बुधवार, 2 फ़रवरी 2011

क्लासिक


 क्लासिक

क्लासिक मूलत: प्राचीन यूनान और रोम के लेखकों और उनकी कृतियों, किंतु अब, किसी भी देश और युग के कालजित्‌ कीर्तिलब्ध, सर्वमान्य या प्रतिष्ठित लेखकों और उनकी कृतियों के लिये प्रयुक्त शब्द। वर्तमान अर्थ में इस शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग ईसा की दूसरी सदी में रोमन लेखक औलस गेलियस ने किया। उसके अनुसार लेखक दो कोटि के होते हैं।
1. क्लासिकल स्क्रिप्तोर अर्थात्‌ वह जिनकी रचना प्रथम कोटि की या कीर्तिमानस्थापक होती है, और
2. प्राजीतारियस स्क्रिप्तोर अर्थात्‌ वह जिसकी रचना सर्वहारा की शैली में होने के कारण साधारण कोटि की या कालसापेक्ष होती है।
रोम के छठे राजा सेर्वियस तूलियस ने अपने संवैधानिक सुधारों में संपत्ति के अधिकार पर रोम के नागरिको के पाँच वर्ग बनाए थे। रोमन समाज के इस वर्गीय विभाजन में सबसे वैभवसंपन्न नागरिक ‘क्लासिक’ (सर्वोच्च या अभिजात) और सबसे निराश्रित और संपत्तिहीन नागरिक ‘प्रालीतारी’ (सर्वहारा) कहे गए थे। लेखकों की उपर्युक्त दो कोटियों का नामकरण इसी सामाजिक विभाजन के अनुकरण के आधार पर हुआ। आधुनिक युग में संगीत, चित्र, पूर्ति, चलचित्र आदि कलाओं के प्रतिष्ठित मेधावियों और उनकी रचनाओं के लिये भी कलासिक शब्द का व्यवहार किया जाने लगा है। क्लासिक शब्द की अर्थसीमा को और भी विस्तृत कर अब जीवन के किसी क्षेत्र में भी विश्रुत या स्थायी कीर्तिमान स्थापित करने वाले व्यक्ति, उसकी दक्षता, शैली या उपलब्धि, अनन्य या विख्यात क्रीड़ाप्रतियोगिताओं इत्यादि को भी क्लासिक कहा जाता है। यथा-क्रिकेट में डब्ल्यू. जी. ग्रेस और रणजी और हाकी में ध्यानचंद को क्लािसिक कहा जाता है। इसी प्रकार विश्वविख्यात घुड़दौड़ प्रतियोगिता डर्बी, नौकादौड़ प्रतियोगिता हेनली रीगैटा, टेनिस प्रतियोगिता ‘विबलडन’ इत्यादि को, उनके व्यावसायिक या अव्यावसायिक रूप को ध्यान में रखे बिना, ‘क्लासिक’ की संज्ञा दी जाती है। टी. एस. ईलियट ने अपने प्रसिद्ध लेख ‘ह्‌वाट इज़ ए क्लासिक’ में ए गाइड टु द ‘क्लासिक्स’ नामक पुस्तक का उल्लेख किया है, जिसका उद्देश्य पाठकों को प्रतियोगिता के पूर्व ही डर्बी में प्रथम आने वाले घोड़े के विषय में सही अनुमान करने की क्षमता प्रदान करना था। इस प्रकार क्लासिक शब्द के विभिन्न संदर्भो में विभिन्न अर्थ हैं।
जहाँ तक क्लासिक शब्द के साहित्यिक प्रयोग का प्रश्न है, पश्चिम की देन होते हुए भी, इसका प्रचलन अब संसार की सभी भाषाओं और साहित्यों में है। किसी भी प्राचीन भाषा या साहित्य को उससे प्रभावित या विकसित किसी आधुनिक भाषा या साहित्य के संदर्भ में ‘क्लासिक’ कहा जाता है। इस प्रकार संस्कृत को अधिकांश भारतीय भाषाओं या साहित्यों के संदर्भ में या प्राचीन चीनी भाषा और उसके साहित्य को आधुनिक चीनी भाषा और साहित्य के संदर्भ में ‘क्लासिक’ कहा जाता है। दूसरी ओर प्रत्येक भाषा के साहित्य का कालविभाजन कुछ विशेष साहित्यिक मूल्यों के आधार पर ‘क्लासिक’ तथा अन्य शब्दों में व्यक्त किया जाता है। इस प्रकार स्वयं संस्कृत और प्राचीन चीनी साहित्य के भीतर ‘क्लासिक’ काल माने जाते हैं। साथ ही संस्कृत के सापेक्ष हिंदी अ ‘क्लासिक’ भाषा और साहित्य है, किंतु हिंदु में भी अपना ‘क्लासिक काल’ है।
यहाँ ‘क्लासिक’ शब्द और उसके मूल्यों की विवेचना उन्हीं संदर्भो में की गई है जिनमें उनका विकास हुआ।

अनुक्रम

 [छुपाएँ]

[संपादित करें]प्राचीन ग्रीक और रोमन साहित्य

प्राचीन ग्रीस और रोम का साहित्य कालविस्तार, वस्तु और विधाओं की विविधता, शिल्पगत समृद्धि और यूरोपीय साहित्य और संस्कृति की मुख्य प्रेरणात्मक शक्ति की दृष्टि से असाधरण महत्व का है। उसका प्रसार होमर (ल. ९०० ई. पू.) से लेकर जुस्तिनियन (५२७ ई.) तक माना जाता है। १४ सदियों के इस लंबे साहित्यिक इतिहास के तीन कालविभाग किए जाते हैं:
(१) क्लासिकल- होमर से लेकर सम्राट सिकंदर की मृत्यु तक, (ल. ९०० ई. पू.-३२३ ई. पू.),
(२) हेलेनिक (३२३ ई. पू.-१०० ई.),
(३) हेलेनिकोत्तर या ग्रेको-रोमन (१०० ई.-५२९ ई.)।

[संपादित करें]क्लासिकल काल

इसे अंशत: वीरगाथाकाल कहना अनुचित न होगा, महाकाव्य, गीतिकाव्य, नाटक और गद्य-सभी में नवीन किंतु श्रेष्ठ कृतित्व का काल है। अंधकवि होमर वीरगाथाकाल के साथ साथ यूरोप का आदि कवि भी हैं। उसकी प्रसिद्ध रचनाओं, ‘ईलियद’ और ‘ओदेसी’, में यूनान के चारणों की लंबी मौखिक परंपरा और उसकी व्यक्तिगत प्रतिभा का संगम है। ग्रीक वीरछंद हेक्सामीअर में रचित युद्ध और पराक्रम की ये कथाएँ इतनी लोकप्रिय हुई कि इनके गायकों की ‘होमरीदाई’ (होमर के पुत्र) नामक श्रेणी बन गई। इन्हें होमर के लगभग ३०० वर्ष वाद छठी सदी ई. पू. में लिपिबद्ध किया गया। इसी वीरछंद का प्रयोग आठवीं सदी ई. पू. में हेसिआद ने अपनी नीतिपरक और दार्शनिक कविताओं में किया। बाद में हेसिआद की परंपरा में ही ज़ेजोफेनिज, पारमेनीदीज, एंपिदोक्लीज़ आदि दार्शनिक कवि हुए।
सातवीं सदी ई. पू. में ग्रीक लिरिक या गीतिकाव्य का जन्म हुआ। ‘लीरे’ नामक तंत्री वाद्ययंत्र के स्वर पर गाए जानेवाले इनगीतों का प्रारंभ राजनीतिक विष्यवस्तु से हुआ लेकिन बाद में उन्होंने प्रधानत: प्रयाणनिवेदन या मरसिया (ऐलेजी) का रूप ग्रहण किया। इनकी रचना आइएंबिक छंदों में होती थी। व्यक्तिगत गायन के लिये रचित इन गीतों के क्षेत्र में सबसे प्रसिद्ध नाम आल्कीयस और कवयित्री सैफ़ो के हैं। इन व्यक्तिगत गीतों के अतिरिक्त सामूहिक (कोरस) गीतों का भी उदय हुआ। इनका चरमोत्कर्ष छठी-पाँचवी सदी ई. पू. में पिंदार की रचनाओं में हुआ।
धार्मिक कृत्यों के अवसर पर साधारण जन द्वारा गाए जानेवाले ‘कोरस’ गीतों से पाँचवीं सदी ई. पू. में प्राचीन यूनानी साहित्य में नाटकों का अत्यंत महत्वपूर्ण विकास हुआ। त्राजेदी (दु:खांत नाटक) के क्षेत्र में ईस्किलस, सोफ़ोक्लीज़ और यूरीपीदीज़ और कामेदी (सुखांत नाटक) के क्षेत्र में अरिस्तोफ़नीज के नाम विख्यात हैं।
गद्य का विकास साहित्य की अन्य विधाओं के बाद, प्राय: चौथी सदी ई. पू. में हुआ। तीन मुख्य दिशाएँ थीं : वक्तृता, जिसमें सबसे प्रसिद्ध नाम दिमास्थेनीज़ का है, इतिहास जिसमें सबसे प्रसिद्ध नाम हेरीदोतस, यूकिदीदीज़ (यूसिडाइडीज़) और ज़ेनोफ़ोन के हैं।

[संपादित करें]हेलेनिक काल

इस काल के साहित्य में मौलिक प्रयोगों के स्थान पर अनुकरण और विद्वत्ता की प्रवृति अधिक है। इस काल की कविताएँ प्राय: प्रेमविषयक, लघु और परिमार्जित हैं। अपोलोनियस रोदियस ने प्राचीन वीरकाव्य की परंपरा को जीवित रखने और लोकप्रिय बनाने का असफल प्रयत्न किया। कालीमाखस के नेतृत्व में स्फुट प्रेमविषयक कविताओं का प्रचलन अधिक हुआ। अन्य कवियों में एरातस और निकांदर उल्लेखनीय हैं।
यह नाटक का ह्रासकाल था। दु:खांत नाटक के क्षेत्र में इस काल का सबसे प्रसिद्ध लेखक ली क्फ्ऱोन है।
इस काल की कविता में विकास की एक नई दिशा के रूप मे थियोक्रितस, बियोन और मौस्कस के पशुचारण, शोकगीतों, ग्वालगीतों का महत्वपूर्ण स्थान है।
वस्तुत: यह कान गद्य में अधिक समृध है। गणित, ज्योतिष, इतिहास, भूगोल, आलोचना, व्याकरण, भाषाशास्त्र आदि के संबंध में रचनाएँ प्रस्तुत हुई। इस काल के इतिहासकारों में पोलीबियस, स्त्रावो और प्लूतार्क विशेष प्रसिद्ध हैं।

[संपादित करें]हेलेनिकोत्तर काल

रोम द्वारा यूनान पर विजय के बाद का, अर्थात्‌ ग्रेको-रोमन साहित्य गद्य में इतिहास और आलोचना शास्त्र की दृष्टि से ही महत्वपूर्ण है। रोम के ईसाई धर्म में दीक्षित होने के बाद प्रकृतिपूजक ग्रीस के साहित्य और संस्कृति को बहुत चोट पहुंची। फिर इस युग में प्लूतार्क और लूसियन जैसे इतिहासकार और दियोनीसियस तथा लाजिनस जैसे आलोचनाशात्री हुए।
प्राचीन रोमन या लातीनी साहित्य प्रसार और समृद्धि दोनों ही दृष्टियों से प्राचीन ग्रीक साहित्य से घटकर है। इसके भी तीन विभाजन किए जाते हैं : (१) रिपब्लिक या गणतंत्र युग (२५०-२७ ई. पू.), (२) आगस्तस युग (२७ ई. पू.- १४ ई.), (३) साम्राज्य युग (१४ ई.-५२४ ई.)।
1. रिपब्लिक युग में प्रहसन, नाटक गद्य कविता के क्षेत्र में विशेष कार्य हुआ। प्रहसन में माक्कियस प्लातस, स्तातियस और तेरेंस या तेरेंतियस आफ़ेर, गद्य में वारे और प्रसिद्ध वक्ता तथा राजनीतिज्ञ सिसरो और कविता में लुक्रिशियस तथा कातुलस इस युग के प्रसिद्ध साहित्यकार हैं।
इन सभी लेखकों की विष्यवस्तु रोम के जीवन से संबद्ध थी, लेकिन इनकी रचनाओं के रूप पर प्राचीन ग्रीक साहित्य का गहरा असर है।
2. आगस्तस काल लातीनी साहित्य का स्वर्णयुग माना जाता है। इसके साथ लातीनी कविता के सबसे महान कवि वर्जिल का नाम जुड़ा हुआ है। गड़ेरिया जीवन संबंधी दस कविताओं, एक्लोग्ज़ और ग्रीक योद्धा इस के जीवन पर आधारित महाकाव्य, ज्योर्जिक्स के लिये प्रसिद्ध है। उसके साहित्य में ग्रीक और रोमन सांस्कृतिक परंपराओं, रोमन साम्राज्य के तत्कालीन गौरव और एक महान यूरोपीय सभ्यता के उदय के स्वप्न की अत्यंत प्रौढ़, परिमार्जित और समन्वित अभिव्यक्ति है। उसके दृष्टिकोण की सार्वभैम व्यापकता और उदारता और उसकी कविता में ग्रीक और लातीनी कविता की रूपगत शालीनता और सौंदर्य के चरमोत्कर्ष का उल्लेख करते हुए टी. एस. ईलियट ने कहा है : ‘हमारा कलासिक, समसत यूरोप का क्लासिक, वर्जिल है’।
इस युग के दो अन्य विख्यात कवियों में होरेस और ओविद हैं। पहला अपनी व्यंग्य और कटाक्षपूर्ण रचनाओं और कसीदों (ओडों) के लिये और दूसरा प्रणयकविताओं और मरसियों के लिये प्रसिद्ध है।
लिवियस या लिवी इस यु ग का प्रसिद्ध इतिहासकार है। उसने रोम का इतिहास लिखा।
3. साम्राज्यकाल के दो उपविभाजन किए जाते हैं: (अ) रजत काल (१४ ई.-११७ ई.), (ब) ईसाई काल (११७ ई.-५२४ ई.)। रजतकान के प्रसिद्ध साहित्यकारों में सेनेका ने ग्रीक परंपरा में त्राजेदी, ल्यूकन ने महाकाव्य, फ्लाकस और जुवेनाल व्यंग्य और कटाक्ष, प्लिनी ने इतिहास, क्विंतिलियन ने साहित्यालाचन और इतिहास तथा तासितस ने जीवनचरित, इतिहास, साहित्यिक आलोचना इत्यादि की रचना से लातीनी साहित्य को समृद्ध किया । विद्वानों के मतानुसार वास्तव में रजतयुग के साथ लातीनी साहित्य के क्लासिकल युग की अंत हो जाता है, क्योंकि इसके बादवाले लातीनी साहित्य में भाषा और भाव की शालीनता का उत्तरोत्तर क्षय होता गया।
दूसरी सदी के बाद लातीनी साहित्य पर ईसाई धर्म की प्रभुता स्थापित हो गई। इस साहित्य में प्राचीन ग्रीक और लातीनी मूर्ति और प्रकृतिपूजक परंपरा और ईसाई धर्म की मान्यताओं के बीच तीव्र द्वंद्व की अभिवयक्ति हुई। इस युग के उल्लेखनीय साहित्यकारों में तरतूलियन, मिनूसियस फ़लिक्स, लाक्तांतियस, संत जेरोम, संत आगुस्तिन, बोएथियम, कासियादोरस, संत बेनेदिक्त, ग्रेगरी महान्‌, संत इसीदार आदि हैं।
ईसा की छठी सदी से लेकर पूरे मध्य युग तक लातीनी साहित्य की रचना होती रही । चर्च का सारा कार्य लातीनी में होता ही था, इसके अतिरिक्त लौकिक साहित्य, दर्शन और शिक्षा के क्षेत्र में भी इस भाषा का प्रमुख स्थान था। इस लंबे काल के रचनाकारों में कुछ प्रसिद्ध नाम ये हैं: कोलंबानस (५४३-६१५), बीड (६७३-७३५), अल्कुइन (७३५-८०४), संत बर्नार्ड (१०९०-११५३), संत तोमस अक्विनस (१२२४-७४), दांते (१२६५-१३२१)। इस युग में लातीनी की महत्वपूर्ण भूमिका का अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि इसके साहित्यकार ने केवल इटली या रोम के थे, बल्कि आयलैंड, इंग्लैंड और पश्चिमी यूरोप के अनेक देशों के भी थे।

[संपादित करें]पुनर्जागरण (रेनेसाँ ; १४५०-१५५०)

पुनर्जागरण यूरोप में ग्रीक और रोमन साहित्य, कला और दर्शन के प्रति नई सजगता और अभिरूचि का काल है। रैनेसाँ का उदय अधिकतर विद्वान्‌ १४५३ ई. के बाद से मानते हैं, जब तुर्को ने कुस्तुनतुनिया पर विजय प्राप्तकर ग्रीकरोमन सभ्यता को पश्चिम की ओर इटली में शनण लेने के लिये विवश किया। कुछ इसका प्रारंभ १४४० ई. में मुद्रण के आविष्कार से मानते हैं। इससे भी पूर्व १०वीं और १२वीं सदियों में नवस्फुरण के संकेत मिलते हैं। १५वीं सदी के पहले और उसके पूर्वार्ध में ही इस जागरण की पूर्वपीठिका इटली के अनेक नगरों में, जिनमें रोम और फ्लोरेंस प्रधान थे, तैयार हो चुकी थी। इसका नेतृत्व करनेवालों में दांते, पेत्रार्क : (१३०४-७४), बोक्काचो (१३१३-७५), कोजीमो मेदिची (१३८९-१४६४) इत्यादि प्रमुख थे । किंतु १५वीं सदी के मध्य से यह प्रक्रिया इतनी वेगवती और व्यापक हो गई कि यहां से मध्य युगीन यूरोप का आधुनिकता में संक्रमण माना जाता है। इस संक्रमण के साथ ग्रीक और रोमन साहित्य, संस्कृति और कला के उदार लौकिक एवं मानवतावादी दृष्टिकोण ने मध्ययुगीन यूरोप की संकुचित तथा रूढ़ धर्मिकता और परलोकपरायण्ता एवं उनके सहयोगी व्यक्ति-स्वातंत्रय-विरोधी सामंती अंकुशों को नि:सत्व कर दिया। पुनर्जागरण ने आदिपाप और हीनता के सिद्धांत के स्थान पर मानव काया की पवित्रता और व्यक्ति के विकास की अमित संभावनाओं में आस्था की प्रतिष्ठा की। यह प्रवृति इतनी प्रबल थी कि स्वयं चर्च को इसके साथ समझौता करना पड़ा। फ्रेंच विद्वान जसराँ के अनुसार लौकिकता और मानवतावाद की इस असंदिग्ध विजय का प्रतीक कांसे की बनी औरत की वह नंगी मूर्ति थी जो पुनर्जागरण के बाद स्वयं एक पोप की समाधि पर स्थापित की गई ।
पुनर्जागरण ने मानवतावाद के साथ साथ प्राचीन ग्रीक और रोमन साहित्यिक परंपरा को भी पुनरुज्जीवित किया, जिसके फलस्वरूप इतालवी साहित्य को काव्य, ताटक, आख्यायिका, इतिहास आदि की वस्तु और रचना के आदर्श विधान प्राप्त हुए। प्राचीन ग्रीक और लातीनी साहित्यकारों की रचनाओं से प्रेरणा ग्रहण करने के अतिरिक्त १६वीं सदी के इतालवी साहित्यकारों ने अरस्तु और होरेस की पोएतिक्स और आर्स पोएतिका नामक रचनाओं को काव्य के लक्षण ग्रंथ के रूप में स्वीकृत किया। पुनर्जागरण ने ही फ्लोरेंस में लोरेंत्सों मेदिची के नेतृत्व में नवअफ़लातूनवाद को भी जन्म दिया, जिसका गहरा असर इटली और यूरोप के अन्य देशों की प्रेमसंबंधी कविताओं पर पड़ा।
इटली की सीमाओं को लाँघकर क्लासिकल नवजागृति १५वीं १६वीं सदी में ्फ्रांस में और १६वीं सदी में स्पेन, जर्मनी और इंग्लैंड में पहूंची। इस नवजाग्रति ने रोमन कैथोलिक चर्च के अंतर्गत यूरोप की एकसूत्रता भंगकर इन देशों की निजी प्रतिभा को उन्मुक्त किया। इसलिये इनमें से हर देश ने इस नई चेतना को अपने अपने साँचों में ढाला। धर्म, संस्कृति, साहित्य, कला, विज्ञान, शिक्षा, सभी पर इस जागृति की छाप पड़ी। इस आंदोलन के संदेश को इटली के अग्रणियों ने यूरोप के देशों में पहुंचाया और उसे ग्रहण करने के लिये यूरोप के देशों के अग्रणी इटली पहुँचे। इटली के लियोनार्दो दा विंसी और अलामन्नी ्फ्रांस और कास्तिग्लिओने स्पेन पहुंचे। पश्चिमी यूरोप से महान्‌ धार्मिक नेता लूथर (१४८३-१५४६) और मेधावी मानवतावादी इरैस्मस (१४४६-६७-१५३६) इटली पहुंचे। ्फ्रांस के प्लेइया (Pleiad) के कवियों, जर्मनी के धर्मसुधार आंदोलन (रिफ़र्मेशन), स्पेन की लिरिक काव्यधारा, इंग्लैंड के एलिज़ाबेथयुगीन साहित्य की मूल प्रेरणा यही नवजागृति थी।
इस नवजागृति की विशेषता यह थी कि उसने जहाँ एक ओर अपने प्राचीन क्लासिकल आदर्श उपस्थित किए, वहां दूसरी ओर व्यक्ति की चेतना को मुक्तकर उसे प्रयोग और सृजन की नई दिशाओं में जाने का साहस भी दिया।
१७वीं और १८वीं सदियों में इन्हीं आदर्शो के रूढ़ि बन जाने के बाद इस रचनात्मक स्फूर्ति का भी लाप हो गया। प्राचीन क्लासिकों के प्रवाह को रीति के कुंड में बांध कर एक नए वाद ने जन्म लिया, जिसे नियोक्लासिसिज्म कहा जाता है। अक्सर ‘क्लासिसिज्म’ और ‘नियो-क्लासिसिज्म’ पर्याय के रूप में प्रयुक्त होते हैं, किंतु पुराने क्लासिकों के आदर्श और वाद में बंध जाने के बाद क्लासिसिज्म या नियो-क्लासिसिज्म के आदर्शो के भेद को समझना आवश्यक है।

[संपादित करें]क्लासिसिज्म या नियो-क्लासिसिज्म (रीतिवाद)

यूरोप मेंनियो क्लासिसिज्म को प्रतिष्ठित करने में मुख्य भूमिका १७वीं सदी के फ्रेंच साहित्यकारों और आलोचकों की थी, जिन्होंने १६वीं सदी के इतालवी आलोचकों द्वारा अरस्तु, होरेस आदि प्राचीन ग्रीक और रोमन साहित्यचिंतकों के सिद्धांतों पर किए गए मतैक्यहीन विचारविमर्श को कठोर व्यवस्थित, और प्राय: निर्जीव रीति का रूप दे दिया । ्फ्रेंच आलोचनाशास्त्री प्राचीन ग्रीक और रोमन चिंतकों के पास सीधे न पहुंचकर अपनी रुचि के इतालवी आलोचनाशास्त्रियों के माध्यम से पहुँचे, जिसके फलस्वरूप उन्होंने काफी स्वच्छंदता के साथ प्राचीन क्लासिको, विशेषत: अरस्तू के सिद्धांतों पर अपनी रीति-अरीति आरोपित कर दी।
आलोचना में इस रीतिवाद का प्रथम महत्वपूर्ण प्रचारक मैलर्ब (१५५५-१६२८) हुआ। १६३० से १६६० के बीच इस रीतिवाद का प्रसार और भी हुआ। यह कार्य शाप्लें (१५९४-१६७४), ब्वायलो (१६३६-१७११), रापैं, ले बोस्सू इत्यादि के द्वारा संपन्न हुआ और इसमें उन्हें लुई के दरबार के संरक्षण में संस्थापित ्फ्रेंच अकादमी, देकार्त के बुद्धिवाद और कैथोलिक चर्च से प्रेरणा और समर्थन प्राप्त हुआ।
नियो-क्लासिकल आलोचनाशास्त्र का ध्यान कविता, जिसमें महाकाव्य और दु:खांत तथा सुखांत रूपक भी शामिल थे, की ओर हो गया। उसके कुछ साधारण सिद्धांत थे, जैसे, कविता का लक्ष्य मनोरंजन से अधिक नैतिक शिक्षा है; काव्यशास्त्र या रीति का ज्ञान प्रतिभा से अधिक आवश्यक है; रीति का अर्थ कलासिकों का अनुकरण है: काव्य की वस्तु में ‘सत्य’ सर्वोपरि है और सत्य का अर्थ है मानव द्वारा अनुभूत सार्वभौम सत्य; और कल्पना के उद्वेग के स्थान पर बौद्धिक संयम और संतुलन होना चाहिए; अभिव्यक्ति में स्पष्टता और लाघव होना चाहिए; रचनाविधान में व्यवस्था, अनुपान और संतुलन का सम्यक्‌ निर्वाह होना चाहिए। संक्षेप में, इन साधारण नियमों की तीन धुरियाँ थी, बुद्धि, नीर-क्षीर-विवेक और कलात्मक अभिरूचि।
जहाँ तक काव्यरूपों का प्रश्न था, नियो-क्लासिकल आलोचना शास्त्रियों के अनुसार प्रत्येक रूप के विषय, लक्ष्य, प्रभाव और शैलियाँ प्राचीनों ने निश्चित कर दी थी। इसी आधार पर उन्होंने महाकाव्य और सुखांत नाटकों के रचनाविधान को रीतिबद्ध किया। उन्होंने दु:खांत में प्रहसन और प्रहसन में दु:खांत के तत्वों के सम्मिश्रण की निंदा की और काल, देश एवं घटना के संधित्रय को रूपक के रचनाविधान का केंद्रीय सिद्धांत माना।
नियो-क्लासिकल सिद्धांतों का गहरा असर तत्कालीन यूरोपीय साहित्य पर पड़ा क्योंकि १४वें लुई का ्फ्रांस यूरोप का सांस्कृतिक केंद्र था। १८वीं सदी का अंग्रेजी साहित्य नियो-क्लासिकल आदर्शो का प्रतिबिंब है।
स्पष्ट है कि प्राचीन ग्रीक और लातीनी क्लासिकों और रेनेसाँ के उनके अनुयायियों को नियो-क्लासिकल साहित्यकारों से एक नहीं किया जा सकता। एक ओर अन्वेषण या परंपरानुमोदित अन्वेषण है, दूसरी ओर इस अन्वेषण की उपलब्धि को रूढ़ि में बदल देने का प्रयत्न। टी. एस. ईलियट ने वर्जिल पर लिखे गए अपने लेख ‘ह्वाटइज़ क्लासिक’ में क्लासिसिज्म़ की जिन विशेषताओं का उल्लेख किया है वे संक्षिप्त रूप में इस प्रकार हैं : चिंतन और लोकव्यवहार की प्रौढ़ता की अभिव्यक्ति, इतिहास, परंपरा और सामाजिक नियति का बोध, भाषा या शैली में साधारणीकरण, दृष्टिकोण की उदार और व्यापक ग्रहणशीलता, सार्वभौमिकता। प्राचीन क्लासिकों ने अपना कार्य साहित्य, सामाजिक जीवन और चिंतन की महान्‌ परंपराओं के संदर्भ से संपन्न किया। नियो-क्लासिकल साहित्यकारों में भी यह बोध था, किंतु उनके सामने ये महान्‌ संदर्भ नहीं थे। नियो-क्लासिसिज्म ऐसे युग की उपज है जब समाज किसी विकास के दौर से गुजर कर जड़ता की स्थिति में आ जाता है, जब वह बंद गली के छोर पर पहुँचकर रुक जाता हैं। ऐसे समय साहित्य में वस्तु का स्थान गौण और रूप का स्थान प्रधान हो जाता है। यह रूपाशक्ति साहित्य में रूढ़ि या रीतिवाद की अत्यंत उर्वर भूमि है। यह आश्यर्च की बात नहीं कि पश्चिमी यूरोप के सांस्कृतिक संकट के इस युग में अंग्रेजी और अन्य साहित्य में निया-क्लासिसिज्म का पुनरूद्धार हुआ। आधुनिक अंग्रेजी कविता के प्रसिद्ध प्रवर्तक और सिद्धांतकार एजरा पाउंड टी. ई. हुल्श और टी. एस. ईलियट ने रेनेसाँ की मानवतावादी परंपरा के आधार पर विकसित रोमंटिक साहित्यधारा की तुलना में १८वीं सदी की नियो-क्लासिकल अंग्रेजी कविता को अधिक महत्व दिया है। हुल्श के अनुसार ‘मनुष्य असाधारण रूप से स्थित और सीमित जीवधारी है, जिसकी प्रकृति सर्वथा अपरिवर्तनीय है। केवल परंपरा और संगठन के द्वारा ही उसके हाथों किसी अच्छी चीज का निर्माण हो सकता है’। ‘मनुष्य अनंत संभावनाओं का स्रोत है’। -इस रोमंटिक आस्था को मानसिक व्याधि और इसलिये त्याज्य बतलाते हुए उसका कहना है : ‘मेरी भविष्यवाणी है कि शुष्क, कठोर, क्लासिकल कविता का युग आ रहा है’। जिसमें कल्पना से अधिक महत्व चित्रकौशल (फ़ैंसी) का होगा। इस प्रकार रोमांटिसिज्म और क्लासिसिज्म का संघर्ष केवल साहित्यिक संघर्ष ही नहीं बल्कि राजनीतिक और सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति प्रगति और रूढ़ि के दृष्टिकोणें का संघर्ष भी है।

[संपादित करें]भारतीय क्लासिक साहित्य

‘क्लासिक’ की रूढ़ परिभाषा के अंतर्गत यूनानी और रोमन साहित्य और उनके परिप्रेक्ष्य में यूरोपीय साहित्य की ही चर्चा ऊपर की गई है। उपर्युक्त साहित्य के संदर्भ में ह्यूम ने यह प्रश्न उठाया कि होमर आज से हजार-दो हजार साल पूर्व रोम और एथेंस पढ़े जाते थे और आज भी वे लंदन और पेरिस में पढ़े जाते हैं। अनेक विभिन्नताओं और परिवर्तनों के होते हुए भी आज तक उनका महत्व बना हुआ है इसका क्या कारण है? इस प्रश्न के उत्तर में यह अनुभव किया गया कि जो साहित्य काल की कसौटी पर खरा उतरे वही ‘क्लासिक' है। अतएव अब यह समझा जाने लगा है कि क्लासिक साहित्य वह है जिसमें जीवन के उन तत्वों का समावेश निश्चित रूप से हो जिनकी उपयोगिता और सार्थकता प्रत्येक युग और देश के लिये अपरिहार्य है।
भारतीय साहित्य को ‘क्लासिक’ की इसी परिभाषा की दृष्टि से देखा जा सकता है। इस दृष्टि से देखने पर रामायण और महाभारत तो क्लासिक की कोटि में आते ही हैं। संस्कृत के अनेक काव्यों और महाकाव्यों की गणना उसके अंतर्गत की जा सकती है।कालिदास का समग्र साहित्य अपने आप में क्लासिक है किंतु ‘रघुवंश’ और ‘अभिज्ञान शाकुतंल’ सर्वोपरि हैं।
हिंदी का साहित्यिक इतिहास अभी कुछ ही सौ बरसों का है। इस बीच जिस प्रकार का साहित्य रचा गया उसने अधिकांशत: संस्कृत के साहित्यशास्त्र के उन्हीं केंद्र बिंदुओं को अपनाया जिन्हें रस, ध्वनि, वक्रोक्ति, रीति और अलंकार कहते हैं। इस काल के लेखकों के प्रेरणास्रोत थे संस्कृत के ह्रासोन्मुख साहित्यिक आचार्य। अत: उस काल में ऐसा बहुत नहीं है जिसे क्लासिक कहा जाय। अकेले तुलसीदास के रामचरितमानस को इस कोटि में रखा जा सकता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने यों सूर और जायसी की रचनाओं का क्लासिक माना है। निओ-क्लासिक के रूप में प्रेमचंद के गोदान और जयशंकर प्रसाद की ‘कामायनी’ की गणना की जा सकती है।

सोमवार, 31 जनवरी 2011

Warli Paintings-

वार्ली लोक चित्रकला


महाराष्‍ट्र अपनी वार्ली लोक चित्रकला के लिए प्रसिद्ध है। वार्ली एक बहुत बड़ी जनजाति है जो पश्‍चिमी भारत के मुम्‍बई शहर के उत्तरी बाह्मंचल में बसी है। भारत के इतने बड़े महानगर के इतने निकट बसे होने के बावजूद वार्ली के आदिवासियों पर आधुनिक शहरीकरण कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। 1970 के प्रारम्‍भ में पहली बार वार्ली कला के बारे में पता चला। हालांकि इसका कोई लिखित प्रमाण तो नहीं मिलता कि इस कला का प्रारम्‍भ कब हुआ लेकिन दसवीं सदी ई.पू. के आरम्भिक काल में इसके होने के संकेत मिलते हैं। वार्ली, महाराष्‍ट्र की वार्ली जनजाति की रोजमर्रा की जिंदगी और सामाजिक जीवन का सजीव चित्रण है। यह चित्रकारी वे मिट्टी से बने अपने कच्‍चे घरों की दीवारों को सजाने के लिए करते थे। लिपि का ज्ञान नहीं होने के कारण लोक वार्ताओं (लोक साहित्‍य) के आम लोगों तक पहुंचाने को यही एकमात्र साधन था। मधुबनी की चटकीली चित्रकारी के मुकाबले यह चित्रकला बहुत साधारण है।
चित्रकारी का काम मुख्‍य रूप से महिलाएं करती है। इन चित्रों में पौराणिक पात्रों, अथवा देवी-देवताओं के रूपों को नहीं दर्शाया जाता बल्कि सामाजिक जीवन के विषयों का चित्रण किया जाता है। रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी घटनाओं के साथ-साथ मनुष्‍यों और पशुओं के चित्र भी बनाए जाते हैं जो बिना किसी योजना के, सीधी-सादी शैली में चित्रित किए जाते हैं। महाराष्‍ट्र की जनजातीय (आदिवासी) चित्रकारी का यह कार्य परम्‍परागत रूप से वार्ली के घरों में किया जाता है। मिट्टी की कच्‍ची दीवारों पर बने सफेद रंग के ये चित्र प्रागैतिहासिक गुफा चित्रों की तरह दिखते हैं और सामान्‍यत: इनमें शिकार, नृत्‍य फसल की बुवाई, फसल की कटाई करते हुए व्‍यक्ति की आकृतियां दर्शाई जाती हैं।

शैली की दृष्टि से देखें तो उनकी पहचान यही है कि ये साधारण सी मिट्टी के बेस पर मात्र सफेद रंग से की गई चित्रकारी है जिसमें यदा-कदा लाल और पीले बिन्‍दु बना दिए जाते हैं। यह सफेद रंग चावल को बारीक पीस कर बनाया गया सफेद चूर्ण होता है। रंग की इस सादगी की कमी इसके विषय की प्रबलता से ढक जाती है। इसके विषय बहुत ही आवृत्ति और प्रतीकात्‍मक होते हैं। वार्ली के पालघाट, शादी-विवाह के भगवान को दर्शाने वाले बहुत से चित्रों में प्राय: घोड़े को भी दिखाया जाता है जिस पर दूल्‍हा-दुल्‍हन सवार होते हैं। यह चित्र बहुत पवित्र माना जाता है और इसके बाद विवाह सम्‍पन्‍न नहीं हो सकता है। ये चित्र स्‍थानीय लोगों की सामाजिक और धार्मिक अभिलाषाओं को भी पूरा करते हैं। ऐसा माना जाता है कि ये चित्र भगवान की शक्तियों का आह्वान करते हैं।
वार्ली के चित्रों में सीधी लाइन शायद ही देखने को मिलती है। कई बिन्‍दुओं और छोटी-छोटी रेखाओं (डेश) को मिलाकर एक बड़ी रेखा बनाई जाती है। हाल ही में शिल्‍पकारों ने अपने चित्रों में सीधी रेखाएं खींचनी शुरू कर दी है। इन दिनों तो पुरुषों ने भी चित्रकारी शुरू कर दी है और वे यह चित्रकारी प्राय: कागज़ पर करते हैं जिनमें वार्ली की सुन्‍दर परम्‍परागत तस्‍वीरें और आधुनिक उपकरण जैसे कि साइकिल आदि बनाए जाते हैं। कागज़ पर की गई वार्ली चित्रकार काफी लोकप्रिय हो गई है और अब पूरे भारत में इसकी बिक्री होती है। आज, कागज़ और कपड़े पर छोटी-छोटी चित्रकारी की जाती है पर दीवार पर चित्र अथवा बड़े-बड़े भित्ति चित्र ही देखने में सबसे सुन्‍दर लगते हैं जो वार्लियों के एक विशाल और जादुई संसार की छवि को प्रस्‍तुत करते हैं। वार्ली आज भी परम्‍परा से जुड़े हैं लेकिन साथ ही वे नए विचारों को भी ग्रहण कर रहे हैं जो बाज़ार की नई चुनौतियों का सामना करने में उनकी मदद करते हैं।
डॉ.लाल रत्नाकर
http://www.flickr.com/photos/60661484@N00/873843546/sizes/o/in/photostream/
500;Warli Mud House



[ATgAAABH-eQtcUa5ZC6E1KRXM090t8bE_wf9imHgN1Y4pvFNbECTfPDGXfw4PmF_-iN-9KwW-OvTWTIOSOUCsOvWiDh_AJtU9VBUYYeeds0vAbvOBs3ROFAJNIQN9w.jpg]





मधुबनी 
Tribal Art from India Warli Paintings Wall Decor 18 x 39 inches (warli144)


http://www.indiainimages.com/wp-content/uploads/2010/12/Warli-art-610x459.jpg

https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEizQSr70t9JfHBRatbZ14VGs3ibu-CeP5Ejd-O-Nv05FPKoCRU4EFwBEihkVk5nORgyerYWlmQo_wZWro2Mqej8LGWli7EN6leduBHu6qHGhdUlSugWDb55IGbVj7V4ii3Lp6hUzdQ5-z8/s640/m24.jpg

https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhA5533B3AL3IR3PWtE3_p8x5PVHiNpqEifoUTc2Xw-_LsHx042rq0Ll1v6btrwcPyPfih_c2xa_mZU2Et6DBBV6v54i0viahDz4QdMQ-4P-LrYbqYLqP_XBR7Eb823ApZ_dLj-vIzHuLU/s640/m27.jpg
https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgFTU2W_e4PY4BRjKet5EsGGebVBJ8dvUauT2kFvv194A4yHbqt92zy7Sg2GQoO5WateeE1QLKws96I_H977LgRW8kAyEyz21UmRJQ4xW8ktLtXuakqNYpi8dkgrT3pMJ9JgW5O-wwVRwg/s640/w15.jpg

https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhPx2LviQx6AvTt56kxgalyZTsHOc-a_06euamGnXI1Jyehqvgp2JNm_NbnJ3RpnVAC0hZ8Hjj1iTFweo0jyLIdrMUJrMw8xW0ZRWaAwQBqOUY6KPiplq1lr04ShvB5NS2QhQujLb7iy2s/s1600/w23.jpg
manikwarli-clock.gif
https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEj21Ckq9cf6d49pcYwCV7j0g3iqaR2Gwg2Hq05C5paytG9LD5cZ5tLtN862iZQ32ve_psnbxapAMEPeER_bIoeZb0RwzeORcGTc4HmtSh7WGisSebQxs1c1THdZkwClml7ydJKawg1mnpk/s1600/CULTURE.jpg
warli-desk-organizer.gif
https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEhZHsFwdOUSnLW2Tk4rOJIUxlEIyN9auyz0ykUtGZWP3xiMfgknrUT7VuiDCYCvs1_i9cyRmzNedjc67KvhvBFeQor4wZ9MhfXlFXhPr0940wWdVkpXWRVf0zZOxjnnMfwxN_zjJM-icjY/s640/w2.jpg
 Wallpapers · 3D/Abstract 
 Warli Art
https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEipp-IrbV9pu7J5ipyccu_QOkYDgANpvujAUbwPB63cSUZVzZS3nM7y2_Alu02pNUZgKcH8fYWmbSbT_5GcbZyxB5O3e7CeK66FZxMvHllEMWtXloxEfs3foe7EeOxe8t1sjz9IrOAaCJM/s640/w3.jpg
https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEi1m7gk-_220R9qtqkmgtoRYRHjHer_JTLvJYqQ94Ex8X2QLJVE-EOpahYt_97fdFXC3fIBqV8_sgRQgygcXfAhR5Yfp_ic3ibGBqOXxiGps-y_LDZdOQMpZLghCrVD0nN6GfxMAvyOT3E/s640/w4.jpg
[wa-chokuL.jpg]
https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjEs26H2hCYHFzxjGrVwieyhTzMP1QohqQBgAep7vF4-nRmUmFACJgQxPa7CRe0sC7ihK3opXAHDlOLXvwsasRebJdXgk8kNVUIzCh64trBwWRZ_9FEY_yEwq7f_ojxlA-6I0t1snIjlVI/s640/w11.jpg

https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEgwJR4z_iez-N-GmojR-pR8vC9cAM9ofdQJGC7Mfmbp_6zA49KheeDCwDaeAENLxpQ9qrv8RfT1q4wr3y7cwn2U10b6_WZSNkI73tq4ABkAD2qsLoXgPenm-t0uwwDL9t3jpEbwtkn5O38/s640/w14.jpg

https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiICEsKRYKNUzTeqPxpxILiRhF-TO0KmcxiqDQS_Ah3RcLEnSfkwsXTUrdd6f6_CdMRUu80bWSvGhaHw9snRkergePhWt9QuYj2oqOfAFaNGo4sO3vgxCQotTKV0rS1BkPxt9GzCkP3pX0/s640/c16.jpg
[wa-tarpaL.jpg]
https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEiY8pmHbJBRrFfGqpOPUgAQec3HzB5KonIkhSMH1KhB9S4CMPQjkOEaBwY-Dek_XIPldlYb-Lb_wB3guien7XGHal8ah0QvT_cCjFynt3AJmj-kWseUF09DBmeiX9LgJZOtuhVtmgXYndE/s640/m4.jpg
https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEitX3mkuyXc-Jax-n3x7jiCionkq3-tqAM9LQdbGGe0haAcX7yee6e_yaTZg20XUgxYzceK6Zcva5OeWFHMuV6HHD7gqjiO6lyLi_1bcvwEOMCbRuyCUnnTp9OG1-CKBqQUs1TTNYsCgXI/s640/c31.jpg

https://blogger.googleusercontent.com/img/b/R29vZ2xl/AVvXsEjmUIDN6uh98-bOwOSpPaoibwv7ob2ak9uHEZkD8epF1cAYSGlvyv2XGXoznaTgKmEsn0WqTkQuQY9jaiIgOmxzSV70MIkaCZbN_w8u2REQDELsyNYO1c6nLxBXmio4vhao5i6VRn6t31A/s400/WSadaL.jpg

शनिवार, 8 जनवरी 2011

सैयद हैदर रज़ा भारत वापस लौट आये हैं .

अमर उजाला से साभार-

ऊधौ मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं
अशोक वाजपेयी
Story Update : Saturday, January 08, 2011    7:42 PM
au
सैयद हैदर रजा वापस भारत आ गए हैं। भारत जिसे कभी उन्होंने भुलाया ही नहीं था। या जहां से वे कभी गए ही नहीं थे। वे बार-बार लौटकर यहां आते थे। वे बार बार यहां आकर बसने की बात भी करते रहे हैं। अंततः अठारह दिसंबर को उन्होंने जब अपने दोस्तों को अलविदा कहने के लिए रू द शरोन्न के अपने आवास पर पार्टी दी तो सुनिश्चित हो गया कि अब फ्रांस को छोड़कर भारत आने का वक्त हो गया है। ‘ऊधौ मोहिं ब्रज विसरत नाहीं’ का यह भाव कोई नास्टैल्जिया नहीं है, क्योंकि वे हर बरस यहां दो तीन महीने के लिए आते रहे हैं। इसलिए मुझे लगता है कि उनका यहां आना किसी नॉस्टैल्जिया की पुकार नहीं बल्कि अपना अंतिम समय अपने देश में बिताने की आकांक्षा का पूरा होना है।

यहां के जंगल, पहाड़, खेत उन्हें शुरू से ही प्रिय रहे हैं, लेकिन यह शस्य श्यामलाम सुजलाम सुफलाम धरा ही उनके आकर्षण की वजह नहीं है। यहां के कलाजगत से भी उनका गहरा जुड़ाव रहा है। उन्होंने दस साल पहले ही रजा फाउंडेशन स्थापित किया था और युवा प्रतिभाओं को पुरस्कृत और सम्मानित करने की पहल की थी जो किसी और कलाकार ने नहीं की। स्पष्ट है कि यहां के युवा कलाकारों के प्रति उनका अनुराग बहुत गहरा और पुराना है। एक और बात है जो उन्हें आकर्षित करती है। उनके हिसाब से इस समय जैसी सक्रियता भारतीय कला दृश्य पर है, वैसी बहुत कम देशों में है। यहां की प्रकृति, पहाड़ और जंगल तो उन्हें आकर्षित करते ही रहे हैं। वे योजना बना रहे हैं कि ठंड थोड़ी कम हो जाए तो अपने पुराने अंचल में जाएंगे। मंडला, दमोह के अपने इलाके में भ्रमण करेंगे।

एक सवाल है कि अभी तक तो रजा अपने स्मृति के देश में रहते रहे हैं। अब यथार्थ के देश में रहकर उनके सृजन में क्या बदलाव आने की संभावना है? मुझे लगता है कि इस उम्र में आकर परिवर्तन होना थोड़ा कठिन है। दूसरी बात यह कि कभी भी यथार्थ स्मृति से विच्छिन्न तो होता नहीं है। हम जिस देश में रहते हैं वह आधी स्मृति आधा यथार्थ होता है। उसमें कोई बुनियादी फर्क तो आता नहीं है। उनके मन में जो भारत है, वह यहां है कि नहीं है, कितना है, यह तो वक्त ही बताएगा। अभी से कुछ कहना मुश्किल है, अभी तो उन्हें आए हुए हफ्ता ही हुआ है। उनको यह भी अंदाजा होगा कि यथार्थ शायद उससे अलग हो, जैसा उन्होंने सोच रखा है। हालांकि खुद रजा भी इस बात को लेकर कुछ बेचैन हैं। क्योंकि एक लंबा अरसा उन्होंने जिस तरह की जीवन शैली में गुजारा है, वैसे में एक नए माहौल में इस उम्र में खुद को व्यवस्थित कर पाना कितना संभव होगा, यह तो समय ही बताएगा।

यहां के कला जगत में उनकी उपस्थिति हमेशा ही बहुत प्रेरक और निजी उपस्थिति रही है। लोग उनसे उत्साह और प्रेरणा पाते रहे हैं। अब उनके यहां स्थायी रूप से आ जाने पर लोगों की प्रसन्नता स्वाभाविक ही है। अब रजा यहां आ गए हैं, तो हम सब की कामना है कि हमारे समय के एक और महान चित्रकार हुसैन की भी स्वदेश वापसी हो। रजा भी यही चाहते हैं। रजा जब फ्रांस में थे तो हमारा भी उस देश से अलग ही नाता जुड़ा हुआ था। साल में दो बार वे मुझे फ्रांस बुलाते थे, एक बार सर्दियों में तो दूसरी बार गर्मियों में। इस बार भी जब उन्होंने 18 दिसंबर को अपने दोस्तों को अलविदा कहने के लिए पार्टी दी, तो मैं भी वहां मौजूद था। यह रजा साहब के व्यक्तित्व का चुंबक ही था कि उस कड़ाके की ठंड में भी पचास से भी अधिक उनके मित्र चाहने वाले वहां जुटे। इनमें वहां भारत के राजदूत राजन मथाई भी थे। हों क्यों नहीं! रजा भी तो इतने लंबे समय से वहां पर भारत के कला-दूत की भूमिका निभाते रहे हैं। अब यहां आकर वे शायद फ्रांस के अपने अनुभवों को चित्रबद्ध कर सकेंगे। अगर ऐसा हुआ तो हम इस कला मनीषी के एक और कला अनुभव से रूबरू हो सकेंगे।

रजा का समय
मैं उठाता हूं नाम
मध्यप्रदेश केवन भूगोल से
ककैया, बाबरिया, बचई, मंडला, दमोह, नरसिंहपुर
और वे तुम्हारे आकाश में
ओस भीगी वनस्पतियों से
झिलमिलाते-जगमगाते हैं-
जैसे तुम्हारी आदिम आत्मा की वर्णमाला के कुछ आलोकित अक्षर हों
मुझे सुनाई नहीं देती
बचपन के जंगल से घर की दरार में दाखिल होती सांप की सरसराहट
या बरामदे में सरकता बिच्छू का डंक
लेकिन प्रार्थनाओं की तरह छा जाते हैं
देहाती स्कूल केबरामदे में रटे जा रहे पहाड़े
या एक दुबली सी हिंदी पाठ्यपुस्तक से
दुहराए जा रहे
तुलसी कबीर रहीम के भक्तिपद्य।
जंगल में रहते हैं साथ भय और सुंदरता
घर केआत्मीय अंधेरों में जब-तब कौंध जाते जुगनू।
जंगल में फैली धुंध या कि
पत्तियों के जलने से फैल गया धुआं,
जिसमें से एक फारेस्टगार्ड के साथ
तुम जा रहे हो मंडला में महात्मा गांधी को देखने
एक जनसभा को संबोधित करते हुए-
और बरसों बाद जैसे वही छबि रोकती है
तुम्हें अपने दूसरे भाइयों
और पहली पत्नी की तरह
बंटवारे के बाद उस तरफ जाने से।
तुम्हारे सख्त और ईमानदार पिता
सिखाते हैं तुम्हें पांच वक्त की नमाज की महिमा,
और बगल के हनुमान मंदिर में तुम सुनते हो रामचरित मानस का पाठ-
पैरिस के चर्च में तुम झुकते हो प्रार्थना मेंः
कौन जानता था, शायद तुम भी नहीं,
कि एक दिन रंग और आकार तुम्हारी प्रार्थना के मौन शब्द होंगे,
कि जंगल में चहचहाती चिड़ियां, जब-तब गांव वालों को भयाक्रांत करने के लिए तेंदुए की हुंकार
और अंधेरी रात में आती नदी में चढ़ती बाढ़ के पानी की आवाज
सब मिलाकर एक प्रार्थना थीं
कि तुम्हें रचने का
खोजने और पाने का,
जहां भी रहो
वहां दूसरों के काम आने का वरदान मिले।

ये जो रजा हैं...
22 फरवरी 1922 को मध्यप्रदेश के मंडला जिले के बाबरिया में जन्मे सैयद हैदर रजा अंतरराष्ट्रीय ख्याति के कलाकार हैं। उनकी कृतियां करोड़ों में बिकती हैं। गत जून में क्रिस्टीज की नीलामी में उनकी एक पेंटिंग ‘सौराष्ट्र’ 16.42 करोड़ में बिकी। स्कूली शिक्षा दमोह के गवर्नमेंट हाई स्कूल से पूरी करने के बाद उन्होंने नागपुर स्कूल ऑफ आर्ट, नागपुर और जे जे स्कूल ऑफ आर्ट, मुंबई से कला शिक्षा ग्रहण की। इसके बाद 1950 में वे फ्रांस चले गए और उसी देश को अपनी कर्मस्थली बना लिया। मुंबई में उन्होंने प्रोग्रेसिव आर्ट ग्रुप की स्थापना भी की थी। उनकी कृतियों में भारतीय संस्कृति का खासा प्रभाव है।

मंगलवार, 16 नवंबर 2010

CONSTABLE, John

(b. 1776, East Bergholt, d. 1837, Hampstead)
by-Dr.Lal Ratnakar

Biography

English painter, ranked with Turner as one of the greatest British landscape artists. Although he showed an early talent for art and began painting his native Suffolk scenery before he left school, his great originality matured slowly. He committed himself to a career as an artist only in 1799, when he joined the Royal Academy Schools, and it was not until 1829 that he was grudgingly made a full Academician, elected by a majority of only one vote. In 1816 he became financially secure on the death of his father and married Maria Bicknell after a seven-year courtship and in the face of strong opposition from her family. During the 1820s he began to win recognition: The Hay Wain (National Gallery, London, 1821) won a gold medal at the Paris Salon of 1824 and Constable was admired by Delacroix and Bonington among others. His wife died in 1828, however, and the remaining years of his life were clouded by despondency.

After spending some years working in the Picturesque tradition of landscape and the manner of Gainsborough. Constable developed his own original treatment from the attempt to render scenery more directly and realistically, carrying on but modifying in an individual way the tradition inherited from Ruisdael and the Dutch 17th-century landscape painters. Just as his contemporary William Wordsworth rejected what he called the 'poetic diction' of his predecessors, so Constable turned away from the pictorial conventions of 18th-century landscape painters, who, he said, were always 'running after pictures and seeking the truth at second hand'. Constable thought that 'No two days are alike, nor even two hours; neither were there ever two leaves of a tree alike since the creation of the world', and in a way that was then new he represented in paint the atmospheric effects of changing light in the open air, the movement of clouds across the sky, and his excited delight at these phenomena, stemming from a profound love of the country: 'The sound of water escaping from mill dams, willows, old rotten planks, slimy posts and brickwork. I love such things. These scenes made me a painter.'

He never went abroad, and his finest works are of the places he knew and loved best, particularly Suffolk and Hampstead, where he lived from 1821. To render the shifting flicker of light and weather he abandoned fine traditional finish, catching the sunlight in blobs of pure white or yellow, and the drama of storms with a rapid brush.

Constable worked extensively in the open air, drawing and sketching in oils, but his finished pictures were produced in the studio. For his most ambitious works - 'sixfooters' as he called

them - he followed the unusual technical procedure of making a full-size oil sketch, and in the 20th century there has been a tendency to praise these even more highly than the finished works because of their freedom and freshness of brushwork. (The full-size sketch for The Hay Wain is in the Victoria and Albert Museum, London, which has the finest collection of Constable's work.)

In England Constable had no real successor and the many imitators (who included his son Lionel, 1825-87) turned rather to the formal compositions than to the more direct sketches. In France, however, he was a major influence on Romantic painters such as Delacroix, on the members of the Barbizon School, and ultimately on the Impressionists.




GOYA Y LUCIENTES, Francisco de

(b. 1746, Fuendetodos, d. 1828, Bordeaux)
by-Dr.Lal Ratnakar

Biography

Spanish painter (full name: Francisco José de Goya y Lucientes) and graphic artist. He was the most powerful and original European artist of his time, but his genius was slow in maturing and he was well into his thirties before he began producing work that set him apart from his contemporaries. Born at Fuendetodos in Aragon, the son of a gilder, he served his apprenticeship at Saragossa, then appears to have worked at Madrid for the court painter Francisco Bayeu. In about 1770 he went to Italy but he was back in Saragossa the next year.

In 1773 he married Bayeu's sister, and by 1775 had settled at Madrid. Bayeu secured him employment making cartoons for the royal tapestry factory, and this took up most of his working time from 1775 to 1792. He made sixty-three cartoons (Prado, Madrid), the largest more than 6 m. wide. The subjects range from idyllic scenes to realistic incidents of everyday life, conceived throughout in a gay and romantic spirit and executed with Rococo decorative charm. During these years Goya also found time for portraits and religious works, and his status grew. He was elected to the Academy of San Fernando in 1780 and became assistant director of painting in 1785. In 1789 he was nominated a court painter to the new king, Charles IV.

A more important turning-point in his career than any of these appointments, however, was the mysterious and traumatic illness he experienced in 1792. It left him stone deaf, and while convalescing in 1793 he painted a series of small pictures of 'fantasy and invention' in order, as he said, 'to occupy an imagination mortified by the contemplation of my sufferings'. This marks the beginning of his preoccupation with the morbid, bizarre, and menacing that was to be such a feature of his mature work. It was given vivid expression in the first of his great series of engravings, Los Caprichos (Caprices), issued in 1799. The set (executed c. 1793-98) consists of eighty-two plates in etching reinforced with aquatint, and their humour is constantly overshadowed by an element of nightmare. Technically revealing the influence of Rembrandt, they feature savagely satirical attacks on social customs and abuses of the Church, with elements of the macabre in scenes of witchcraft and diabolism.

In 1795 Goya succeeded Bayeu as director of painting at the Academy of San Fernando and in 1799 he was appointed First Court Painter, producing his most famous portrait group, the Family of Charles IV (Prado), in the following year. The weaknesses of the royal family are revealed with unsparing realism, though evidently without deliberate satirical intent. Goya's early portraits had followed the manner of Mengs, but stimulated by the study of Velázquez's paintings in the royal collection he had developed a much more natural, lively, and personal style, showing increasing mastery of pose and expression, heightened by dramatic contrasts of light and shade. From about the same date as the royal group portrait are the celebrated pair of paintings the Clothed Maja and Naked Maja (Prado), whose erotic nature led Goya to besummoned before the Inquisition. Popular legend has it that they represent the Duchess of Alba, the beautiful widow whose relationship with Goya caused scandal in Madrid.

Goya retained his appointment of court painter under Joseph Buonaparte during the French occupation of Spain (1808-14), but his activity as a painter of court and society decreased, and he was torn between his welcome for the regime as a liberal and his abhorrence as a patriot against foreign military rule. After the restoration of Ferdinand VII in 1814 Goya was exonerated from the charge of having 'accepted employment from the usurper' by claiming he had not worn the medal awarded him by the French, and he painted for the king the two famous scenes of the bloody uprising of the citizens of Madrid against the occupying forces - The Second of May, 1808 and The Third of May, 1808 (Prado). Equally dramatic, and even more savage and macabre, are the sixty-five etchings Los Desastres de la Guerra (The Disasters of War, 1810-14) - nightmare scenes, depicting atrocities committed by both French and Spanish.

Goya virtually retired from public life after 1815, working for himself and friends. He kept the title of court painter but was superseded in royal favour by Vicente López. Towards the end of 1819 he fell seriously ill for the second time (a remarkable self-portrait in the Minneapolis Institute of Arts shows him with the doctor who nursed him). He had just bought a country house in the outskirts of Madrid, the Quinta del Sordo (House of the Deaf Man); and it was here after his recovery in 1820 that he executed fourteen large murals, sometimes known as the Black Paintings, now in the Prado. Painted almost entirely in blacks, greys, and browns, they depict horrific scenes, such as Saturn Devouring One of His Sons,executed with an almost ferocious intensity and freedom of handling.

In 1824 Goya obtained permission from Ferdinand VII to leave the country for reasons of health and settled at Bordeaux. He made two brief visits to Spain, on the first of which (1826) he officially resigned as court painter. In these last years he took up the new medium of lithography (in his series the Bulls of Bordeaux), while his paintings illustrate his progress towards a style which foreshadowed that of the Impressionists.

Goya completed some 500 oil paintings and murals, about 300 etchings and lithographs, and many hundreds of drawings. He was exceptionally versatile and his work expresses a very wide range of emotion. His technical freedom and originality likewise are remarkable — his frescoes in San Antonio de la Florida in Madrid (1798). for example, were evidently executed with sponges. In his own day he was chiefly celebrated for his portraits, of which he painted more than 200; but his fame now rests equally on his other work.

Self-Portrait
1771-75-Oil on canvas, 58 x 44 cm-Private collection
The Quail Shoot
1775-Oil on canvas, 290 x 226 cm-Museo del Prado, Madrid







मेरे बारे में

मेरी फ़ोटो
GHAZIABAD, Uttar Pradesh, India
कला के उत्थान के लिए यह ब्लॉग समकालीन गतिविधियों के साथ,आज के दौर में जब समय की कमी को, इंटर नेट पर्याप्त तरीके से भाग्दौर से बचा देता है, यही सोच करके इस ब्लॉग पर काफी जानकारियाँ डाली जानी है जिससे कला विद्यार्थियों के साथ साथ कला प्रेमी और प्रशंसक इसका रसास्वादन कर सकें . - डॉ.लाल रत्नाकर Dr.Lal Ratnakar, Artist, Associate Professor /Head/ Department of Drg.& Ptg. MMH College Ghaziabad-201001 (CCS University Meerut) आज की भाग दौर की जिंदगी में कला कों जितने समय की आवश्यकता है संभवतः छात्र छात्राएं नहीं दे पा रहे हैं, शिक्षा प्रणाली और शिक्षा के साथ प्रयोग और विश्वविद्यालयों की निति भी इनके प्रयोगधर्मी बने रहने में बाधक होने में काफी महत्त्व निभा रहा है . अतः कला शिक्षा और उसके उन्नयन में इसका रोल कितना है इसका मूल्याङ्कन होने में गुरुजनों की सहभागिता भी कम महत्त्व नहीं रखती.