बुधवार, 18 अप्रैल 2012

Clive Bell


Clive Bell (1881-1964) was a British art critic and philosopher of art who defended abstract art. Bell's aesthetic theory was focused on aesthetic experience. He claimed (in his book Art, 1914) that there is a certain uniquely aesthetic emotion, and that aesthetic qualites are the qualities in an object that evoke this emotion. In the visual arts, what arouses this emotion is certain "forms and relations of forms" (including line and color), which Bell called "significant form". Aesthetic response to significant form is not to be identified, according to Bell, with other emotional responses. For example, a photograph of a loved one might evoke fond memories and feelings of love; the statue of the planting of the flag at Iwo Jima might arouse feelings of patriotism; the Vietnam War Memorial might evoke feelings of grief or lament (my examples). While these are all perfectly appropriate responses, they are not aesthetic responses. Rather the aesthetic response is a response to the forms and relations of forms themselves, regardless of what other meanings, associations or uses they may have. It is a strong emotion, often a kind of ecstasy, akin to the ecstasy felt in religious contemplation. The emotion, and the kinds of significant form that evoke it, are the same for cave art, Polynesian carvings, a Vermeer painting or a Cezanne.
Bell's theory has obvious philosophical connections to the aesthetics of Immanuel Kant, who also streesed the detachment of aesthetic appreciation from other sorts of interest we might have in an object. His views also have close affinities with the ethical intuitionism of his British contemporary, the philosopher G.E. Moore. Moore is famous for claiming, in Principia Ethica (Cambridge University Press, 1903) that goodness is a property that things have in themselves, and that we know things to be good by a kind of intuition: one simply contemplates an object or a state of affairs and recognizes immediately and directly that it is good, in much the same way that one recognizes that it is red. Bell agreed with Moore, and considered aesthetic value to be one of these intuited forms of goodness.
It is easy to see how Bell's aesthetic would enable him to defend abstract art. For him, the aesthetic value of a painting or sculpture has absolutely nothing to do with its success as a representation of something else. Vasari to the contrary notwithstanding, if the Renaissance masters are great, it is not because they were so good at imitating nature, but because of the formal properties of their work. Judged by this new standard, Bell found many highly praised masters from the Renaissance through Impressionism to be deficient. (That was his judgment in Art; in his later writings he showed more appreciation for these painters.)
Like the aesthetics of Kant, that of Bell has a certain initial appeal, and no doubt represents an insight. In discussing a work of art, does it not often seem appropriate to draw the conversation back to the aesthetic quality of the work, in distinction from its skillful technique, its romantic associations, or what have you? Nevertheless Bell's theory has not withstood criticism well. Among the difficulties it faces are its apparent circularity, a problem it shares with Moore's intuitionist ethics. The conceptual circle of aesthetic emotion, aesthetic quality, and significant form is so small that in the end, one cannot give reasons why a work is good. For a theory which means to claim that some works objectively have aesthetic value and others do not, this is a set-up for the tyranny of unjustified judgements by influential critics.
A second problem of Bell's view is its sharp separation between aesthetic and other emotions. Some writers have questioned whether there is any such thing as the "aesthetic emotion". Even if there is such an emotion, it seems obvious that the power and value of many works is tied into their communication of meaning, and that their formal properties are only part of the vocabulary they use to communicate this meaning. Bell's theory seems to leave symbolism out of account, and no view that does that can be an adequate aesthetic theory.
क्लाइव बेल (1881-1964) एक ब्रिटिश कला आलोचक और कला के दार्शनिक, जो अमूर्त कला का बचाव किया था. बेल सौंदर्य सिद्धांत सौंदर्य अनुभव पर ध्यान केंद्रित किया गया था. वह (अपनी पुस्तक कला, 1914 में) का दावा है कि वहाँ एक निश्चित विशिष्ट सौंदर्य भावना है, और कि सौंदर्य qualites को एक वस्तु में गुण है कि इस भावना पैदा कर रहे हैं. दृश्य कला में, क्या पैदा होती है इस भावना के कुछ रूपों "और रूपों के संबंध" (लाइन और रंग सहित) है, जो बेल महत्वपूर्ण फार्म "कहा जाता है. महत्वपूर्ण फार्म का सौंदर्यशास्त्र प्रतिक्रिया नहीं है बेल करने के लिए अनुसार पहचान की है, अन्य भावनात्मक प्रतिक्रियाओं के साथ. उदाहरण के लिए, एक प्यार करता था की एक तस्वीर एक प्यार के शौकीन यादों और भावनाओं आह्वान हो सकता है, Iwo Jima पर ध्वज के रोपण की प्रतिमा देशभक्ति की भावनाओं को उत्तेजित हो सकता है, वियतनाम युद्ध स्मारक दु: ख या विलाप की भावनाओं आह्वान (मेरे उदाहरण). जबकि इन सभी पूरी तरह से उपयुक्त प्रतिक्रिया कर रहे हैं, वे सौंदर्य प्रतिक्रियाओं नहीं हैं. बल्कि सौंदर्य प्रतिक्रिया स्वयं रूपों, चाहे अन्य अर्थ, संघों या क्या उपयोग करता है वे हो सकता है रूपों और संबंधों के लिए एक प्रतिक्रिया है. यह एक मजबूत भावना है, अक्सर उत्साह का एक तरह, परमानंद धार्मिक चिंतन में महसूस किया जैसा है. भावना, और महत्वपूर्ण फार्म के प्रकार है कि यह आह्वान, गुफा कला, Polynesian नक्काशियों, Vermeer चित्रकला या एक Cezanne के लिए वही कर रहे हैं.
बेल सिद्धांत इम्मानुअल कांत, जो हम एक वस्तु में हो सकता है ब्याज के अन्य प्रकार से भी सौंदर्य सराहना की टुकड़ी streesed के सौंदर्यशास्त्र के लिए स्पष्ट दार्शनिक कनेक्शन है. उनके विचारों को भी अपने ब्रिटिश समकालीन, दार्शनिक जीई की नैतिक अंतर्ज्ञेयवाद के साथ निकट समानताएं हैं मूर. मूर है प्रिन्सिपिया Ethica (कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, 1903) में दावा, कि अच्छाई है कि चीजें अपने आप में एक संपत्ति के लिए प्रसिद्ध है, और है कि हम बातें अंतर्ज्ञान का एक तरह से अच्छा हो पता है: एक बस एक वस्तु या एक राज्य चिंतन मामलों और तुरंत और सीधे यह स्वीकार करता है कि यह अच्छा है, ज्यादा एक ही तरीका है कि एक जानता है कि यह लाल है,. बेल मूर के साथ सहमति व्यक्त की, और सौंदर्य मूल्य अच्छाई की इन intuited रूपों में से एक माना जाता है.
यह आसान है देखने के लिए कैसे बेल का सौंदर्य उसे अमूर्त कला की रक्षा के लिए सक्षम होगा. उसके लिए, एक चित्र या मूर्ति के सौंदर्य मूल्य पूरी तरह से कुछ का प्रतिनिधित्व के रूप में अपनी सफलता के साथ कुछ नहीं करना है. Vasari इसके विपरीत करने के बावजूद, अगर पुनर्जागरणकालीन स्वामी महान हैं, क्योंकि वे प्रकृति की नकल करने में इतना अच्छा थे, लेकिन क्योंकि उनके काम की औपचारिक गुण नहीं है. इस नए मानक द्वारा न्याय, बेल प्रभाववाद के माध्यम से पुनर्जागरण की कमी होने से कई उच्च प्रशंसा स्वामी पाया. (यह कला में अपने निर्णय था, उसके बाद के लेखन में वह इन चित्रकारों के लिए और अधिक प्रशंसा दिखाया)
कांत, कि बेल का एक निश्चित प्रारंभिक अपील की है और इसमें कोई संदेह नहीं है के सौंदर्यशास्त्र की तरह एक अंतर्दृष्टि का प्रतिनिधित्व करता है. कला का एक काम पर चर्चा में, यह अक्सर नहीं करता है उचित लगता है काम की गुणवत्ता सौंदर्य बातचीत वापस खींचना अपनी कुशल तकनीक, अपनी रोमांटिक संघों, या आपके पास क्या से भेद में है? फिर भी बेल सिद्धांत अच्छी तरह से आलोचना झेल नहीं किया गया है. कठिनाइयों यह चेहरे के अलावा इसकी स्पष्ट घेरा, एक समस्या यह मूर intuitionist नैतिकता के साथ शेयर कर रहे हैं. सौंदर्य भावना, सौंदर्य, गुणवत्ता और महत्वपूर्ण प्रपत्र के वैचारिक चक्र इतना छोटा है कि अंत में, एक कारण नहीं दे क्यों एक अच्छा काम कर सकते हैं. एक सिद्धांत है जो दावा है कि कुछ काम करता है निष्पक्ष सौंदर्य मूल्य है और दूसरों को नहीं मतलब है, यह है अनुचित के अत्याचार के लिए सेट अप एक प्रभावशाली आलोचकों द्वारा निर्णय है.
बेल देखने की एक दूसरी समस्या सौंदर्य और अन्य भावनाओं के बीच एक तेज जुदाई है. कुछ लेखकों ने सवाल उठाया है कि क्या वहाँ "सौंदर्य भावना" के रूप में ऐसी कोई बात है. यहां तक ​​कि अगर वहाँ एक ऐसी भावना है, यह स्पष्ट लगता है कि शक्ति और कई कार्यों के मूल्य का अर्थ है अपने संचार में बंधा हुआ है, और उनके औपचारिक गुण शब्दावली वे इस अर्थ संवाद का उपयोग करें का ही हिस्सा हैं.बेल का सिद्धांत के प्रतीकों खाते के बाहर छोड़ रहा है, और कोई देख रहा है कि क्या है कि एक पर्याप्त सौंदर्य सिद्धांत हो सकता है.

बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

राजा रविवर्मा का कला संसार

राजा रवि वर्मा 
(अभिव्यक्ति से साभार)
राजा रविवर्मा का कला संसार
प्रभुजोशी
 

राजा रवि वर्मा भारतीय कलाजगत में एक ऐसे समय में अवतरित हुए थे, जब कला के सिर्फ दो छोर थे- एक तो था, 'शास्त्र`, जो सामंतयुगीन उच्चवर्ग के अधीन था और दूसरा था 'लोक`, जो ग्रामीण जनसमुदाय के बीच ही अपना सर्वस्व जोड़े हुए था।

शास्त्र के नाम पर दो-तीन स्पष्ट वर्गीकरण थे। मसलन, चित्रांकन की राजपूत शैली तथा मुगल कलमकारी। लेकिन, दोनों शैलियाँ ही अपने शानदार अतीत का वैभव खोना शुरू कर चुकी थीं। वे एक ध्वंस का सामना कर रही थीं। ईस्ट इंडिया कम्पनी के बढ़ते वर्चस्व ने सामंतयुगीन सत्ता को इतना युद्धरत बना दिया था कि कलाओं के परंपरागत संरक्षण का काम उनके लिए अब दूसरे क्रम पर था। कहना चाहिए कि कलाएँ उनकी प्राथमिकता के काफी निचले दर्जे पर थीं। इसके साथ ही जो भारतीय कलम और कूँचीकार चितेरों से काम ले रहे थे, उसमें बादशाह द्वारा शिकार किये जाने या राधाकृष्ण और शिवपार्वती के बहाने इरोटिक चित्रकारी की जा रही थी। कदाचित् यही वह कालखण्ड था जब भारतीय चित्रकला बंगाल स्कूल के जरिए अपनी अस्मिता की तलाश में जापान की जलरंग-पद्धति (वाश तकनीक) को अपनाकर एक नई सौंदर्य दृष्टि रचने के लिए संघर्षरत थी। प्रकारांतर से यह एक किस्म का नया उदयकाल था।

ठीक इसी काल संधि पर त्रिवेन्द्रम से पच्चीस किलोमीटर दूर किल्लीमनूर से निकल त्रावणकोर पहुँच कर एक पच्चीस वर्षीय युवक वियना की चित्र प्रदर्शनी में स्वर्ण पदक हासिल करता है। उन्नीसवीं सदी के योरपीय यथार्थवादी शैली में वह ऐसी दक्षता के साथ काम करता है कि समूचे कला जगत को हतप्रभ कर देता है। इसमें भी उल्लेखनीय बात यह थी कि उसने कला के किसी भी संस्थान से अकादमिक शिक्षा ग्रहण नहीं की थी। वह पूरी तरह आत्म-दीक्षित कलाकार ही था, जबकि, वह निष्णात जलरंगों में था और तैलरंगों को वही भारत में पहली बार इस्तेमाल कर रहा था। उसने वीणा बजाती हुई एक भारतीय स्त्री का चित्रांकन किया था। रंग की 'स्प्रेस क्रिएटिंग प्रापर्टी` का जो दोहन उसने किया था, वह किसी भी योरोपियन महत्वाकांक्षी चितेरे के लिए ईर्ष्या का कारण बन सकता था और हुआ भी यही कि भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के 'कमीशंड आर्टिस्टों` ने इस चित्रकार को ताउम्र अहमियत नहीं दी- और, कहने की ज़रूरत नहीं कि यह चित्रकार था, राजा रवि वर्मा।

राजा रवि वर्मा जन्म से राजा नहीं थे, लेकिन उन्हें उनकी अद्भुत प्रतिभा ने अंतत: राजा बना दिया। हालांकि वे एक बेहद सुरुचि सम्पन्न परिवार में ही जन्मे थे, जहाँ साहित्य और कला की अत्यन्त परिष्कृत समझ और अभिजात दृष्टि थी। माँ उमा अम्बा तथा पिता इजुमाविल नील कांतन भट्टत्रिपाद की संतान, राजा रवि वर्मा की प्रतिभा की पहचान, पहली बार उनके चाचा ने की थी। एक दफा 'राजा-राजा रवि वर्मा` राजभवन की दीवार पर तंजोर शैली में चित्रांकन कर रहे थे और बीच में थोड़ी देर के लिए काम छोड़कर उन्हें अन्यत्र जाना पड़ा। जब बाहर से लौटकर आए तो उन्होंने आश्चर्य से देखा कि उनके मात्र चौदह वर्षीय भतीजे ने न केवल उसमें रंग भर दिए हैं, बल्कि, चित्र का शेष रेखांकन भी पूरा कर दिया है।उन्होंने बालक को भावातिरेक में गले लगा लिया। बस यही वह क्षण था, जिसमें चाचा ने तय किया कि वे बालक को एक मशहूर चितेरा बनाकर रहेंगे।

वे बालक राजा रवि वर्मा को किल्लीमनूर से त्रावणकोर के महाराजा अयिल्लम तिरुनल के पास ले गए, जहाँ उसने राजप्रासाद के दरबारी चित्रकार रामास्वामी नायकर से जलरंग चित्रकारी सीखी। राजा रवि वर्मा के लिए ये समय कठिन तपस्या का समय था। एक ओर जहाँ उन्हें जलरंग जैसे माध्यम में दक्षता हासिल करना थी, वहीं दूसरी ओर रेखांकन के शास्त्रीय पक्ष का पर्याप्त अध्ययन करना भी था।सौभाग्यवश उन्ह राजप्रासाद में एक बहुत सम्पन्न पुस्तकालय भी मिल गया, जिसमें मलयालम और संस्कृत के साहित्य और कला पर एकाग्र सैकड़ों ग्रंथ थे, जिन्हें उन्होंने खंगाल डाला। विष्णुधर्मोत्तर पुराण के चित्रसूत्र, मूर्तिशास्त्र तथा संस्कृत नाटकों के गहन अध्ययन ने उनमें मिथकीय इमेजरी की विराट और विशिष्ट समझ, संवेदना और सौंदर्य-दृष्टि के विकास में एक ठोस आधारभूमि का काम किया। यहाँ तक कि बाद में राजा रवि वर्मा ने संस्कृत के छंदों में कविताएँ भी लिखीं।
इस तरह रंग और शब्द दोनों के मर्म को जानने के साथ ही उन्होंने संगीत के स्वरों को भी समझा। कथकली की कई मुद्राओं को उन्होंने एक कलाकार की दृष्टि से आत्मसात किया। इसी बीच एक दिन मद्रास के एक अखबार में तैलरंगों का एक विज्ञापन छपा। यह माध्यम उनके लिए नितांत अपरिचित और चुनौतीपूर्ण था। चाचा राजा-राजा रवि वर्मा ने अपने युवा भतीजे के लिए तैलरंगों को उपलब्ध कराया, लेकिन दिक्कत ये थी कि वे उसके इस्तेमाल की तकनीक से नितान्त अनभिज्ञ थे। उन्होंने त्रावणकोर के दरबार में पोर्टे्रट (व्यक्ति चित्र) बनाने के लिए आए एक ब्रिटिश चित्रकार थियोडोर जेनेसन से आग्रह किया कि वे उन्हें तैल रंगों में काम करने की तकनीक का प्रशिक्षण देने की अनुकम्पा करें, लेकिन जलरंग में राजा रवि वर्मा द्वारा किए गए काम को देख कर वह यह जान चुका था कि इस ऐसी अदम्य इच्छा से भरे प्रतिभाशाली युवक को तैलरंग का उपयोग सिखाना स्वयं के लिए एक खतरा मोल लेना होगा।

बहरहाल, ईर्ष्यावश उसने स्पष्ट इंकार कर दिया। उसने कहा कि वह उसके द्वारा बनाए चित्रों को तो देख सकता है, लेकिन रंग-संयोजन और रंग मिश्रण के समय वह किसी को भी अंदर आने की अनुमति नहीं देगा। युवा राजा रवि वर्मा ने गहरे मनोयोग के साथ भिड़ कर स्वयं ही सबकुछ सीख लिया और कुछ दिनों में महाराज तथा महारानी का सुंदर कम्पोजिशन उसी यथार्थवादी शैली में तैलरंग से बना दिया।

भारतीय परम्परागत चित्रशैली में मूलत: चित्रांकन में कागज की सतह पर एक आयामी ही काम होता था। वे चित्रकृतियाँ 'चित्रलेख` की सी थीं, क्योंकि उन चित्रकृतियों को देखकर यह नहीं बताया जा सकता था कि चित्रकार ने उस चित्र को किस जगह से देखकर बनाया है। वे 'सीन फ्रॉम नो व्हेयर` थे, जबकि चित्रांकन की योरपीय यथार्थवाद शैली में एक स्पष्ट पर्सपैक्टिव उभरता था, उसमें छाया और प्रकाश के बीच चीजों को देखने की अनिवार्यता थी। इसके अध्ययन के लिए उन्होंने पद्मानाभनपुर के मलाबार स्कूल ऑफ पेंटिंग में दाखिला भी लेना चाहा, लेकिन उनको निराशा ही हाथ लगी। इस घटना ने राजा रवि वर्मा को गहरा आघात दिया, लेकिन धीरे-धीरे उनकी काम करते रहने की निरन्तरता ने उन्हें इससे उबार लिया। बाद में उन्होंने स्वयं ही संस्था में प्रवेश पाने के विचार को त्याग दिया था तथा महाराजा की मदद से लंदन की रॉयल अकादमी द्वारा पश्चिम की चित्रकला पर प्रकाशित होने वाली पत्रिकाओं और बहुमूल्य पुस्तकों को मंगवाया और अत्यन्त सूक्ष्मता के साथ स्वयं ने योरपीय कलाकारों की तकनीक और चित्रभाषा को समझ कर काम करना शुरू किया।

संयोगवश लार्ड हर्बर्ड राजा रवि वर्मा के काम से इतना अधिक प्रभावित हुए कि उन्होंने उनकी चित्रकृतियों को अंतर्राष्ट्रीय कला प्रदर्शनियों में स्पर्धा के लिए भेजा और जब वहाँ उन्हें स्वर्णपदक मिला तो सारा दृश्य ही बदल गया। यह उनकी कला की ख्याति का ही सुफल रहा कि ड्यूक ऑफ बकिंघम ने राजा रवि वर्मा द्वारा महाकवि कालिदास के चर्चित महाकाव्य शाकुन्तल की नायिका को ध्यान में रखकर बनाई गई चित्रकृति 'शकंुतला` खरीदी। तब के समय में उन्होंने उसका मूल्य पचास हजार अदा किया था।यहाँ तक आते-आते उनके सामने एक मार्ग स्पष्ट हो चुका था कि अब उन्हें अपनी प्रतिभा को नाथकर अपनी कला को किस रास्ते पर ले जाना है। यहां यह स्पष्ट कर देना प्रासंगिक होगा कि उनके लिए जो कला दिशा चुनीं जा रही थी, उसकी वाजिब वजह यह थी कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी के कमीशण्ड आर्टिस्ट भारत आकर जो चित्रांकन कर रहे थे, उसमें जहां एक ओर भारत को सांपों, जादू-टोनों और भूख से बिलबिलाते नंगों-भूखों का देश बताया जा रहा था, वहीं दूसरी ओर पण्डों-पुजारियों और नदियों में करोड़ों की संख्या में एक साथ नहाने वालों का देश था। उस समय के ब्रिटिश चित्रकारों ने जो रेखांकन और चित्रांकन किये हैं, उनसे इस तथ्य का सत्यापन किया जा सकता है।

दरअसल, यह वह कालखण्ड था, जब औपनिवेशक सत्ता के विरुद्ध एक धीमी लपट लगभग सारे देश में उठ रही थी, क्योंकि भारतीयों को लग रहा था कि वे ब्रिटिश साम्राज्यवाद के शिकंजे में फंसकर अपनी अस्मिता खो रहे हैं। भारत की भव्य और विराट परम्परा पर वक्त की धूल जमती जा रही है।निश्चय ही उसकी तलाश में सिर्फ गर्दन मोड़कर पीछे देखा जा सकता था। निकट अतीत गड़बड़ था और भविष्य अस्पष्ट और एक गहरी धुंध के पार था। इसलिए निकट अतीत के उत्खनन को उन्होंने इरादतन रद्द करते हुए सुदूर अतीत अतीत या कहें कि पवित्र इतिहास की तरफ अग्रसर होना तय किया, क्योंकि वैराट्य और वैविध्य वहीं भर ही शेष था- जो ऊर्जा देने के विकल्प की तरह सामने था।शायद यही वह द्वंद्व थी, जिसने राजा रवि वर्मा को अपने चित्रों के विषयों को निर्धारित करने में एक बड़ी और निर्णायक भूमिका अदा की। उन्होंने संस्कृत नाटकों, गीत-गोविन्दम् और 'रसमंजरी` से मदद ली और योरपीय 'न्यू क्लासिकल रियलिज्म` की संभावनाओं का दोहन करते हुए, भारतीय पुराकथाओं और देवी-देवताओं का चित्रण आरंभ किया। किंचित् इसी कारण चित्रित देव-स्त्रियों की काया कुछ-कुछ पृथुल बनने लगीं।दरअसल, सौम्यभाव की निर्दोष सात्विकता को अपनी कला की गहरी ऐन्द्रिकता के जरिए अतिक्रमित किया।नतीजतन वे एक खा़स किस्म की सेंसुअसनेस से भरी स्त्रियां थीं, जो पूज्या से अधिक रूपविष्टता का भाव लिए हुए थीं। बहरहाल निर्विवाद रूप से यह कहा जा सकता है कि राजा रवि वर्मा की चित्रकृतियां रंग व्यवहार में राजा रवि वर्मा की क्षमताएँ रेम्ब्रां, गोया और टिशियन से रत्तीभर कम नहीं थी। अभी भी गोया की नेकेड माजा, रेम्ब्रां की 'सास्किया` या टिशियन की वीनस ऑफ अर्बिनो से राजा रवि वर्मा की किसी भी निवर्सना की तुलना बाआसानी की जा सकती है।बल्कि, यह कहा जा सकता है कि वे चित्रभाषा में भी योरोप के उपर्युक्त महान चित्रकारों के स्तर पर ठहरती हैं। कहना न होगा कि उनकी चित्रकृतियों में देह की कामाश्रयी अभिव्यक्ति, रंग-अभिव्यक्ति में काव्यात्मक लगती है। सेक्स को लिरिकल बनाने का यह अद्भुत उपक्रम था, जो हमारे रस-सिद्धान्त की समझ से पैदा हुआ था।

कहना न होगा कि निश्चय ही पुराकथाओं और देवी-देवताओं का चित्रण आसान नहीं था, क्योंकि उनके आभूषण और वस्त्रविन्यास के साथ ही साथ उस परिवेश और काल को भी समाहित करना था, जिसका कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं था।राजा रवि वर्मा ने महाराष्ट्रीयन नौगज की साड़ी को देवियों का दिव्य परिधान बनाया तो तत्कालीन कला-आलोचकों ने राजा रवि वर्मा की बहुत आक्रामकता के साथ आलोचना की। उनका तर्क था कि क्या तब ऐसे वस्त्र और परिधान संभव थे ? फिर साड़ी के साथ चित्रण में एक ऐसी स्थानीयता भी आ रही थी, जिससे मिथकीय पात्रों और चरित्रों की भौगोलिकता ही संदिग्ध और संकटग्रस्त होने लगी थी। राजा रवि वर्मा ने वसंतसेना नामक चित्र में नौगज वाली साड़ी को पहली बार ऐसा रूप दिया था कि धीरे-धीरे वह भारतीय स्त्री की सार्वदेशीय पोशाख बन गई। बाद में इसी उल्टे पल्ले वाली साड़ी को रवीन्द्रनाथ टैगोर की भाभी ज्ञानदानंदिनी ने पहनकर सर्वस्वीकृत बना दिया। बहरहाल साड़ी लपेटने की इस शैली ने परम्परा को समकालीनता प्रदान की और आज भी वह भारतीय स्त्री के अभिजात्य परिधान की एक बड़ी जगह घेरती है।

राजा रवि वर्मा सुबह चार बजे उठकर अपने चित्र बनाते थे। प्रकाश और छाया के सूक्ष्म अध्ययन और आंकलन के लिए यह समय सर्वाधिक उपयुक्त लगता है। इसमें अंधेरे की विदाई और उजाले की दबे पांव आमद होती है। एक नीम अंधेरे और नीम उजाले के बीच बैठकर वे घंटों अपने बनाए गए और बनाए जा रहे चित्रों को देखा करते थे। उनकी कृतियाँ धीरे-धीरे पूरे देश में लोकप्रिय होने लगी, जबकि भारतीय कलाजगत उन्हें निरन्तर निरस्त कर रहा था, उनकी कलादृष्टि राजपूत तथा मुगलकला के मिश्रण से निथरकर बनी चित्रदृष्टि को ठेस पहुँचा रही थी। उन्होंने शांतनु और मत्स्यगंधा, नल-दमयंती, श्रीकृष्ण-देवकी, अर्जुन-सुभद्रा, विश्वामित्र-मेनका जैसी जो चित्रकृतियां बनाई उनके जरिए उन्होंने स्त्री देह का भारतीय कलादृष्टि के परम्परागत ढांचे में बहुत शाइस्तगी से एक नया ही सौंदर्यशास्त्र रचा, लेकिन उन्हें भीतर कहीं यह बात सालती थी कि कलाकार और कला समीक्षक उनके काम को लगातार और निर्ममता के साथ निरस्त कर रहे हैं। यहां यह याद दिलाना भी प्रासंगिक होगा कि महर्षि अरविन्द ने बंगाल स्कूल के प्रति रहे आये अपने अनुराग की आसक्ति में राजा रवि वर्मा द्वारा रचित चित्रकृतियों पर अपनी आपत्ति प्रकट की थी।

अत: उन्होंने अपने छोटे भाई के साथ उत्तर भारत की सांस्कृतिक यात्रा की ताकि वे उसकी सांस्कृतिक और भौगोलिक समग्रता को पूरी तरह आत्मसात कर सकें। बाद इसके ही उन्होंने अपनी चित्रकृतियों में भूदृश्य भी चित्रित करना शुरू किया।बहरहाल, चित्र में पृष्ठभूमि के रूप में जो लैंडस्केप होते, वह उनके अनुज किया करते थे। इस बीच दीवान शेषशय्या ने टी. माधवराव के जरिए राजा रवि वर्मा को बड़ौदा के सयाजीराव महाराज से मिलवाया, जहाँ रहकर उन्होंने पोर्टे्रट तो किए ही, देवी-देवताओं को विषय बनाकर कई अद्भुत ऐतिहासिक चित्रकृतियाँ तैयार की।उनकी कृतियों से प्रभावित होकर स्वामी विवेकानन्द ने 'वर्ल्ड रिलीजन कांग्रेस ऑफ शिकागो` में उनके चित्रकृतियाँ प्रदर्शनार्थ मंगवाई, जहाँ उन्हें पदक भी प्रदान किए गए।

जहाँ एक ओर भारत में उनके द्वारा चित्रित स्त्री की देह को कामना की सृष्टि करने वाली कह के निरादृत किया जा रहा था, वहीं दूसरी ओर विदेशों में उनकी इस विशिष्टता की सराहना की जा रही थी। हालांकि आज भी कुछ कला समीक्षक उनकी सौंदर्यमूलक ऐन्द्रिकता की वजह से उनके द्वारा कला में चित्रित स्त्री के बारे में कहा जाता है कि राजा रवि वर्मा ने तो एक तरह से फेंसीफुल रिप्रजेंटेशन ऑफ वूमन्स बॉडी को ही पेंट किया है। यह सर्वविदित है कि स्त्री-चित्रण में जिस मॉडल की वे सहायता लिया करते थे, धीरे-धीरे वह उनके जीवन में इस कदर दाखिल हो गई कि उनके सरस्वती और लक्ष्मी के चित्रों में प्रकारांतर से उन्होंने उसी सुगंधी नाम की स्त्री की मुखाकृतियाँ और छवियों का आश्रय लिया।

पिछले कुछ वर्षों पहले सुगंधी या सुगनीबाई से उनका जो रागात्मक संबंध बना, उसको लेकर केतन मेहता और शाजी एन करूण ने हिन्दी फिल्म बनाने की घोषणा भी की थी, जिसमें सुगंधी की भूमिका के लिए माधुरी दीक्षित को प्रस्तावित किया गया था। कहते हैं कि दुर्भाग्यवश उस योजना पर काम शुरू ही नहीं हो पाया।

दरअसल, इसे समय की विसंगति ही कहा जाए कि यह उनका दुर्भाग्य रहा कि वे अपने जीवन के आखिरी वर्षों में मुम्बई आए, जबकि उनकी सर्जनात्मक ऊर्जा का चमत्कृत कर देने वाला वह कालखण्ड बीत चुका था। बम्बई आकर उन्होंने १८९४ में अपने चित्रकृतियों के छापे बनाकर अधिकतम लोगों के पास अधिकतम पहुँचने का संकल्प लिया। मुम्बई के लोनावाला में उन्होंने अपनी प्रेस स्थापित की। कहते हैं कि उन्होंने जर्मनी से ही तकनीशियन और छपाई मशीन मंगवाई थी। उनके लिए इन्ग्रेविंग का काम धुण्डीराज गोविंद किया करते थे, लेकिन हुआ यह कि धीरे-धीरे आर्थिक घाटा बढ़ता ही चला गया। क्योंकि वे इंग्रेविंग के लिए किए जा रहे निवेश पर स्वभावगत कारणों से यथोचित निगाह नहीं रख पाए और उन्हें छापाखाना बंद करना पड़ा। वे भारी कर्ज से घिर गये थे। धुण्डीराज गोविंद बाद में दादा फालके के नाम से जाने गए। बहरहाल, लेकिन उनके छापों ने उनके स्वप्न को आधा-अधूरा ही सही, लेकिन काफी कुछ अर्थों में कण-कण वाले भगवान, को घर-घर के भगवान् के रूप में साकार कर दिया। यह एक किस्म का नया डोमेस्टिकेशन ऑफ गॉड था। कहना न होगा कि मंदिर से उठाकर भगवान को राजा रवि वर्मा ने आम आदमी के घर की सामान्य बैठक का स्थायी नागरिक बना दिया।सारे देवी-देवता घर के सदस्य की तरह भारतीय घरों में दाखिल हो गए। उनके द्वारा बनाये गये चित्रों में ईश्वर अपने ईश्वरत्व से कुछ कम और मनुष्यत्व से कुछ ऊपर था।

उनके इसी प्रोलिफिक प्रॉडक्शन के प्रयास के कारण उन्हें कैलेंडर आर्टिस्ट कहकर फिर नए तरीके से खारिज किया जाने लगा। लेकिन, एक विचित्र स्थिति यह थी कि जहाँ एक ओर भारतीय कला-जगत में जितनी उनकी अस्वीकृति बढ़ रही थी, ठीक दूसरी ओर सामान्य जनता के बीच वे उतने ही अधिक स्वीकृत होते जा रहे थे। जनता में उनकी कला की इस पहुँच को ईस्ट इंडिया कंपनी भी पसंद नहीं कर रही थी। खासकर, जब उन्होंने शिवाजी और बाल गंगाधर तिलक के व्यक्ति चित्र बनाए तो वे तत्कालीन औपनिवेशक सत्ता के खिलाफ लड़ रहे आंदोलनकारी लोगों के बीच भी सम्मानजनक दृष्टि से देखे जाने लगे।अंग्रेजों को लगने लगा था, यह आदमी पराधीन मुल्क के अतीत के प्रति लोगों में अदम्य रागात्मक उन्माद पैदा कर रहा है-जो एक तरह से प्रेत को साक्षात करना है। प्रकारान्तर से यह देश में चल रहे तत्कालीन स्वदेशी आन्दोलन का कलाजन्य समर्थन था।

उम्र के आखिरी वर्षों में निश्चय ही वे अपनी ख्याति के चरम पर थे। उन्हें एशिया का रेम्ब्राँ कहा जाने लगा था, लेकिन उन्हें लग रहा था कि कला का मर्म तो वे अब समझने लगे हैं। वे घंटों एक जगह खड़े होकर दिन-रात काम करते थे। इसी श्रम ने उनकी देह को तोड़ना शुरू कर दिया था। इसी बीच उन्हें तब के राजरोग कहे जाने वाले मधुमेह ने घेर लिया। वे थकने लगे थे। उन्हें विदेशों से आमंत्रण आते थे, लेकिन समुद्रऱ्यात्रा न करने वाली उस पुरानी अवधारणा के चलते उन्होंने वे तमाम आमंत्रण ठुकरा दिए। वे देश में रहकर ही दुनिया भर का हो जाना चाहते थे।शायद, वे सोचते थे कि अपनी जड़ों को अपनी ही मिट्टी में धंसे रहना चाहिए।

इस उम्र तक वे वास्तव में ही बिना किसी तरह का राजमुकुट धारण किए राजा हो चुके थे। उनकी दो-दो पोतियाँ राजघराने में ब्याहकर राजरानियाँ बन चुकी थीं। वे सेतुलक्ष्मी को बहुत प्यार भी करते थे। रावण द्वारा सीता के हरण के चित्रण में उन्होंने सीता की मुखाकृति की प्रेरणा अपनी इसी पोती की छवि से ली थी।

बहरहाल, उनकी आत्मा के अतल में सुलगती छुपी थी एक आग, जिसकी लपट में उन्होंने प्रेम के मर्म को पहचाना था। इसी वक्त उनके खिलाफ तब के नैतिकतावादियों ने एक मुकदमा भी दर्ज किया गया था, जो इस मुद्दे को लेकर था कि उन्होंने जिस स्त्री का चेहरा सरस्वती या लक्ष्मी के प्रतिमानीकरण के लिए चित्रित किया था, उसी स्त्री का निवर्सन चित्र बनाकर उन्होंने भारतीय मानस के शुचिताबोध का अपमान किया, क्योंकि उस स्त्री की मुखाकृति पवित्र और पूज्या देवियों का पर्याय बन चुकी है। इस मुकदमे को लड़ने के लिए उन्होंने कोई वकील नहीं किया बल्कि उन्होंने स्वयं ही लड़ा और वे जीत भी गए। इस मुकदमे में की गई तवील जिरहों पर अभी तक कलाजगत ने ध्यान नहीं दिया है।जबकि वह एक अद्भुत पाठ हो सकता है, जो बता सकता है कि सामाजिक नैतिकता का कठिन प्रशिक्षण कलानुभव में विघ्न का कारण बनकर किस तरह सामने आ सकता है।

उन्हें कहाँ पता था कि यह जीवन का आखिरी दिन था। उनका सहायक विली नायर तमाम रंगों और तूलिका को करीने से जमा चुका था। सामने खाली चित्रफलक था। यह वही घड़ी थी, जब अंधेरे को विदा होना था और रोशनी को दाखिल होना था। वे चित्र के विषय पर विचार करते हुए बैठे थे। बाहर, उनके जीवन के साठ वर्ष पूरे हो जाने पर मनाए जाने वाले षष्टिपूर्ति उत्सव की साल भर से तैयारियाँ चल रही थीं। देह उनके लिए उत्सव ही रहा था। खासतौर पर स्त्री देह। पर, उनके भीतर ही नहीं, बाहर भी एक हतप्रभ-सा अंधेरा था, जो तय नहीं कर पा रहा था कि उसे किसे निगलना है और किसे छोड़ना है। विली ने देखा, विदा हुई नींद से छूटकर गिर गया था कोई कच्चा स्वप्न। एक अजीब-सी पीड़ा में उन्होंने चित्रफलक को देखा और आँखें खाली चित्रफलक को देखती हुई स्थिर हो गईं। मृत्यु से कोई संधि नहीं, जिसे देखा नहीं, जिसका पता ही नहीं हो, उससे कैसी और कौन-सी संधि ? फिर मृत्यु की यह खसलत है कि वह कलाहीन लोगों की तरफ से मुंह फेर लेती है, लेकिन, कलाकारों की तरफ बेसब्री से लपकती है।

वह रात के विदा और दिन के आगमन की घड़ी में अचानक आ गई। मृत्यु ने उनसे कहा होगा- लो अब चलो, अब चलो! बहुत कर लिया तुमने।एक जीवन में किये जाने वाले काम से कहीं ज्यादा। मृत्यु उन्हें चुपचाप अपने साथ लेकर चली गई। उनके सहायक विली नायर ने देखा, उनके जूते बाहर उतरे हुए हैं और वे जूते पहने बगैर ही इतनी दूर की यात्रा पर निकल गए हैं। निश्चय ही राजा रवि वर्मा ने अपनी गहन बौद्धिक कला चेतना से एक अर्द्ध-विस्मृत सम्पदा को खंगालने का ही ईमानदार उपक्रम किया था, जिसके चलते उन्होंने हमारे पौराणिक अतीत को न केवल पुनराविष्कृत किया बल्कि उसे समकालीनता की एक नई दीप्ति भी प्रदान की। लेकिन विडम्बना यह है कि उनका वही काम उनकी निन्दा और भर्त्सना बनकर उन्हीं से बदला लेने लगा।

अब जबकि डेढ़ सदी गुज़र चुकी है, लेकिन भारतीय कलाजगत के लिए अभी भी वे एक बिरादरी बाहर चित्रकार हैं। लोग उन्हें पहले से कहीं ज्यादा नकारने के लिए उद्यत है। यहां तक कि कला की दुनिया में महान् करने के दावे के साथ आने वाला युवक, जिसे अभी न तो ठीक से रेखा खींचना आया है और न ही रंग का वाजिब उपयोग --वह भी राजा रवि वर्मा को कूड़ेदान में फेंकने के बाद अपना काम शुरू करता है। कला के बाजारमुखी (मार्केट-ड्राइवन) समय में जबकि भारत में जलरंग का परम्परागत माध्यम लगभग हाशिये पर है और अधिकांश चित्रकार तैलरंग में ही काम करते हैं। लेकिन भारत में सबसे पहले तैलरंग में काम करने की शुरुआत करने वाले इस चित्रकार को, तब अपने तैलरंग माध्यम के कारण ही निंदा का पात्र बनना पड़ा था।उन्हें स्वदेशी भावना के विरूद्ध काम करने वाला चित्रकार बताया गया था, क्योंकि तब तैलरंग एक अभारतीय माध्यम था।
आज निश्चय ही एक नए और अनौपचारिक साम्राज्यवाद की चतुर्दिक वापसी हो रही है, ऐसे में राजा रवि वर्मा को फिर से आविष्कृत कहने की जरूरत है, चूँकि उन्होंने कला में हमारे उस पापुलर का सृजन किया, जिसके चलते हमने अपने पौराणिक अतीत को समकालीन बनाया। वे लोक और शास्त्र के मध्य एक अखण्ड सेतु थे। उनकी कला का डी.एन.ए. हमारी परम्परा से मिलता है। उन्हें पश्चिम की बाजारोन्मुख समकालीन कलाकार-बिरादरी चाहे अपने गोत्र का न मानते हुए भुला दे, लेकिन उनकी कृतियाँ ही उनका स्मारक हैं। उन्हें हम भारतीय चाहे याद न करें, लेकिन ईश्वर जरूर याद रखेगा, क्योंकि उन्होंने उसके कुनबे और अवतारों को मनुष्यों से परिचित कराया था। ईश्वर जब तक जिंदा रहेगा, आकाश से राजा रवि वर्मा के प्रति आभार प्रकट करता रहेगा। कला-मर्मज्ञों की रेवड़ उन्हें चाहे दफ्न कर दे, लेकिन वे उस अमर को गढ़ते हुए स्वयं कलाजगत के अनश्वर नागरिक हो चुके हैं।वे अपनी तमाम आलोचनाओं और निंदाओं से ऊपर हमें हमेशा याद आते रहेंगे।



मंगलवार, 20 दिसंबर 2011

"लघु कला मेला"

सुप्रिय मित्रों 
आपको सूचित करते हुए अपार हर्ष हो रहा है कि
चित्रकला के विद्यार्थी अपने बनाये लघु चित्रों का एक 
"लघु कला मेला" 
महाविद्यालय के मुख्य भवन के प्रांगन में कर रहे हैं 
दिनांक .२१ दिसंबर २०११  प्रातः ११ बजे 
जिसका शुभारम्भ 
प्राचार्य 
डॉ. आर.एम. जौहरी 
करेंगे 
कला मेला के उदघाटन की 
अध्यक्षता विभाग के 
अध्यक्ष 
डॉ.लाल रत्नाकर 
करेंगे.
कृपया आप समय से उपस्थित होकर 
कार्यक्रम में अभीवृद्धि करेंगे .


शुक्रवार, 18 नवंबर 2011

बुधवार, 7 सितंबर 2011

SYLLABOUS-2011-12-B.A-I,II,III


SYLLABOUS-2011-12
B.A. PART -I
DRAWING AND PAINTING
Ist Paper- Theory                   Code-No---                  M.M.40
Fundamentals of Visual Art & Indian folk Art.
Unit-I  Simple study : Definition and Meaning of Art  Elements of Painting
 1. Line
 2. Form
 3. Color
 4. Tone
 5. Texture
 6. Space
Unit-II Principles of Composition
 1. Proportion
 2. Rhythm
 3. Dominance
 4. Harmony
 5. Unity
 6. Balance
Unit-III Medium and Techniques
 1. Dry Medium
     Pastel Color
 2. Wet Medium 
     Water , Oil , Acrylic
Techniques
Pastel Color ,Water Color ,Tempera Color , Acrylic Color
Unit-IV Indian Folk Art
 1. Origin
 2. Definition
 3. Types-Rangoli, Mandana, Alpana, Sanjhileela, Godana, Aipan 
Suggested Readings:
1. Roopankan:                                    G.K. Agarawal
2. Chitrakala Ke Anga:                      C.L. Jha
3. Chitran Vidhan:                             Sharma and Kshotriya
1. Roopprada kala ke Mool Aadhar:  Sharma & Agarwal
2. Kala Ki Parakh:                              K.K. Jaiswal
3. Kala ka Darshan:                            Ramchandra Shukla
4. Kala Vivechana:                             Kumar Vimal
5.Kalagat Tatva  [Aakriti-1]               Kiran Pradeep
6.Chtran Vidhan Avam Samagri        S.D.Kshotriya
7.Bhartiya Lokkala                             Neelima Gupta
8.Roopradakala                                   R.A. Agrawal
9.Lokaabhivyakti                                Neelima Gupta
10.Kala Shikshan                               Chitralekha Singh
11.Kala Shikshan –Shikshak &Shiksharthi        Chitralekha Singh

B.A. PART -I
DRAWING AND PAINTING
IInd --PAPER- PRACTICAL     Code No--------                             M.M. 30
 Still Life Painting  
1. Size : Quarter Imperial  
2. Duration of Time: 3 Hours 
3. Medium : Oil/Water/Acrylic/Pastel 
4. Submission of Sessional work:
5 Plates , 5 Sketches
Division of Marks
Examination = 20 
5 Plates and 5 Sketches for submission = 5+5= 10            Total= 30
IIIrdPaper[Prac.] Code N0---------                                                    M.M.30
CreativeRendering.
1. Size: Quarter Imperial
2. Duration of Time: 3 Hours
3. Medium : Any Medium
4. Submission of  Sessional work: 5 Plates
5 Sketches
Division of Marks
Examination = 20 
5 Plates and 5 Sketches for submission
Total of Prac. Marks    =  5+5=10  (30+30=60   )  
INSTRUCTIONS  
1. Above mentioned second paper practical's in two units should be treated in two courses and two individual period should be allotted for every batch. One batch should be consituted of maximum 30 students.
2. Ist paper theory should be allotted another individual period.
3. Art material should be provided from the college for the demonstration by the teacher.
4. Drawing Boards should be provided for each student from the college. 
5. The objects of still life should be purchased by  the college for conducting Art classes. 5
PROPOSED SYLLABOUS-2011-12
B.A. PART -II
DRAWING AND PAINTING
IVth Paper- Theory    Code No---------     M.M.40
History of Indian Painting
Unit-I Pre-historic art in reference to Indian Painting
 1. Pre-historic Painting
 2. Indus Valley
Unit-II Buddhist Art:      (Buddha Period)
 1. Ajanta
 2. Bagh
 3. Sittanvasal
 4. Badami
 5. Ellora
Unit-III Medieval Art       (Medieval Period)
 1. Pal School
 2. Apbhransha/ Jain School/Western Indian Painting 
Unit-IV Rajasthani Style
 1. Mewar---Udaipur
 2. Marwar--KishanGarh
 3. Hadhoti—Bundi-Kota
 4. Dhundar--Jaipur
Mughal School
 1. Akbar
 2. Jahanghir
 3. Shahjahan
Pahari School
 1. Basholi
 2. Kangra
 3. Garhwal
Suggested Readings: 6
1. Bharat Ki Chitrakala:
2. Bhartiya Chtrakala ka Itihaas :
3.  Bhartiya Chitrakala ka Itihasic Sandarbh:
4.  Bhartiya Chitrakala ka Sankshipta Parichaya:
Raikrishna Das
C.L.   Jha
Gopal Madhukar Chaturvedi
Vachaspati Gairola
5. Kala Aur Kalam :
6. Bhartiya Chitrakala ka Itihaas :
7. Bhartiya Chitrakala ka Itihaas :
8. Indian Paintings :
9.Bhartiya Kala[AAkriti-2]
10.Bhrtiya Chitrakala ka Sankshipta Itihas
11 Bhartiya Chitra Kala           Asha Aanand & Seema
12.Drawing of Rajasthan       Chitralekha Singh
13.Paramparik Rekhankan     Archana Rani
G.K. Agarwal
R.A. Agrawal
Avinash Bahadur Verma
Percy Brown
Kiran Pradeep
L. C. Sharma
B.A. PART -II
DRAWING AND PAINTING
Vth PAPER- PRACTICAL    CODE NO----------------      M.M. 30
Copy from Old Masters (One figure composition )
 1. Size: Quarter Imperial 
 2. Duration of time: 3  Hours 
 3. Medium : Any Medium
[Water ,Acrylic]
 4. Submission of Sessional work: 5 Plates
5 Sketches
Division of Marks  
 Examination = 20 
 5 Plates and 5 Sketches for submission = 5+5 =10           
Total=  30
VIth  Paper
Portrait Study Bust [ Cast/Life]
Code No-------                                                                   M.M.  30
1. Size : Quarter Imperial 
2. Duration of time: 3 Hours 
3. Medium : Water/oil/Acrylic 
4. Submission of Sessional work: 5 Plates
5 Sketches
Division of Marks  
 Examination =  20 
 5 Plates and 5 Sketches for submission = 5+5 = 10           Total= 30
 Total Practical Marks =30+30=60  8
PROPOSED SYLLABUS-2011-12
B.A. PART -III
DRAWING AND PAINTING
VIIth Paper- Theory  Code No----                       M.M.40
Philosophy of Art and Modern Indian Painting
(18th Century AD upto Present Age)
Unit-I Simple Study
 1. Definition and Meaning of Art 
 2. Six Limbs of Indian paintings (Shadang) 
Unit-II Philosophy of Art
 1. Concept of beauty
 2. Art and Symbolism
 3. Art and Society
 4. Art and Modernity
Unit-III
A  Modern Art in Indian Painting (from 18th Century  upto present age)
1. Patna/Company School:
2.  Life and style of  Raja Ravi Verma
3. Bengal School/Renaissance period
Life and style Abanindranath  Tagore, Asitkumar Haldar, Nandlal Bose, Kshitindranath Mazumdar
B New Trends in Modern Indian paintings
1. Life and Style of     Jamini Roy,    Ravindranath Tagore,
Gagandranath Tagore,    Amrita Shergil Gill
Unit-IV Contemporary Indian Painting after Independence upto
Present age.
1. Life and Style of Satish Gujral, M.F. Husain,  K.K. Hebbar, N.S. Bendre, B. Prabha,, Ram Kumar.
Suggested Readings:  
1. Bharat Ki Chitrakala: 2. Bhartiya Chtrakala ka Itihaas : 3.  Bhartiya Chitrakala ka Itihasic Sandarbh: 4.  Bhartiya Chitrakala ka Sankshipta Parichaya: 5.  Abanindranath Tagore and the Art of His Times: Rai krishna Das C.L.   Jha ,Gopal Madhukar Chaturvedi ,Vachaspati Gairola ,Jaya Appaswamy. 1. Kala Aur Kalam : 2. Bhartiya Chitrakala ka Itihaas : 3. Bhartiya Chitrakala ka Itihaas : 4. Indian Paintings : 5. Kala Vilas : 6.Bhartiya Aadhunik Kala 7.Aadhunik Bhartiya Chitra Kala     G.K.Agrawal G.K. Agarwal R.A. Agrawal Avinash Bahadur Verma ,Percy Brown
R.A. Agarwal Kiran Pradeep 8.KalaSameeksha   G.K.Agrawal ,9. KalaSameeksha  Avam saundraShashtra  G.K.Agrawal,10.Saundarya                                      Rajendra Bajpai 11,SaundaryaShashtra    Hardwarilal Sharma 12.Saundarya Bodh Avam Lalitkalayein  Saroj Bhargava 13.Kala                                              Chitralekha Singh   14.Manavakriti Sanyojan      Archana Rani   15.Kalatmak Sanyojan                     Kiran Pradeep         
B.A. PART -III
DRAWING AND PAINTING
VIIIth PAPER- PRACTICAL  CODE NO---------                       M.M.30                
Pictorial composition (with minimum two human figures are compulsory)
1. Size: Quarter Imperial 
2. Duration of Time: 3 Hours 
3. Medium : Water
color/tempera[Poster]
4. Submission of Sessional work: 5 Plates,   5 Sketches 
Division of Marks
Examination = 20 
5 Plates and 5 Sketches for submission = 5+5=10             Total= 30
IXth Paper     Code No-----
Landscape [Outdoor or Creative]  M.M.  30    
 1. Size : Quarter Imperial 
 2. Duration of time: 3  Hours 
 3. Medium : Water/ oil 
 4. Submission of Sessional work: 5 Plates,
10 Sketches
Division of Marks
Examination =20 
5 Plates and 10 Sketches for Submission = 5+5 = 10      Total= 30
Or
Life Study Sketching
 1. Size :  A3 Size Drawing Sheet 
 2. Medium : Pencil, Charcoal Ink 
 3. Submission of Work: 10 Plates (Sketching) 
 4. Sketches (Book) 25 Sketches 
Division of Marks
Examination =20 
10 Plates and 25 Sketches for submission = 5+5 = 10     Total= 30
Total Practical Marks =60  11
INSTRUCTIONS
1. Drawing Boards should be provided to the students of B.A. Part I, II and III from the college.
2. Art materials such as colors, paper canvas should be provided from the college to the teachers for their demonstration of different art classes.
3. Still life objects, Cast of human body's parts, Cast Bust, antiques should be purchased by the college for conducting the art classes of graduate
level.
4. In B.A. Part I and B.A. II Second paper practical, consisting of Two different groups- the entry of marks should be consolidated.
5. In B.A. III, II Paper Practical-should be treated separately Practicals of B.A. I, B.A. II and B.A. III and its groups should be allotted period
individually in the time table.
 6. In each class B.A. Part I, II, III separate examiners should be appointed for practica

मेरे बारे में

मेरी फ़ोटो
GHAZIABAD, Uttar Pradesh, India
कला के उत्थान के लिए यह ब्लॉग समकालीन गतिविधियों के साथ,आज के दौर में जब समय की कमी को, इंटर नेट पर्याप्त तरीके से भाग्दौर से बचा देता है, यही सोच करके इस ब्लॉग पर काफी जानकारियाँ डाली जानी है जिससे कला विद्यार्थियों के साथ साथ कला प्रेमी और प्रशंसक इसका रसास्वादन कर सकें . - डॉ.लाल रत्नाकर Dr.Lal Ratnakar, Artist, Associate Professor /Head/ Department of Drg.& Ptg. MMH College Ghaziabad-201001 (CCS University Meerut) आज की भाग दौर की जिंदगी में कला कों जितने समय की आवश्यकता है संभवतः छात्र छात्राएं नहीं दे पा रहे हैं, शिक्षा प्रणाली और शिक्षा के साथ प्रयोग और विश्वविद्यालयों की निति भी इनके प्रयोगधर्मी बने रहने में बाधक होने में काफी महत्त्व निभा रहा है . अतः कला शिक्षा और उसके उन्नयन में इसका रोल कितना है इसका मूल्याङ्कन होने में गुरुजनों की सहभागिता भी कम महत्त्व नहीं रखती.