सोमवार, 24 मई 2010

HUSAIN MF

हुसैन की भारत माता पर न्यायमूर्ति कौल का फैसला

मकबूल फिदा हुसैन के खिलाफ़ अश्लीलता और अपमान के आरोपों वाली तीन याचिकाओं ( ११४/२००७, २८०/२००७ और २८२/२००७) जिनमें कि बहुउल्लेखित और चर्चित भारतमाता वाले चित्र वाली याचिका भी शामिल है, पर दिल्ली हाईकोर्ट ने ८ मई २००८ को फ़ैसला सुनाते हुए, खारिज कर दिया था। इस फ़ैसले में न सिर्फ़ कला पर वरन और भी कई मानसिकताओं पर पुरजोर टिप्पणियां की गई हैं।

दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति संजय किशन कौल द्वारा, कला की गहराइयों, कलाकार के नज़रिये, अन्य देशों के कानूनों और न्यायिक मतों, भारत में ही पूर्व मामलों, कलात्मक स्वतंत्रता और अश्लीलता, सामयिक मापदंडों, सौन्दर्यबोध अथवा कलात्मक प्रवृति, साहित्यकारों/कलाविदों की राय, अभिव्यक्ति की आज़ादी, आम आदमी की कसौटी, सामाजिक उद्देश्य या मुनाफ़ा, और दायित्वों की कड़ी कसौटी के मापदंड़ों पर इस मामले को कसते हुए, दिये इस फ़ैसले के कुछ उद्धरणों और चित्र की व्याख्याओं को यहां प्रस्तुत किया जा रहा है। (भारत माता का चित्र नीचे दिया गया है)



अपने फैसले में न्यायमूर्ति कौल ने कहा है--

. अश्लीलता पर भारत और विदेशों में बने कानूनों की कसौटियों पर ऊपर विचार विमर्श किया जा चुका है और वे स्पष्ट हैं। इन कसौटियों के मुताबिक मेरे विचार में यह पेंटिंग भादंवि की धारा २९२ के तहत अश्लील नहीं है। न तो यह पेंटिग कामोत्तेजक है और न ही कामवासना को बढावा देती है। न ही उसे देखने वाला कोई व्यक्ति भ्रष्ट अथवा पतित हो सकता है। दूसरे शब्दों में यह पेंटिंग किसी भी व्यक्ति में कामवासना नहीं भड़काती और न ही उसे भ्रष्ट करती है। इसके बावज़ूद कि कुछ लोग बुरा महसूस करेंगे कि तथाकथित भारतमाता को नग्न दिखाया गया है, पर मेरी राय में इसे अश्लीलता की कसौटी पर ठीक ठहराने के लिए कोई तर्क नहीं है। यह पेंटिंग जिसमें भारत को एक मानवाकृति में दिखाया गया है, किसी अवधारणा का नग्न चित्र होने के नाते किसी तरह से आम आदमी को शर्मिंदा नहीं करती। क्योंकि वह उसका कलात्मक मूल्य भी नहीं खोती।

. कलाकार/याचिकाकर्ता के नज़रिए से इस पेंटिंग को समझने के प्रयास से पता चलता है कि कैसे चित्रकार ने एक अमूर्त अभिव्यक्ति के जरिए एक राष्ट्र की अवधारणा को व्यथित स्त्री के रूप में दिखाया है। कोई संदेह नहीं कि राष्ट्र की अवधारणा लंबे समय से मातृत्व के विचार से जुड़ी हुई है। लेकिन सिर्फ़ इसलिए कि चित्रकार ने इसे नग्न रूप में अभिव्यक्त किया है, अश्लीलता की कसौटी पर सही नहीं उतरती है, क्योंकि इस कसौटी में कहा गया है कि सेक्स अथवा नग्नता अकेले को ही अश्लील नहीं ठहराया जा सकता। यदि पेंटिंग को संपूर्णता में देखा जाए तो यह साफ़ होता है कि प्रतिवादियों के वकील की जो दलील कि यह नग्न है, उसके विपरीत किसी भी देशभक्त भारतीय के मन में इसे देखकर घृणा का भाव नहीं उठेगा और न ही इसमें आंखों को चुभने वाली कोई चीज़ है। तथ्य यह है कि जिसे नग्नता के रूप में अश्लीलता कहा जा रहा है, उसकी वज़ह से पेंटिंग में भौंचक्काकर देने वाला कलाबोध आ गया है, जबकि नग्नता इतनी गैरमहत्वपूर्ण हो गई है कि उसे आसानी से नज़रअंदाज़ किया जा सकता है।

. कभी हैंस हॉफमैन ने कहा था और मैं जिसका उल्लेख कर रहा हूं : “कोई भी कलाकृति अपने आपमें एक दुनिया होती है, जो कलाकार की दुनिया की संवेदनाएं और भावनाएं प्रतिबिंबित करती है”। इसे ही दूसरे शब्दों में एड़वर्ड़ हॉपर ने कहा है : “महान कला किसी भी कलाकार की अंदरूनी ज़िंदगी की बाहरी अभिव्यक्ति होती है”। यदि ये बातें ठीक हैं तो यह कहना अनुचित नहीं होगा कि याचिकाकर्ता हमारे राष्ट्र की बढ़ती हुई अव्यक्त पीड़ा से व्यथित है और उसने उसे कैनवास पर उतारने का प्रयास किया है। इस पेंटिंग में कलाकार की सृजनशीलता का साक्ष्य है। उसमे एक महिला के आंसुओं या अस्तव्यस्त, उलझे हुए खुले बालों के जरिए एक चित्रकार हमारे देश के दुःखी और हताश चहरे की तस्वीर खींचना चाहता है, जो कि घोर वेदना और व्यथा के दौर से गुजर रहा है। इसमें एक महिला के दुःख को उसके लेटने के तरीके जिसमें उसने अपने चहरे को हाथ से ढ़ंका हुआ है, आंखें बंद की हुई हैं और उनमें एक आंसूं छलक रहा है, से व्यक्त किया गया है। महिला को नग्न दिखाना भी उसी अभिव्यक्ति का हिस्सा है और उसका मकसद किसी दर्शक की कामवासना को भड़काना नहीं है, बल्कि उसके दिमाग़ को झकझोरकर रखना है ताकि वह भारत की वेदना से जुड़ सके तथा इसके लिए दोषी व्यक्तियों से घृणा करने पर मजबूर हो। जो भी व्यक्ति पेंटिंग को देखेगा, उसकी प्रतिक्रिया आंसुओं में, मौन या इससे मिलती-जुलती होगी, परंतु कामवासना के रूप में तो कतई नहीं हो सकती। इस पेंटिंग की कई व्याख्याएं हो सकती हैं। एक व्याख्या यह भी हो सकती है कि वह पेंटिंग एक हताशा से भरे हुए भारत को दिखाती है जो कई समस्याओं से घिरा है, मसलन भ्रष्टाचार, अपराधीकरण, नेतृत्व का अभाव, बेरोजगारी, गरीबी, अधिक आबादी, निम्न जीवनस्तर, सिद्धांतों एवं मूल्यों का क्षरण आदि। एक व्याख्या यह भी हो सकती है कि भारतमाता को वंचना से जूझ रहे एक रूपक के तौर पर चित्रकार ने प्रयुक्त किया हो, क्योंकि जिस समय पेंटिंग बनाई गई, उस वक्त देश में भूकंप से काफ़ी बरवादी हुई थी। एक व्याख्या यह भी हो सकती है कि हिमालय की श्रेणियों को एक महिला के खुले बालों और रंगों के उदात्त उपयोग द्वारा दर्शाया गया है। यह कलाकृति को कलाबोध प्रदान करता है।
. इस संदर्भित पेंटिंग में नग्न महिला ऐसी मुद्रा या भंगिमा, में नहीं है और न ही उसके आसपास के वातावरण को इस तरह चित्रित किया गया है कि वह बददिमाग़ लोगों में सेक्सी भावनाएं जगाए, जिसे असम्मानजनक कहा जा सके, जैसी कि प्रतिवादियों की दलील थी।……….यदि भिन्न विचार लिया जाए कि अगर चित्रकार भारत को मानवीय रूप में दिखाना चाहता था तो यह अधिक उपयुक्त होता कि उसे साड़ी या किसी लंबे कपड़े इत्यादि से लपेट देता, परंतु केवल इतना ही उसे दोषी ठहराने में पर्याप्त नहीं है। यह अलग बात है कि कुछ लोग भारतमाता को न्यूड पेंट करने पर कुछ कट्टरपंथी तथा दकियानूसी विचार रखते हों। लेकिन याचिकाकर्ता जैसे व्यक्ति पर इसके लिए अपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता, जो संभवतः भारतमाता को चित्रित करने में और आज़ादख्याल हो। हमारे संविधान में दी गई आज़ादी, समानता और बंधु्त्व की संकल्पना दूसरे विचारों के प्रति असहिष्णुता से नफ़रत करती है।………..

. जिस चीज़ ने कुछ लोगों के दिमाग़ बंद कर दिये हैं, उन्हें स्वामी विवेकानंद का एक कथन अवश्य पढना चाहिए--
” हम हर किसी को अपने मानसिक विश्व की सीमा से बांधना चाहते हैं और उसे
हमारे सिद्धांत, नैतिकता, कर्तव्यबोध और यहां तक कि उपयोगिता का बोध भी
सिखाना शुरू कर देते हैं। सारे धार्मिक संघर्ष दूसरों के ऐसे मूल्यांकन की देन हैं।
यदि हम सचमुच मूल्यांकन करना चाहते हैं तो यह ‘उस व्यक्ति के ख़ुद के आदर्श
के मुताबिक करना चाहिए, न कि किसी दूसरे के’। यह महत्वपूर्ण है कि दूसरों के
दायित्वों को उनकी नज़रों से देखा जाए और दूसरों के रीतिरिवाज़ों तथा प्रथाओं
को हमारे मापदंड़ों से नहीं देखा जाए“।

. हम एक ऐसे चौराहे पर खड़े हैं, जहां हमें आत्मावलोकन करने की जरूरत है, ताकि भीतर और बाहर दोनों देख सकें। ……आधुनिक भारत में समाज के मानदंड़ तेजी से बदल रहे हैं और इसलिए अब आधुनिकता के जमाने में हमें विभिन्न सोच-विचारॊं को खुले दिल से अपनाना चाहिए। लेकिन जहां कलाकार को अपनी कलात्मक स्वतंत्रता मिलनी चाहिए, वहीं वह वो सब करने के लिए स्वतंत्र नहीं है, जो सब वह चाहता है। एक वह कला है जो सुंदरता की अभिव्यक्ति है और दूसरी वह कला है जो अप-संस्कृति की फ़ूहड़ अभिव्यक्ति से भरे दिमाग़ की उपज है। इन दोनों कलाओं में फ़र्क करना होगा। अशिष्ट चीज़ो को बढ़ावा देने वाली कला को सभ्य दुनिया से हटाने की जरूरत है।

. मानवीय व्यक्तित्व तभी भरपूर फलेगा-फूलेगा और इंसानीयत उसी वातावरण में गहरी जड़ें जमा सकेगी और सुगंध दे सकेगी, जहां सभी मिलकर सहिष्णुता औए आज़ाद ख्याली का परिचय दें।

. हमारी सबसे बड़ी समस्या फिलहाल कट्टरपंथ है, जिसने लोकतंत्र की आत्मा का हरण कर लिया है। एक आज़ाद समाज में सहिष्णुता मुख्य विशेषता होती है। ख़ासतौर पर तब जब वह एक बड़ा और जटिल किस्म का समाज हो, जिसमें अलग-अलग मतों और हितों वाले लोग रहते हों। ……………यह समझा जाना चाहिए कि असहिष्णुता विचार-विमर्श और विचार की आज़ादी पर प्रतिबंध लगाती है। इसका प्रतिफल यह होता है कि असहमतियां सूख जाती हैं। और तब लोकतंत्र अपना अर्थ खो देता है।

. कला की आलोचना हो सकती है, बल्कि एक नागरिक समाज में विभिन्न मत व्यक्त करने के कई मंच व तरीके हो सकते हैं। लेकिन अपराध न्याय प्रणाली को किसी कला के खिलाफ़ आपत्ति दर्ज़ करने के लिए उपयोग नहीं करना चाहिए। इसे किसी अविवेकी के हाथ में औज़ार नहीं बनने देना चाहिए, जो इसका दुरुपयोग लोगों के अधिकारों के गंभीर उल्लंघन में करे। खास तौर पर सृजन क्षेत्र के लोगों के।………….

” दुर्भाग्य से इस दिनों कुछ लोग हमेशा पलीता लगाते रहते हैं। और प्रदर्शन करने
जो अक्सर हिंसक हो जाता है, के लिए उत्सुक रहते हैं। मुद्दा दुनिया की कोई भी
चीज़ हो सकती है, कोई किताब, पेंटिंग अथवा फिल्म आदि हो सकती है, जिसने
उनके समुदाय की ‘भावना को ठेस’ पहुंचा दी हो। ऐसी खतरनाक प्रवृतियों पर
लगाम कसनी चाहिए। हम एक राष्ट्र हैं और हमें अनिवार्य रूप से एक दूसरे का
सम्मान करना चाहिए और सहनशीलता रखनी चाहिए“। …………..

. उपरोक्त नज़रिए से याचिकाकर्ता के खिलाफ़ आदेश दिया जाना और गिरफ़्तारी वारंट निकाला जाना रद्द किया जाता है और उनके खिलाफ़ दायर पुनरीक्षण याचिकाओं को मंजूरी दी जाती है……..

उपसंहार

. विभिन्न नज़रियों के प्रति सहिष्णुता किसी का नुकसान नहीं करती। इसका मतलब सिर्फ़ आत्मनियंत्रण से है। लेखन, पेंटिंग अथवा दृश्य मीडिया के जरिए अभिव्यक्ति की विविधता बहस को बढावा देती है। किसी बहस को कभी बंद नहीं किया जाना चाहिए। ‘मैं सही हूं’ का अर्थ यह नहीं होता कि ‘तुम गलत हो’। हमारी संस्कृति विचार और कार्यों में सहिष्णुता को बढ़ावा देने वाली है। इस फ़ैसले को लिखते वक्त उम्मीद है कि यह कला क्षेत्र के लिए खुली सोच और व्यापक सहिष्णुता की भूमिका बनेगा। ९० साल की उम्र के एक चित्रकार को उसके घर पर होना चाहिए–कैनवास पर चित्र उकेरते हुए।


हस्ताक्षर


८ मई, २००८ न्यायमूर्ति संजय किशन कौल


(हुसैन को लेकर सारी बहस ये मान कर हो रही है कि उन्होंने देवी देवताओं की नंगी तस्वीरें बनाईं। मुझे शुरू से इस बात पर आपत्ति है। इस लिहाज से न्यायमूर्ति कौल का ये फैसला बेहद अहम है। मुझे ये रवि कुमार के ब्लाग सृजन और सरोकार में मिला। मूल फैसले का सुनील सोनी ने अनुवाद किया था जिसे उद्भावना के अंक 85 में छापा गया। मैं दोनों महानुभावों के प्रति आभार व्यक्त करते हूं कि उन्होंने एक बेहद जरूरी काम को अंजाम दिया।)

बुधवार, 5 मई 2010

From-BBCHINDI-

सबसे महंगी पेंटिंग

पाबलो पिकासो

पाबलो पिकासो की ‘न्यूड, ग्रीन लीव्स ऐंड बस्ट’ अब सबसे मंहगी पेंटिंग बन गई है

स्पेन के महान चित्रकार पाबलो पिकासो की पेटिंग को 106 मिलियन डॉलर यानी लगभग 471 करोड़ रुपए की बोली लगाकर ख़रीदा गया है.

ये किसी भी कलाकृति के लिए अदा की गई सर्वाधिक कीमत है.

‘न्यूड, ग्रीन लीव्स ऐंड बस्ट’ नामक ये पेंटिंग 1932 में बनाई गई थी. इसे जाने-माने नीलामी घर क्रिस्टीज़ ने न्यूयॉर्क में नीलाम किया है.

ये कलाकृति वर्ष 1950 के दशक से लॉस एंजेलिस के फ्रांसज़ और सिडनी ब्रोडी के पास थी.

क़रीब 471 करोड़ की नीलामी जीतने वाली बोली किसी अनजान व्यक्ति ने टेलीफ़ोन के माध्यम से लगाई.

इस बड़ी बोली ने इसी वर्ष फरवरी में जियाकोमेट्टी की पेटिंग ‘वॉकिंग मैन’ का कीर्तिमान तोड़ा है.

‘वॉकिंग मैन’ को क़रीब 104 मिलियन डॉलर में नीलाम किया गया था.

इससे पहले 2004 में भी पिकासो की एक पेंटिंग ने सबसे महंगी कलाकृति होने का रिकॉर्ड बनाया था लेकिन मौजूदा पेंटिंग ने सारे कीर्तिमान पीछे छोड़ दिए हैं.

‘न्यूड, ग्रीन लीव्स ऐंड बस्ट’ की 70 से 90 मिलियन डॉलर के बीच बिकने की उम्मीद थी.

इस बड़ी बोली से ये भी संकेत मिल रहे हैं कि कला का बाज़ार आर्थिक मंदी से उबर गया है.

नीलामी घर क्रिस्टीज़ के एक अधिकारी ने कहा है कि इस कलाकृति के 1950 के दशक में बिकने के बाद 1961 में सिर्फ़ एक ही बार प्रदर्शित किया गया था.

शनिवार, 24 अप्रैल 2010

बीबीसी हिंदी से साभार -

नीलाम किए गए 'हिटलर' के बनाए चित्र
चित्र
नीलामी करने वाले समूह का दावा है कि ये हिटलर का बनाया चित्र है
इंग्लैंड में 21 ऐसे चित्रों की नीलामी हुई है जिनके बारे में बताया जा रहा है कि इन चित्रों को तनाशाह शासक हिटलर ने बनाया था.

यह नीलामी दक्षिण पश्चिमी इंग्लैंड के एक कस्बे में हुई जहाँ इन सभी 21 चित्रों के लिए एक करोड़ रूपए से भी ज़्यादा की बोली लगी.

इनमें से 19 चित्र पानी के रंगों से बने हैं जबकि दो स्केच हैं. नीलामी का आयोजन करने वालों ने बताया कि ये चित्र बेल्जियम के एक फॉर्म हाउस से मिल हैं.

नीलामी आयोजित करने वाले समूह जेफ़्रिज़ की ओर से बताया गया है कि वो इस बात से सहमत हैं कि ये सभी चित्र हिटलर ने ही बनाए हैं.

पहले विश्व युद्ध के दौरान हिटलर एक युवा सैनिक के रूप में बेल्जियम में ही थे.

सत्यता पर शक

इन चित्रों में ग्रामीण दृश्यों और झोपड़ियों को दिखाया गया है. हालांकि इन चित्रों के इतिहास के बारे में पूरे तौर पर जानकारी उपलब्ध नहीं है.

नीलामी आयोजित करने वाले समूह जेफ़्रिज़ ने बताया कि इन चित्रों के विक्रेता ने यह स्थापित करने के सभी संभव प्रयास किए कि इन चित्रों को हिटलर ने ही बनाया था.

युवावस्था में हिटलर एक अच्छे चित्रकार के रूप में भी जाने जाते थे. उन्होंने कई स्केच और चित्र बनाए थे.

ग़ौर करने वाली बात यह है कि नीलामी के कारोबार से जुड़े कई बड़े समूह ऐसी कलाकृतियों को बेचने से बचते रहे हैं जिनके बारे में दावा किया गया हो कि उन्हें हिटलर ने बनाया था.

बीबीसी हिंदी से साभार -

पिकासो के बनाए रेखाचित्रों की नीलामी
गेनेविएव लापोर्ते
लापोर्ते पहली बार पिकासो से तब मिली थी जब वो स्कूल में थीं
प्रसिद्ध स्पेनी चित्रकार पाब्लो पिकासो के बनाए 20 रेखाचित्रों की सोमवार को पेरिस में नीलामी हो रही है.

इन चित्रों को बेच रही है पिकासो की पूर्व प्रेमिका गेनेविएव लापोर्ते.

1950 के दशक में लोपोर्ते और पिकासो का दो साल गुप्त रुप से प्रेम चला था.

लापोर्ते ने कहा कि वो एक बार फिर पिकासो को स्थापित करना चाहती है.

महिलाओं के साथ संबंधों के मामले में पिकासो को काफी घमंडी और गुस्सैल माना जाता रहा है.

79 वर्षीय लापोर्ते ने उम्मीद जताई कि कोई एक व्यक्ति इन सभी रेखाचित्रों को खरीद लेगा.

उन्होंने कहा " ये रेखाचित्र किसी नदी की तरह हैं. जहां आप पानी की बूंदों को अलग नहीं कर सकते. "

लापोर्ते ने इन रेखाचित्रों को पिकासो के संबंधियों को देने से भी इंकार किया था. उनका कहना था कि पिकासो के संबंधी इन रेखाचित्रों के साथ
वैसा रिश्ता नहीं बना सकते जैसा उनका संबंध है.

लापोर्ते की पिकासो के साथ पहली मुलाक़ात 1944 में हुई थी जहां लापोर्ते ने अपने स्कूल के अख़बार के लिए पिकासो का इंटरव्यू किया था.

लापोर्ते ने कहा " जब मैंने पहली बार पिकासो को देखा था तो वे बहुत प्यारे और अच्छे लगे थे. "

इसके छह साल बाद दोनों के बीच प्रेम संबंध बने. जब दोनों का प्रेम हुआ तो पिकासो और लापोर्ते के बीच उम्र का बड़ा अंतर था.

1951 में जब दोनों का प्रेम चरम पर था तो पिकासो ने सेंट ट्रोपेज़ में लापोर्ते की कई तस्वीरें बनाईं.

कुछ तस्वीरों पर लिखा हुआ है. " गेनेविएव के लिए".

पिकासो ने दो साल के बाद अपनी एक अन्य प्रेमिका फ्रैंकोयज़ गिलोस से संबंध टूटने के बाद लापोर्ते को अपने साथ रहने के लिए बुलाया जिसे लापोर्ते ने ठुकरा दिया.

लापोर्ते ने 1959 में शादी कर ली और आगे चलकर जानी मानी फ़िल्ममेकर और कवयित्री के रुप में उनकी पहचान बनी.

बीबीसी हिंदी से साभार -

'द लास्ट सपर' अब इंटरनेट पर
द लास्ट सपर
इटली के जाने माने चित्रकार लियानार्डो दा विंची ने द लास्ट सपर 15वीं सदी के अंत में बनाई थी.

जाने माने रोमन चित्रकार लियोनार्दो दा विंची की मशहूर कलाकृति द लास्ट सपर की बेहद स्पष्ट तस्वीर अब इंटरनेट पर भी देखी जा सकती है.

स्पष्ट इसलिए क्योंकि इस चित्र की प्रति बनाई गई है अरबों पिक्सल के एक कैमरे से.

इंटरनेट पर जारी 16 अरब पिक्सल की ये तस्वीर पहले की तुलना में बिल्कुल साफ नज़र आती है. यानि अब ये पूर्व के एक करोड़ पिक्सल के डिजिटल कैमरा से खींची गई तस्वीर से 1600 गुना ज़्यादा स्पष्ट है.

15वीं सदी में बनी इस तस्वीर को इंटरनेट के जरिए देखने के वास्ते कई तकनीकी सुविधाएं भी मुहैया कराई गई हैं. जैसे तस्वीर के जिस हिस्से को प्रमुखता से देखना हो उसे चुनकर बड़ा या छोटा करके स्पष्ट देखा जा सकता है.

इसके साथ साथ इसके हर हिस्से के बारे में सूक्ष्म जानकारी भी उबलब्ध है.

ऐतिहासिक कलाकृति

वास्तविक रूप में ये कलाकृति इटली के मिलान शहर के सांता मारिया डेले ग्रेजी चर्च में रखी है.इसे इंटरनेट पर जारी करने के पीछे प्रदूषण से इसे होने वाला लगातार नुकसान बताया गया है.

आर्ट क्यूरेटर एल्बर्टो अर्तियोली ने एपी को बताया कि इंटरनेट पर आप इस तस्वीर के हर हिस्से को जूम यानि बड़ा करके निहार सकते हैं जबकि वास्तविक तस्वीर में यह बेहद मुश्किल होता है.

इसे http://www.haltadefinizione.com पर देखा जा सकता है.

अर्तियोली ने कहा 'आप देख सकते हैं कि लियोनार्डो ने इस तस्वीर में मौजूद कप को किसप्रकार पारदर्शी बनाया है. जबकि वास्तविक तस्वीर में इसे देख पाना संभव नहीं होता. इसके साथ ही इस कलाकृति में हुए क्षय को भी महसूस किया जा सकता है.'

विंची की इस तस्वीर को लगातार हो रहा नुकसान हाल के दिनों में काफी चर्चा और चिंता का विषय रहा था.

इटली के एक अख़बार के अनुसार 1990 के दशक के आखिरी वर्षों में इस तस्वीर को संरक्षित करने का तरीका कारगर नहीं रहा, और दर्शकों के कारण भी इस तस्वीर को धूल और गंदगी से काफी नुकसान पहुंचा था.

द लास्ट सपर को लियोनार्डो द विंची ने 15वीं सदी के आखिरी वर्षों में बनाई थी. हर साल लगभग साढ़े तीन लाख लोग इस कलाकृति को देखने आते हैं.

बीबीसी हिंदी से साभार -

बामियान में मिले सबसे पुराने तैल चित्र
बामियान की बुद्ध प्रतिमा
बामियान की बुद्ध प्रतिमाओं को तालेबान के समय में ध्वस्त करने का प्रयास किया गया
पेरिस, ब्रिटेन या अन्य यूरोपीय देशों के इस तर्क पर इतराने के दिन अब जाते नज़र आ रहे हैं जिसके मुताबिक तैल चित्र बनाने की परंपरा यूरोप में शुरू हुई.

तैल चित्रों यानी ऑयल पेंटिंग की शुरुआत यूरोप से नहीं, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप से हुई है. ये कहना है यूरोप, अमरीका और जापान के वैज्ञानिकों के एक दल का.

जिन चित्रों के आधार पर वैज्ञानिक दल यह बात कह रहा है, वे गौतम बुद्ध के हैं और ये अफ़ग़ानिस्तान के बामियान की गुफ़ाओं में हैं.

इस ताज़ा खोज से साफ़ पता चलता है कि पूरब में सबसे पहले तैल चित्र बनाने की शुरुआत हुई.

यूरोपीय कला के इतिहास की किताबों में अभी तक यह पढ़ाया जाता है कि ऑयल पेंटिंग की शुरुआत यूरोप में 15वीं शताब्दी में हुई.

पर ताज़ा वैज्ञानिक शोध से ये बात ग़लत साबित हुई है.

बामियान की कला

इस दल का कहना है कि अफ़ग़ानिस्तान के बामियान में जो तैल चित्र मिले हैं वो 7वीं शताब्दी के हैं यानी यूरोपीय तैल चित्रों से कोई 800 साल पहले के.

यूरोप, अमरीका और जापान के वैज्ञानिकों के एक दल ने संयुक्त राष्ट्र की संस्था युनेस्को की मदद से ये शोध किया है.

गौतम बुद्ध की दो विशाल मूर्तियाँ काबुल से 250 किलोमीटर दूर बामियान में हैं जिनके पास लगभग 50 गुफ़ाएँ हैं.

ये वही विश्वप्रसिद्ध मूर्तियाँ हैं जिनको तालेबान चरमपंथियों ने वर्ष 2001 में ध्वस्त करने की कोशिश की थी और इन्हें भारी नुकसान पहुँचाया था.

दुनिया में इससे पुराने तैल चित्र कहीं नहीं मिले हैं. प्राचीन काल में रोम और मिस्र की सभ्यता के समय दवाओं और प्रसाधनों में तेल का उपयोग तो किया जाता था लेकिन बामियान से पुराने तैल चित्र नहीं मिले हैं
योको तानिगुची, शोधदल की प्रमुख

इतिहासकार बताते हैं कि इन मूर्तियों के पास की गुफ़ाओं में किसी समय में बौद्ध भिक्षु पूजा अर्चना करते थे और ध्यान लगाते थे.

इन 50 कंदराओं में से 12 में तैल चित्र मिले हैं. उदाहरण के लिए एक तैल चित्र में सिंदूरी रंग के कपड़े पहने गौतम बुद्ध बैठे हैं और उनके आस-पास मिथकीय जीव जंतु दिखाए गए हैं.

अदभुत शोध

वैज्ञानिकों के दल की नेता योको तानिगुची का कहना है, "दुनिया में इससे पुराने तैल चित्र कहीं नहीं मिले हैं. प्राचीन काल में रोम और मिस्र की सभ्यता के समय दवाओं और प्रसाधनों में तेल का उपयोग तो किया जाता था लेकिन बामियान से पुराने तैल चित्र नहीं मिले हैं."

वो बताती हैं, "राजनीतिक कारणों से मध्य एशिया में कला पर शोध करना मुश्किल होता है लेकिन बामियान के बुद्ध विश्व धरोहर स्थल या वर्ल्ड हेरिटेज साइट हैं इसीलिए युनेस्को की मदद से हम यहाँ अध्ययन कर सके."

फ़्राँस के ग्रेनोबल्स स्थित यूरोपियन सिंक्रोट्रॉन रेडियेशन फ़ेसिलिटी में आधुनिक तकनीकों की मदद से यह शोध किया गया.

चित्रों को सिल्क रूट यानी उस रास्ते से भी जोड़ा जा रहा है जिसके ज़रिए चीन और भारत और पश्चिमी देशों के बीच व्यापार किया जाता था.

माना जा रहा है कि संभवत: बामियान की गुफ़ाओं में दीवारों पर ये तैल चित्र उन कलाकारों ने बनाए हैं जो सिल्क रूट के ज़रिए कई देशों में आया-जाया करते थे.

बामियान में बुद्ध की मूर्तिबामियान के बुद्ध
बामियान में बुद्ध की प्रतिमाओं को फिर से खड़ा करने की कोशिशें...
द लास्ट सपर'द लास्ट सपर'
विंची की मशहूर कलाकृति 'द लास्ट सपर' इंटरनेट पर देख सकते हैं.
चित्र'कलाकार' हिटलर
इंग्लैंड में हिटलर के बनाए हुए चित्रों की नीलामी की गई है.
बामियानदिखेंगे बामियान के बुद्ध
लेज़र किरणों के ज़रिए बामियान के पहाड़ों पर बुद्ध की विशाल तस्वीरें दिखेंगी.
पाब्लो पिकासोपिकासो के रेखाचित्र
पाब्लो पिकासो के रेखाचित्रों की बिक्री पेरिस में हो रही है. बेच रही हैं उनकी प्रेमिका.
गोंड चित्रकारीलंदन में गोंड पेंटिंग
मध्य प्रदेश की गोंड चित्रकारी ने लंदन में भी अपनी अनोखी छाप छोड़ी है.
रेम्ब्राँ चित्रकारख़ामी से महानता
वैज्ञानिकों के मुताबिक़ एक चित्रकार की आँख में ख़ामी महानता में साबित हुई.

मेरे बारे में

मेरी फ़ोटो
GHAZIABAD, Uttar Pradesh, India
कला के उत्थान के लिए यह ब्लॉग समकालीन गतिविधियों के साथ,आज के दौर में जब समय की कमी को, इंटर नेट पर्याप्त तरीके से भाग्दौर से बचा देता है, यही सोच करके इस ब्लॉग पर काफी जानकारियाँ डाली जानी है जिससे कला विद्यार्थियों के साथ साथ कला प्रेमी और प्रशंसक इसका रसास्वादन कर सकें . - डॉ.लाल रत्नाकर Dr.Lal Ratnakar, Artist, Associate Professor /Head/ Department of Drg.& Ptg. MMH College Ghaziabad-201001 (CCS University Meerut) आज की भाग दौर की जिंदगी में कला कों जितने समय की आवश्यकता है संभवतः छात्र छात्राएं नहीं दे पा रहे हैं, शिक्षा प्रणाली और शिक्षा के साथ प्रयोग और विश्वविद्यालयों की निति भी इनके प्रयोगधर्मी बने रहने में बाधक होने में काफी महत्त्व निभा रहा है . अतः कला शिक्षा और उसके उन्नयन में इसका रोल कितना है इसका मूल्याङ्कन होने में गुरुजनों की सहभागिता भी कम महत्त्व नहीं रखती.