कभी बाज़ार लगा करता था.
ये शानदार योजनाबद्ध शहर है – मोहनजोदड़ो – दुनिया के सबसे प्राचीन शहरों में से एक.
2600 ईसा पूर्व बना ये शहर, अपनी जटिल योजनाबद्ध व्यवस्था, अविश्वसनीय वास्तुविद और जटिल जल और सफाई व्यवस्था के कारण दुनिया की सबसे विकसित शहरी व्यवस्था वाला शहर हुआ करता था.
समझा जाता है कि महान सिंधु घाटी सभ्यता के इस शहर में 35,000 लोग रहा करते थे.

बदहाली

"जब भी मैं यहाँ आती हूँ, मैं पहले से बुरा अनुभव करती हूँ. मैं यहाँ दो-तीन साल से नहीं आई. और अब जो देख रही हूँ तो ये नुकसान देखकर मेरी छाती फटी जा रही है."
डॉं आसमां इब्राहीम, पुरातत्वविद्
मगर इस शहर के आकार और इसकी चमत्कारी व्यवस्था को देखकर जहाँ मैं अभिभूत था, वहीं मुझे वहाँ ले जानेवाली गाइड, पाकिस्तान की प्रख्यात पुरातत्वशास्त्री, लगभग रोने को हो आईं.
डॉक्टर आसमां इब्राहीम ने कहा,”जब भी मैं यहाँ आती हूँ, मैं पहले से बुरा अनुभव करती हूँ.
"मैं यहाँ दो-तीन साल से नहीं आई. और अब जो देख रही हूँ तो ये नुकसान देखकर मेरी छाती फटी जा रही है."
वे वो स्थान दिखाती हैं जहाँ बड़ी क्षतियाँ हुई हैं.
मोहनजोदड़ो के निचले इलाक़े में, जहाँ कि मध्यवर्ग और कामगार तबके के लोग रहा करते थे, दीवारें नीचे से ऊपर की ओर दरक रही हैं. ये नई क्षति है.
भूमिगत जल में मौजूद लवण ईंटों को खा रहा है जो कि खुदाई से पहले, हज़ारों सालों से सुरक्षित रही थीं.
जैसे-जैसे हम शहर के ऊपरी हिस्सों की ओर बढ़ते हैं जहाँ कि सिंधु घाटी सभ्यता की संपन्न आबादी बसा करती थी, और जहाँ कि बड़े स्नानघर होने के संकेत मिलते हैं, वहाँ हालत और ख़राब लगती है.
कुछ दीवारें पूरी तरह गिर गई हैं, कुछ इसके कगार पर पहुँच गई हैं.
अपने समय में मोहनजोदड़ो एक अतिविकसित सभ्यता का एक अतिविकसित शहर हुआ करता था
डॉक्टर इब्राहीम कहती हैं,"संरक्षण के लिहाज़ से ये निःसंदेह एक जटिल स्थान है जहाँ लवणता, आर्द्रता और बारिश की समस्याएँ हैं."
मगर इनके संरक्षण के अधिकतर प्रयास इतने बेकार और बचकाने हैं कि उनसे नुक़सान और बढ़ा ही है.
इनमें एक उपाय ईंटों के ऊपर मिट्टी की कीचड़ का लेप करना था ताकि ये कीचड़ लवण और आर्द्रता को सोख ले.
मगर एक ओर जहाँ कीचड़ सूखकर टूट गई, वहीं उसने साथ-साथ पुरानी ईंटों के टुकड़ों को भी खींच लिया.
इस स्थान पर ऐसी जगहें भी दिखती हैं जहाँ कि सदियों पुरानी ईंटों के स्थान पर नई ईंटें लगा दी गईं.
मोहनजोदड़ो में म्यूज़ियम तक को लूट लिया गया और वहाँ से कई प्रख्यात चीज़ें चोरी कर ली गईं जिनमें मोहर भी हैं जिनका प्रयोग संभवतः व्यापारी छापे लगाने के लिए करते थे. उनको दोबारा बरामद नहीं किया जा सका.
इस जगह मौजूद एक गाइड ने भी बताया कि उसने इस ऐतिहासिक स्थल की हालत और रख-रखाव में तेज़ गिरावट होते देखा है.
वो कहता है कि हालाँकि अभी भी पाकिस्तानी पर्यटक आते हैं, मगर मोहनजोदड़ो आनेवाले विदेशी पर्यटकों की संख्या बहुत कम रह गई है.

नाकाम सरकारें

"हमें बहुत जल्दी कुछ करना पड़ेगा क्योंकि यदि ऐसा ही चलता रहा तो मेरा अनुमान है कि ये स्थल 20 साल से अधिक नहीं बचा रह सकेगा"
आसमां इब्राहीम
इस ऐतिहासिक धरोहर के साथ हो रहे नुक़सान को रोक पाने में कमज़ोर सरकारी पर्यटन रणनीति सक्षम नहीं हो पा रही.
पहले कई दशकों तक इसकी देख-रेख का ज़िम्मा पाकिस्तान सरकार पर था मगर हाल के समय में ये दायित्व सिंध की प्रांतीय सरकार को सौंप दिया गया.
सिंध सरकार ने अब इस स्थल के उद्धार के लिए एक तकनीकी टीम का गठन किया है.
डॉक्टर इब्राहीम कहती हैं,”हमें मोहनजोदड़ो की रक्षा के लिए हर क्षेत्र के लोगों की बात सुननी पड़ेगी.
"ये सही है कि वहाँ लवणता है. मगर स्थानीय किसान इसका इलाज जानते हैं. फिर हम क्यों नहीं?
"मगर हमें बहुत जल्दी कुछ करना पड़ेगा क्योंकि यदि ऐसा ही चलता रहा तो मेरा अनुमान है कि ये स्थल 20 साल से अधिक नहीं बचा रह सकेगा."
एक राहत की बात ये है कि शहर का कुछ हिस्सा अभी भी खोदा जाना बाकी है और इस तरह से वो सुरक्षित है.
कुछ विशेषज्ञों ने तो यहाँ तक कहा है कि पूरे के पूरे मोहनजोदड़ो को ही फिर से ढंक देना चाहिए ताकि और नुकसान ना हो.
और ये उन लोगों की हताशा का परिचायक है जो मोहनजोदड़ो को प्यार करते हैं और जिन्हें उस स्थल को नुक़सान होता देख पीड़ा हो रही है जो अपने समय में मिस्र, मेसोपोटामिया और चीन जैसी प्राचीन सभ्यताओं से टक्कर लिया करता था.

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GHAZIABAD, Uttar Pradesh, India
कला के उत्थान के लिए यह ब्लॉग समकालीन गतिविधियों के साथ,आज के दौर में जब समय की कमी को, इंटर नेट पर्याप्त तरीके से भाग्दौर से बचा देता है, यही सोच करके इस ब्लॉग पर काफी जानकारियाँ डाली जानी है जिससे कला विद्यार्थियों के साथ साथ कला प्रेमी और प्रशंसक इसका रसास्वादन कर सकें . - डॉ.लाल रत्नाकर Dr.Lal Ratnakar, Artist, Associate Professor /Head/ Department of Drg.& Ptg. MMH College Ghaziabad-201001 (CCS University Meerut) आज की भाग दौर की जिंदगी में कला कों जितने समय की आवश्यकता है संभवतः छात्र छात्राएं नहीं दे पा रहे हैं, शिक्षा प्रणाली और शिक्षा के साथ प्रयोग और विश्वविद्यालयों की निति भी इनके प्रयोगधर्मी बने रहने में बाधक होने में काफी महत्त्व निभा रहा है . अतः कला शिक्षा और उसके उन्नयन में इसका रोल कितना है इसका मूल्याङ्कन होने में गुरुजनों की सहभागिता भी कम महत्त्व नहीं रखती.