बुधवार, 2 फ़रवरी 2011

आधुनिक कला


आधुनिक कला १८६० से 1970 के दशक से विस्तारित अवधि के दौरान किए जाने वाले कलात्मक कार्यों का संदर्भ देता है, और उस युग की शैली और दर्शन को दर्शाता है.[१] सामान्यतः यह शब्द अतीत की परम्पराओं को पीछे छोड़ते हुए प्रयोग करने की भावना से संबद्ध है.[२] आधुनिक कलाकारों ने देखने के नए तरीकों और सामग्रियों और कला के कार्यों की प्रवृति पर नए विचारों के साथ प्रयोग किए. कल्पनात्मकता की ओर झुकाव आधुनिक कला की विशेषता है. सबसे नवीनतम कलात्मक कला को अक्सर समकालीन कला या पश्च-आधुनिक कला कहा जाता है.
आधुनिक कला की शुरुआत विन्सेन्ट वैन गॉग़, पॉल सिज़ैन, पॉल गॉगुइन, जॉर्जेस श्योरा और हेनरी डी टूलूज़ लॉट्रेक जैसे ऐतिहासिक चित्रकारों ने की, ये सभी आधुनिक कला के विकास को महत्वपूर्ण मानते थे. २०वीं सदी की शुरुआत में हेनरी मैटिस और कई युवा कलाकारों, जिनमें पूर्व-घनवादी जॉर्जेस ब्रैक्यू, आंद्रे डेरैन, रॉल डफ़ी और मौरिस डी व्लामिंक शामिल थे, ने "जीवंत", बहु-रंगी, भाववाहक, परिदृश्य और आकार चित्रकारिता जिसे आलोचक फ़ॉविज़्म कहते थे, को पेरिस आर्ट वर्ल्ड में प्रदर्शित किया. हेनरी मैटिस के द डांस के दो संस्करणों ने उनके करियर और आधुनिक चित्रकला के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.[३] यह मैटिस के परिलक्षित कला के साथ प्रारंभिक आकर्षण को दर्शाता है: नीले-हरे रंग की पृष्ठभूमि पर आकृतियों में उपयोग किए गए बेहतरीन उग्र रंग और नृत्य कलाओं की तालबद्ध प्रस्तुति भावनात्मक और हेडोनिजम की भावनाओं को व्यक्त करता है.
प्रारंभ में टुलुज़ लॉट्रेक, गॉगुइन और 19 वीं सदी के अन्य नवप्रवर्तकों से प्रभावित पैब्लो पिकासो ने अपने पहले घनवादी पेंटिंग को सीज़ैन के इस विचार के आधार पर बनाया था कि प्रकृति के सभी चित्रण तीन ठोसों में समाहित किए जा सकते हैं: घन, गोला और शंकु. लेस डेमोइसेलस डे’एविगनन 1907 पेंटिंग के साथ, पिकासो ने नाटकीय रूप से एक नया और स्वाभाविक चित्र बनाया, जिसमें पांच वेश्याओं वाले अपरिपक्व और आदिम वेश्यालय दृश्य, का चित्रण था, हिंसक चित्रित महिला, अफ्रीकी आदिवासी मास्कों के स्मरणकारी और उनके स्वंय के घनवादी अविष्कार का चित्रण किया था. विश्लेषणात्मक घनवाद को पैब्लो पिकासो और जॉर्जेस ब्राक्यू ने संयुक्त रूप से विकसित किया था, जिसका उदाहरण १९०८ से 1912 के मध्य वायलिन और कैंडलस्टिकग, पेरिस ने दिया. विश्लेषणात्मक घनवाद, ब्राक्यू, पिकासो, फ़र्नार्ड लेगर, जुएन ग्रिस, अल्बर्ट ग्लेज़िस, मार्शल डुचैम्प और १९२० के कई अन्य कलाकारों द्वारा किए जाने वाले कृत्रिम घनवाद के बाद घनवाद की पहली स्पष्ट अभिव्यक्ति थी. कृत्रिम घनवाद भिन्न आकृतियों, सतहों, कॉलेज़ तत्वों, पेपर कॉले और कई मिश्रित विषयों को प्रस्तुत कर चित्रित किया जाता है.
आधुनिक कला की धारणा आधुनिकता से संबंधित है.[४]

अनुक्रम

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[संपादित करें]आधुनिक कला का इतिहास

एडवर्ड मैनट, द लंचेवन ऑन द ग्लास(ले डेजेउनर सुर ई’हर्बे), 1863, मुसी ड'ओर्से, पेरिस

[संपादित करें]19 वीं सदी की बुनियाद

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Multi-colored portrait of a far eastern cortesan with elaborate hair ornamentation, colorful robelike garment, and a border depicting marshland waters and reeds.
Vincent van Gogh,Courtesan (afterEisen) (1887),Van Gogh Museum
Portrait of a tree with blossoms and with far eastern alphabet letters both in the portrait and along the left and right borders.
Vincent van GoghThe Blooming Plumtree (afterHiroshige) (1887), Van Gogh Museum
Portrait of a man of a bearded man facing forward, holding his own hands in his lap; wearing a hat, blue coat, beige collared shirt and brown pants; sitting in front of a background with various tiles of far eastern and nature themed art.
Vincent van Gogh,Portrait of Père Tanguy(1887), Musée Rodin
यद्यपि यह माना जाता है कि आधुनिक मूर्तिकला और वास्तुकला का उद्धभव उन्नीसवीं सदी के अंत में हुआ था, आधुनिक चित्रकला की शुरुआत ठीक इससे पहले हुई थी.[५] आधुनिक कला के जन्म को चिह्नित करने वाली सबसे निकटतम तिथि १८६३ है,[६] इसी वर्ष एडवर्ड मेनट ने अपनी पेंटिंग ले डेजेउनर सुर इ'हर्बे की प्रदर्शनी पेरिस के सालोन डेस रेफुसे स मेँ लगाई थी. इससे पहले की तारीखेँ भी प्रस्तावित की गई हैं, जिनमेँ 1855(जिस वर्ष गुस्ताव कॉर्बेट ने द आर्टिस्ट स्टुडियो प्रदर्शित की थी) और 1784 (जिस वर्ष जेक्स-लुइस डेविड ने अपनी पेंटिंग ओथ ऑफ द होरटिल पूरी की थी) शामिल हैं.[६] कला इतिहासकार एच. हार्वर्ड अर्नासन के शब्दों में: "ये सभी तारीख आधुनिक कला के विकास को दर्शाते हैं, लेकिन इनमेँ से कोई भी पूर्ण रूप से नई शुरुआत को चिह्नित नहीं करता.... सैकड़ों वर्षों मेँ क्रमिक कायापलट हुआ है."[६]
आधुनिक कला से जुड़े विचारों का ज्ञानोदय की तलाश सत्रहवीं सदी में ही की जा सकती है.[७] उदाहरण के लिए, महत्वपूर्ण आधुनिक कला आलोचक क्लेमेंट ग्रीनबर्ग, ने इम्मानुअल कांत को "पहला वास्तविक आधुनिकतावाद" कहा था, लेकिन साथ ही यह भी कहा था कि: "ज्ञानोदय के बाहर से की गई आलोचना... . आधुनिकता के भीतर की गई आलोचना है." [८] 1789 केफ्रांसीसी क्रांति ने सदियों पूर्व कुछ प्रश्नोँ और जोरदार राजनीतिक और सामाजिक बहस के बाद आम जनता द्वारा स्वीकारी गई मान्यताओं और संस्थानों को जड़ से उखाड़ दिया. इसने कला इतिहासकार अर्नस्ट गोम्बिर्च द्वारा कहे गए वक्तव्य" आत्म-चेतना जो लोगों को अपनी शैली के भवन को चयन करने मेँ मदद करता है और जो वॉलपेपर पैटर्न का चयन करता है" को बढ़ावा मिला.[९]
आधुनिक कला के अग्रदूत रुमानीवाद, यथार्थवाद और वास्तविकता और प्रभाववाद थे. 19वीं सदी के अंत मेँ, आधुनिक कला को प्रभावित करने वाले कई अतिरिक्त आंदोलनों का उदय हुआ: जिसमें पश्च-प्रभाववाद और प्रतीकवाद शामिल हैं.
इन आंदोलनों के प्रभाव विविध थे: अनावरण से पूर्वी सजावटी कला तक, विशेष रूप से जापानी चित्रकला, टर्नर और डेलाक्रोइक्स के रंगीन अविष्कारों तक, सामान्य जीवन के चित्रण में अधिक वास्तविकता की खोज तक, जो कि जीन-फ्रांकोइस मिलेट जैसे चित्रकारों की कार्य मेँ दिखता है. यथार्थवाद के अधिवक्ता पारम्परिक शैक्षणिक कला, जिसमें सार्वजनिक और आधिकारिक प्रभाव है, के आदर्शवाद के विरोध में खड़े थे.[१०] उन दिनों के सबसे सफल चित्रकार या तो कमीशन या अपने स्वयं के काम के बड़े सार्वजनिक प्रदर्शनियों के माध्यम से कामा किया करते थे. अधिकारिक, सरकार द्वारा प्रायोजित 'चित्रकारों के यूनियन थे, जबकि सरकारें नियमित रूप से नई तीक्ष्ण और सजावटी कला की सार्वजनिक प्रदर्शनियों का आयोजन किया करते थी.
प्रभाववादियों का तर्क था कि लोग वस्तुओं को नहीं देखते हैं, बल्कि उससे परवर्तित प्रकाश को देखते हैं, और इसलिए चित्रकारों को प्राकृतिक रोशनी (खुली हवा में)कार्य करना चाहिए, न कि स्टुडियो में, और उन्हें अपने कार्य में प्रकाश के प्रभाव समाहित करना चाहिए.[११] प्रभाववादी कलाकारों ने एक समूह, सोसाइटी एनोयमे कॉपरेटिव डेस आर्टिस्ट्स पेंटर्स. स्क्ल्पचर्स, ग्रेवेरस ( "चित्रकारों, मूर्तिकारों, और उकेरकों का एक संघ") का गठन किया, जिसने आंतरिक तनावों के बावजूद, कई स्वतंत्र प्रदर्शनियों का आयोजन किया.[१२] इस शैली को अपने "राष्ट्रीय" शैली के रूप में प्राथमिकता देते हुए विभिन्न देशों के कलाकारों ने अपनाया. इन कारकों ने इस विचार को स्थापित किया कि यह एक "आंदोलन" था. ये लक्षण - कला के समकालिक कार्य करने की पद्धति की स्थापना, आंदोलन और दृश्य सक्रिय समर्थन की स्थापना, और अंतर्राष्ट्रीय अभिग्रहण - को कला के आधिनिक काल मेँ हुए कलात्मक आंदोलनों द्वारा दोहराए जाएंगे.

[संपादित करें]प्रारंभिक 20 वीं सदी

चित्र:Chicks-from-avignon.jpg
पाब्लो पिकासो लेस डेमोइसेलस ड’एविग्नन 1907, आधुनिक कला संग्रहालय, न्यूयॉर्क
चित्र:La danse (I) by Matisse.jpg
हेनरी मैटिस, द डांस आई, 1909, आधुनिक कला संग्रहालय, न्यूयॉर्क
20 वीं के पहले दशक में फले फूले आंदोलनों में फ़ॉविज़्म, घनवाद, अभिव्यक्तिवाद और भविष्यवाद शामिल हैं.
१९१० के बीच के वर्षों और प्रथम विश्व युद्ध के अंत और घनवाद की उमंग के बाद, पेरिस में कई आंदोलनों का उद्धभव हुआ. जियोर्जियो डे चिरिको जुलाई 1911 में पेरिस चले गए, जहां वे अपने भाई एंड्री (सैविनो अल्बर्टो के रूप में ज्ञात कवि) से जुड़े. अपने भाई के माध्यम से वे सालोन ड'ऑटोम्ने के जुरी सदस्यों में से एक पियरे लाप्राडे से मिले, जहां उन्होंनें अपने तीन सर्वश्रेष्ठ कलाकृतियों की प्रदर्शनी की: एंजिमा ऑफ द ओरेकल , एंजिमा ऑफ एन ऑफ्टरनून और सेल्फ-पोट्रेट . 1913 के दौरान, उन्होंने सालोन देस इंडेपेंडेट्स और सालोन द'ऑटोम्ने मेँ अपने कार्य को प्रदर्शित किया, उनके कार्य की सराहना पाब्लो पिकासोऔर गुइलॉमे एपोलिनारे और कई अन्य ने की. उनके सम्मोहक और रहस्यमय पेंटिंग को अतियथार्थवाद की शुरुआत में सहायक माना जाता है. सांग ऑफ लव 1914, डे चिकारो के प्रसिद्ध कार्यों मेँ से एक है और अतियथार्थवादी शैली के सबसे पहले उदाहरणों मेँ है, हालांकि इसे दस वर्ष पहले चित्रित किया गया था लेकिन इस आंदोलन को 1924 में आंद्रे ब्रेटन "संस्थापित" किया था.
प्रथम विश्व युद्ध ने इस चरण का अंत कर दिया, लेकिन कई कला-रोधी आंदोलनों की शुरुआत की जैसे दादा, जिसमेँ मार्शल डुचैम्प के कार्य शामिल थे, और अतियथार्थवाद. डी स्टिल्ज़ और बॉहॉस जैसे कलाकार समूहों ने कला, वास्तुकला, डिज़ाइन, और कला शिक्षा से संबंधित नए विचार विकसित किए.
अमेरिका में 1913 मेँ आधुनिक कला को शस्त्रागार शो में उन यूरोपीय कलाकारों द्वारा प्रस्तुत किया गया, जो प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका चले आए थे.

[संपादित करें]द्वितीय विश्व युद्ध के बाद

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ही, अमेरिका नई कलात्मक आंदोलनों का के‍द्रीय बिंदु बना.[उद्धरण वांछित] 1950 और 1960 के दशक में कल्पनात्मक अभिव्यक्तिवाद, रंगीन पे‍टिंग, पॉप कला, ओप कला, सख्त सतही पेंटिंग, न्यूनतम कला, गीतात्मक कल्पना, फ़्लक्सस, पश्च न्यूनतमवाद, फ़ोटोवास्तविकता और विविध अन्य आंदोलनों का उद्धभव देखने को मिला. १९६० के अंत और 1970 के दशक में, पारंपरिक मीडिया पर अधिक लागत के कारण भूमि कला, प्रदर्शन कला, संकल्पनात्मक कला और अन्य कला के नए रूपों ने निरीक्षकों और आलोचकों का ध्यान आकर्षित किया था.[१३] और बड़ी स्थापनाएं और प्रदर्शन किए गए.
इस अवधि के दौरान, कई कलाकरों और वास्तुकारों ने "आधुनिक" विचार को नकार दिया और सामान्य पश्चआधुनिक चित्र बनाएं.[उद्धरण वांछित]
1970 के दशक के अंत तक, जब सांस्कृतिक आलोचकों ने "चित्रकला का अंत"(१९८१ में डगलस क्रिम्प द्वारा लिखे गए उत्तेजक निबंध का शीर्षक) पर बोलना शुरू किया, तब वीडियो कला जैसे तकनीकी प्रयोग करने वाले कलाकारों की बढ़ती संख्या के कारण नई मीडिया कला अपने आप में एक वर्ग बन गई.[१४] 1980 और 1990 के दशक में पे‍टिंग के महत्व को पुनः समझा गया, जिसका उदाहरण नव-अभिव्यक्तिवाद और आलंकारिक चित्रकला का उदय है.[१५]

[संपादित करें]कला आंदोलन और कलाकार समूह

(सूचीबद्ध प्रतिनिधि कलाकारों के साथ कालानुक्रमिक.)
आधुनिक कला

[संपादित करें]19वीं सदी

  • स्वच्छंदतावाद रूमानी आंदोलन - फ्रांसिस्को डि गोया, जे. एम. डब्ल्यू टर्नर, यूजीन डेलाक्रोएक्स
  • यथार्थवाद - गुस्तैव कॉर्बेट, कैमिली कैरट, जीन-फ़्रांसिस्को मिलेट
  • प्रभाववाद - एज़र डेगस, एडवर्ड मैनट, क्लाउड मोनेट कैमिली पिसारो, अल्फ्रेड सिस्ले
  • प्रभाववाद का बाद - जॉरजिस सीरट, पॉल सेज़ान, पॉल गॉग्युइन, विन्सेन्ट वैन गोघ, हेनरी डी टूलूज़-लॉट्रेक, हेनरी रॉज़ेओ
  • प्रतीकवाद - गुस्ताव मोर्यू, ओडिलन रेडन, जेम्स एन्सर
  • लेस नेबिस - पियरे बोनार्ड, एडॉर्ड वुइलार्ड फेलिक्स वैलोटन
  • पूर्व-आधुनिकतावादी मूर्तिकला - एरिसटाइड मैलल, अगस्त रोडिन

[संपादित करें]20 सदी की शुरूआत में (प्रथम विश्व युद्ध से पहले)

  • कला नौबढ़ और भिन्नताएं - जूगेंडस्टिल, आधुनिक शैली, आधुनिकतावाद - ऑबरे बीयर्डस्ले, अलफ़ा‍सो मुचा गुस्ताव क्लिम्ट,
  • कला नौबढ़ वास्तुकला और डिजाइन - एंटोनी गॉडी, ओटो वाग्नर, वीनर वेर्क्स्टेट, जोसेफ हॉफ़मैन, एडॉल्फ लूस, कोलोमन मोज़र
  • घनवाद - जार्ज ब्राक्यू, पैब्लो पिकासो
  • फ़ॉविज्म - आन्ड्रे डेरैन, हेनरी मैटिसे, मौरिस डे व्लामिंक
  • अभिव्यक्तिजनावाद - एगॉन शील, ऑस्कर कोकोशका, एडवर्ड मंचएमिल नोल्डे
  • भविष्यवाद - गियाकोमो बल्ला, अम्बर्टो बोकिनी, कार्लो कैर्रा
  • डाई ब्रूक - आर्नेस्ट लुडविग क्रिश्नर
  • डेर ब्लॉए रेटर - वैसिली कैंडिंस्की, फ़्रैंज मार्क
  • ओर्फ़िज़्म - रॉबर्ट डेलॉनाय, सोनिया डेलॉनाय, जैक्स विलन
  • फोटोग्राफ़ी - चित्रवाद, सीधी फोटोग्राफी
  • पश्च-प्रभाववाद - एमिली कैर
  • पूर्व-अतियथार्थवाद - जियोर्जियो डे चिरिको, मार्क चैगल
  • रूसी अवंत-गार्डे - कैसिमिर मेलेविच, नतालिया गोन्चारोवा, मिखाइल लैरीनोव
  • मूर्तिकला - पैब्लो पिकासो, हेनरी मैटिस, कॉन्स्तेनियन ब्रांकुसी
  • सिंक्रोनिज़्म - स्टैंटन मैकडोनाल्ड-राइट, मॉर्गन रसेल
  • उक्तमतावाद - विन्धम लुईस

[संपादित करें]प्रथम विश्व युद्ध से द्वितीय विश्व युद्ध तक

  • दादा - जीन आर्प, मार्सल डुचैम्प, मैक्स अर्नस्ट, फ्रांसिस पिकाबियो, कर्ट स्विटर्स
  • सिंथेटिक धनचित्रण शैली - जॉर्ज ब्राक्यू, जुआन ग्रिस, फ़ेर्नाड लेज़र, पैब्लो पिकासो
  • पिटुरा मेटाफ़िसिका - जियोर्जियो डे चिरिको, कार्लो कार्रा
  • डे स्टिज्ल - थियो वैन डज़बर्ग, पीट मोंड्रियन
  • अभिव्यक्तिवाद - एगॉन शिल, अमेडियो मोदिगिलानी, चैम सॉटिन
  • नए निष्पक्षता - मैक्स बेकमैन, ओट्टो डिक्स, जॉर्ज ग्रोस्ज़
  • आलंकारिक चित्रकारी - हेनरी माटिस, पियरे बोनार्ड
  • अमेरिकी आधुनिकता - स्टुअन डेविस, आर्थर जी डोव, मार्स्डन हार्टले, जॉर्जिया ओ'कीफ़ी
  • रचनात्मकतावाद - नॉम गाबो, {स2}गुस्ताव क्लुतसिस, टाट्लिन, लैस्ज़लो मोहोली-नागी, एल लि्स्सिट्ज़की, काश्मीर मेलेविच, वैडिन मेल्लर, अलेक्जेंडर रोड्चेन्को, व्लादिमीर टाट्लिन
  • अतियथार्थवाद - जीन आर्प, साल्वाडोर डाली, मैक्स अर्नस्ट, रेने माग्रिटी, आंद्रे मैसन, जोयन मिरो, मार्क चैगल
  • बॉहॉस - वासिल्ली कैंडिस्की, पॉल क्ली, जोसेफ अल्बर्ट्स
  • मूर्तिकला - अलेक्जेंडर काल्डर, अल्बर्टो गियाकोमेट्टी, गास्टन लैचिश, हेनरी मूर, पाब्लो पिकासो, जूलियो गोन्ज़ालेज़
  • स्कॉटिश रंगकार- फ्रांसिस कैडल, सैम्यूल पेप्लो, लेस्ली हंटर, जॉन डंकन फर्ग्यूसन
  • प्रधानतावाद - काज़िमिर मेलविच, अलेक्ज़ेंड्रा एक्स्टर, ओल्गा रोज़ानोवा नाडेझदा उदाल्तसोवा, इवान क्लियुम, ल्युबोव पोपोवा, निकोलाई सुटीन, नीना गेन्के-मेलर, इवान पुनी, सेनिया बोगुस्लावस्काया

[संपादित करें]द्वितीय विश्व युद्ध के बाद

  • चित्रकार - बर्नार्ड बुफ़े, जीन कार्ज़ॉ, मौरिस बोइटल, डैनियल डु जेनराड, क्लाउड-मैक्स लोचू
  • मूर्तिकला - हेनरी मूर,, डेविड स्मिथ, टोनी स्मिथ, अलेक्जेंडर काल्डर, इसामु नोगुची, अल्बर्टो गियाकोमेटी, सर एंथनी कारो, जीन डबफ़ेट, इसहाक विट्किन, रेने इचे, मैरिनो मारिनी, लुईस नेवेल्सन
  • अमूर्त अभिव्यक्तिवाद - विल्लेम डी कूनि‍ग, जैक्सन पोलक, हंस हॉफ़मैन, फ्रांज क्लिन, रॉबर्ट मदरवेल, स्टिल क्लाईफ़ोर्ड, ली क्रैस्नेर
  • अमेरिकी अमूर्त कलाकार - ली क्रैस्नर, इब्राम लासॉ, एड रेइनहार्ड, जोसेफ अल्बर्स, बुरगोयने डिल्लर
  • कला ब्रुत - एडॉल्फ वोल्फ़्ली, अगस्त नैटरर, फ़र्डिनांड चेवल, मैज गिल, पॉल साल्वाटोर गोल्डनग्रीन
  • आर्टे पोवेरा - जैनिस कॉनेलिस, लुसियानो फ़ैब्रो, मारियो मर्ज़, पिएरो मैन्ज़ोनी, अलिघिएरो बोएटी
  • रंग क्षेत्र चित्रकला - बार्नेट न्युमैन, मार्क रोथको, सैम फ्रांसिस, मॉरिस लुइस, हेलेन फ़्रैंकनथलर
  • टैचिस्म - जीन डबफ़ेट, पियरे सॉलागेस, हंस हार्टुंग, लुडविग मेरवार्ट
  • कोबरा - पियरे एलेचिन्स्की, कैरेल एप्पेल, अस्गर जॉर्न
  • नियो-दादा - रॉबर्ट रॉसचेनबर्ग, जैस्पर जॉन्स, जॉन चेम्बरलेन, यूसुफ बेउस, एडवर्ड कीनहोल्ज़
  • फ़लक्सस - जॉर्ज मैकिनस, एलन कैप्रो, नाम जून पैक, योको ओनो, डिक हिगिंस
  • दाउ-अल-सेट - कवि/कलाकार जोन ब्रोस्सा -एंटोनी टैपियस द्वारा वार्सिलोना में स्थापित
  • ग्रुपो एल पासो - एंटोनियो सौरा, पॅबलो सेरानो द्वा्रा मैड्रिड में स्थापित
  • ज्यामितीय मतिहीनता - वैसिली कैंडिस्की, काज़िमिर माल्विच, नादिर एफ़ोन्सो, मैनिलो रो, मारियो रैडिक, मिनो अर्जेन्टो
  • हार्ड-एज़ चित्रकला - जॉन मैकलॉफ़्लिन, एल्सवॉर्थ केली, फ्रैंक स्टेला, एल हेल्ड, रोनाल्ड डेविस
  • काइनेटिक कला - जॉर्ज रिकी, गेटुलियो एल्वियानी
  • भूमि कला - क्रिस्टो, रिचर्ड लांग, रॉबर्ट स्मिथसन, माइकल हेज़र
  • लेस ऑटोमैटिस्टेस - क्लाउड गॉवरेयु, जीन पॉल रियोपेले, पियरे गॉवरेयु, फ़र्नार्ड लेडुक, जीन-पॉल मॉस्सी, मार्शेल फ़ेर्रोन
  • न्यूनतम कला - सोल लेविट, डोनाल्ड जुड, डैन फ़्लाविन, रिचर्ड सेरा, एग्नेस मार्टिन
  • न्यूनतावाद के बाद - ईवा हेस्से, ब्रुस नॉमन, लिंडा बेन्गलिस
  • गीतात्मक अमूर्त - रोनी लैंडफ़ील्ड, सैम गिलैम, लैरी ज़ोक़्स, डैन क्रि्स्टेनसन
  • नव आलंकारिक कला - फ़र्नांडो बोटेरो, एंटोनियो बर्नी
  • नव अभिव्यक्तिवाद - जॉर्ज बेसलिट्ज़, एन्सलम कीफ़र, फ्रांसिस्को क्लेमेंटे, जीन-माइकल बास्क्वैट
  • नया यथार्थवाद - य्वेस क्लेन, पियरे रेस्टानी, अरमान
  • ओप कला - वसार्ली विक्टर, ब्रिज़ेट रिले, रिचर्ड एनुस्कीविच
  • बाहरी कला - हावर्ड फ़िन्सटर, ग्रैंडमा मोसेस, बॉब जस्टिन
  • फ़ोटोयथार्थवाद - ऑड्रे फ़्लैक, चक क्लोज़, डुएन हैन्सन, रिचर्ड एस्तेस, माल्कॉम मॉर्ले
  • पॉप कला - रिचर्ड हैमिल्टन, रॉबर्ट इंडियाना, जैस्पर जॉन्स, रॉय लिचेनस्टिन, रॉबर्ट रॉसचेनबर्ग, एंडी वरहोल, एड रुस्चा, डैविड हॉकने
  • युद्ध के बाद यूरोपीय आलंकारिक चित्रकला - लुसियान फ़्रेउड, फ्रांसिस बेकन, फ्रैंक ऑरबेच
  • आकार दिए गए कैनवास - ली बोन्टेको, फ्रैंक स्टेला, केनेथ नोलैंड, रॉन डेविस, रॉबर्ट मै‍गोल्ड.
  • सोवियत कला - अलेक्जेंडर डेइनेका अलेक्जेंडर गेरासिमोव, इल्या काबाकोव, कोमर एंड मेलाविड, अलेक्जेंडर ज़ोडनोव, लियोनिद सोकोव
  • स्थानिकवाद - लुसियो फ़ोन्टाना
  • दूरदर्शी कला - अर्न्स्ट फ़ुच्स, पॉल लैफ़ोले, माइकल बोवेन

[संपादित करें]महत्वपूर्ण आधुनिक कला प्रदर्शनियां और संग्रहालय

व्यापक सूची के लिए आधुनिक कला के संग्रहालय देखें.

[संपादित करें]बेल्जियम

  • स्मैक, गेन्ट

[संपादित करें]ब्राज़ील

[संपादित करें]कोलंबिया

[संपादित करें]इक्वाडोर

  • मुसेओ एंट्रोपोलिजिको ये डे कोन्टेम्पोरनियो, गुयाक्विल

[संपादित करें]फिनलैन्ड

  • एम्मा, एस्पो

[संपादित करें]फ्रांस

  • सेंटर जॉर्ज्स पोम्पिडो, पेरिस
  • मुसी डे’ओर्से, पेरिस
  • मुसी डे’आर्ट मॉर्डने डे ला विले डे पैरिस, पेरिस
  • मुसी पिकासो, पेरिस
  • आधुनिक और समकालीन कला का संग्रहालय, स्ट्रासबर्ग

[संपादित करें]जर्मनी

  • डॉक्युमेंटा, कैसल (जर्मनी), आधुनिक और समकालीन कला की पंच वर्षीय प्रदर्शनी
  • लुडविग संग्रहालय, कोलोन
  • पिनाकोथेक डेर मॉडर्ने, म्यूनिख

[संपादित करें]भारत

[संपादित करें]ईरान

[संपादित करें]इटली

[संपादित करें]मेक्सिको

  • म्युज्यो दे आर्टे मॉर्डने, मेक्सिको डी.एफ.

[संपादित करें]नीदरलैंड

[संपादित करें]स्पेन

  • म्युजे डी'आर्टा कॉंटेम्परानी डे बार्सिलोना, बार्सिलोना
  • म्युजे नेसिनल सेंटरो डे आर्टे रेइना सोफिया, मैड्रिड
  • इंस्टिट्यूट वैलेंसिया डा'आर्ट मॉर्डन, वैलेंसिया

[संपादित करें]स्वीडन

[संपादित करें]ब्रिटेन

[संपादित करें]अमेरिका

  • अलब्राइट-नॉक्स आर्ट गैलरी, बफेलो, न्यूयॉर्क
  • आर्ट इंस्टिट्यूट ऑफ़ शिकागो, शिकागो
  • गगेनहेम संग्रहालय, न्यूयॉर्क सिटी और वेनिस(इटली); हाल ही में बर्लिन(जर्मनी), बिलबाओ(स्पेन) और लास वेगास, नेवादा
  • हाई संग्रहालय, अटलांटा, जॉर्जिया
  • लॉस एंजिल्स काउंटी म्युजियम ऑफ़ आर्ट, लॉस एंजिल्स, कैलिफोर्निया
  • मेनिल कलेक्शन, ह्यूस्टन
  • ललित कला संग्रहालय, बोस्टन, मैसाचुसेट्स
  • आधुनिक कला संग्रहालय, न्यूयॉर्क सिटी
  • सैन फ्रांसिस्को आधुनिक कला संग्रहालय, सैन फ्रांसिस्को
  • वाकर कला केन्द्र, मिनीपोलिस
  • व्हिटनी म्युजियम ऑफ़ अमेरिकन आर्ट, न्यूयॉर्क सिटी

[संपादित करें]इन्हें भी देखें

  • आधुनिकतावाद
  • आधुनिक कलाकारों की सूची
  • 20 वीं सदी की महिला कलाकारों की सूची
  • 20 वीं सदी की कला
  • 20 वीं शताब्दी की पश्चिमी चित्रकला
  • कला घोषणापत्र
  • कला आंदोलन
  • कला अवधियां
  • समकालीन कला
  • चित्रकला का इतिहास
  • आधुनिक वास्तुकला
  • उत्तरआधुनिक कला
  • पश्चिमी चित्रकला

[संपादित करें]नोट

  1.  [2] ^ एट्किन्स 1990, पृ. 102.
  2.  [3] ^ गोम्ब्रिच 1958, पृ. 419.
  3.  [4] ^ रसेल टी. क्लेमेंट. फ़ॉर फ्रेंच सिम्बोलिस्ट्स. ग्रीनवुड प्रेस, 1996. पृष्ठ 114.
  4.  [5] ^ " शब्द ’आधुनिक','आधुनिकता’, और ’आधुनिकतावाद’ के बीच के संबंध को इस प्रकार से समझा जा सकता है कि सौंदर्यात्मक आधुनिकतावाद उस अवधि के आधुनिकता की उच्च या वास्तविक विशेषता का एक रूप है, जब सामाजिक, आर्थिक, और सांस्कृतिक जीवन व्यापक रूप से देखा जाए तो आधुनिकता द्वारा परिवर्तित किया गया था... [इसका अर्थ है कि] उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के अंत में आधुमिकतम कला को आधुनिक समाज के संदर्भ से बाहर सोचा नहीं जा सकता है. सामाजिक आधुनिकता आधुनिकतावादी कला का घर है, जहाँ कला इसके खिलाफ है." काहून 1996, पृ. 13.
  5.  [7] ^ आर्नासन 1998, पृ. 10.
  6. ↑ ६.० ६.१ ६.२ [8] ^ आर्नासन 1998, पृ. 17.
  7.  [11] ^ "सत्तरहवीं और अठारहवीं सदी के दौरान विश्व को नए तरीके से देखने की लहर उठी, जिसे आगे चलकर नए विश्व , आधुनिक विश्व का निर्माण किया". काहून 1996, पृ. 27.
  8.  [11] ^ फ्रैस्किना और हैरिसन 1982, पृ. 5.
  9.  [13] ^ गोम्ब्रिच 1958, पृ. 358-359.
  10.  [15] ^ कोरिंथ, कस्टर, ब्राउनर, विटाली, और बट्स 1996, पृ.25.
  11.  [16] ^ कोग्नियट 1975, पृ. 61.
  12.  [17] ^ कोग्नियट 1975, पृ 43-49.
  13.  [19] ^ मुलिंस 2006, पृ. 14.
  14.  [21] ^ मुलिंस 2006, पृ. 9.
  15.  [22] ^ मुलिंस 2006, पृ 14-15.

[संपादित करें]सन्दर्भ

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क्लासिक


 क्लासिक

क्लासिक मूलत: प्राचीन यूनान और रोम के लेखकों और उनकी कृतियों, किंतु अब, किसी भी देश और युग के कालजित्‌ कीर्तिलब्ध, सर्वमान्य या प्रतिष्ठित लेखकों और उनकी कृतियों के लिये प्रयुक्त शब्द। वर्तमान अर्थ में इस शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग ईसा की दूसरी सदी में रोमन लेखक औलस गेलियस ने किया। उसके अनुसार लेखक दो कोटि के होते हैं।
1. क्लासिकल स्क्रिप्तोर अर्थात्‌ वह जिनकी रचना प्रथम कोटि की या कीर्तिमानस्थापक होती है, और
2. प्राजीतारियस स्क्रिप्तोर अर्थात्‌ वह जिसकी रचना सर्वहारा की शैली में होने के कारण साधारण कोटि की या कालसापेक्ष होती है।
रोम के छठे राजा सेर्वियस तूलियस ने अपने संवैधानिक सुधारों में संपत्ति के अधिकार पर रोम के नागरिको के पाँच वर्ग बनाए थे। रोमन समाज के इस वर्गीय विभाजन में सबसे वैभवसंपन्न नागरिक ‘क्लासिक’ (सर्वोच्च या अभिजात) और सबसे निराश्रित और संपत्तिहीन नागरिक ‘प्रालीतारी’ (सर्वहारा) कहे गए थे। लेखकों की उपर्युक्त दो कोटियों का नामकरण इसी सामाजिक विभाजन के अनुकरण के आधार पर हुआ। आधुनिक युग में संगीत, चित्र, पूर्ति, चलचित्र आदि कलाओं के प्रतिष्ठित मेधावियों और उनकी रचनाओं के लिये भी कलासिक शब्द का व्यवहार किया जाने लगा है। क्लासिक शब्द की अर्थसीमा को और भी विस्तृत कर अब जीवन के किसी क्षेत्र में भी विश्रुत या स्थायी कीर्तिमान स्थापित करने वाले व्यक्ति, उसकी दक्षता, शैली या उपलब्धि, अनन्य या विख्यात क्रीड़ाप्रतियोगिताओं इत्यादि को भी क्लासिक कहा जाता है। यथा-क्रिकेट में डब्ल्यू. जी. ग्रेस और रणजी और हाकी में ध्यानचंद को क्लािसिक कहा जाता है। इसी प्रकार विश्वविख्यात घुड़दौड़ प्रतियोगिता डर्बी, नौकादौड़ प्रतियोगिता हेनली रीगैटा, टेनिस प्रतियोगिता ‘विबलडन’ इत्यादि को, उनके व्यावसायिक या अव्यावसायिक रूप को ध्यान में रखे बिना, ‘क्लासिक’ की संज्ञा दी जाती है। टी. एस. ईलियट ने अपने प्रसिद्ध लेख ‘ह्‌वाट इज़ ए क्लासिक’ में ए गाइड टु द ‘क्लासिक्स’ नामक पुस्तक का उल्लेख किया है, जिसका उद्देश्य पाठकों को प्रतियोगिता के पूर्व ही डर्बी में प्रथम आने वाले घोड़े के विषय में सही अनुमान करने की क्षमता प्रदान करना था। इस प्रकार क्लासिक शब्द के विभिन्न संदर्भो में विभिन्न अर्थ हैं।
जहाँ तक क्लासिक शब्द के साहित्यिक प्रयोग का प्रश्न है, पश्चिम की देन होते हुए भी, इसका प्रचलन अब संसार की सभी भाषाओं और साहित्यों में है। किसी भी प्राचीन भाषा या साहित्य को उससे प्रभावित या विकसित किसी आधुनिक भाषा या साहित्य के संदर्भ में ‘क्लासिक’ कहा जाता है। इस प्रकार संस्कृत को अधिकांश भारतीय भाषाओं या साहित्यों के संदर्भ में या प्राचीन चीनी भाषा और उसके साहित्य को आधुनिक चीनी भाषा और साहित्य के संदर्भ में ‘क्लासिक’ कहा जाता है। दूसरी ओर प्रत्येक भाषा के साहित्य का कालविभाजन कुछ विशेष साहित्यिक मूल्यों के आधार पर ‘क्लासिक’ तथा अन्य शब्दों में व्यक्त किया जाता है। इस प्रकार स्वयं संस्कृत और प्राचीन चीनी साहित्य के भीतर ‘क्लासिक’ काल माने जाते हैं। साथ ही संस्कृत के सापेक्ष हिंदी अ ‘क्लासिक’ भाषा और साहित्य है, किंतु हिंदु में भी अपना ‘क्लासिक काल’ है।
यहाँ ‘क्लासिक’ शब्द और उसके मूल्यों की विवेचना उन्हीं संदर्भो में की गई है जिनमें उनका विकास हुआ।

अनुक्रम

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[संपादित करें]प्राचीन ग्रीक और रोमन साहित्य

प्राचीन ग्रीस और रोम का साहित्य कालविस्तार, वस्तु और विधाओं की विविधता, शिल्पगत समृद्धि और यूरोपीय साहित्य और संस्कृति की मुख्य प्रेरणात्मक शक्ति की दृष्टि से असाधरण महत्व का है। उसका प्रसार होमर (ल. ९०० ई. पू.) से लेकर जुस्तिनियन (५२७ ई.) तक माना जाता है। १४ सदियों के इस लंबे साहित्यिक इतिहास के तीन कालविभाग किए जाते हैं:
(१) क्लासिकल- होमर से लेकर सम्राट सिकंदर की मृत्यु तक, (ल. ९०० ई. पू.-३२३ ई. पू.),
(२) हेलेनिक (३२३ ई. पू.-१०० ई.),
(३) हेलेनिकोत्तर या ग्रेको-रोमन (१०० ई.-५२९ ई.)।

[संपादित करें]क्लासिकल काल

इसे अंशत: वीरगाथाकाल कहना अनुचित न होगा, महाकाव्य, गीतिकाव्य, नाटक और गद्य-सभी में नवीन किंतु श्रेष्ठ कृतित्व का काल है। अंधकवि होमर वीरगाथाकाल के साथ साथ यूरोप का आदि कवि भी हैं। उसकी प्रसिद्ध रचनाओं, ‘ईलियद’ और ‘ओदेसी’, में यूनान के चारणों की लंबी मौखिक परंपरा और उसकी व्यक्तिगत प्रतिभा का संगम है। ग्रीक वीरछंद हेक्सामीअर में रचित युद्ध और पराक्रम की ये कथाएँ इतनी लोकप्रिय हुई कि इनके गायकों की ‘होमरीदाई’ (होमर के पुत्र) नामक श्रेणी बन गई। इन्हें होमर के लगभग ३०० वर्ष वाद छठी सदी ई. पू. में लिपिबद्ध किया गया। इसी वीरछंद का प्रयोग आठवीं सदी ई. पू. में हेसिआद ने अपनी नीतिपरक और दार्शनिक कविताओं में किया। बाद में हेसिआद की परंपरा में ही ज़ेजोफेनिज, पारमेनीदीज, एंपिदोक्लीज़ आदि दार्शनिक कवि हुए।
सातवीं सदी ई. पू. में ग्रीक लिरिक या गीतिकाव्य का जन्म हुआ। ‘लीरे’ नामक तंत्री वाद्ययंत्र के स्वर पर गाए जानेवाले इनगीतों का प्रारंभ राजनीतिक विष्यवस्तु से हुआ लेकिन बाद में उन्होंने प्रधानत: प्रयाणनिवेदन या मरसिया (ऐलेजी) का रूप ग्रहण किया। इनकी रचना आइएंबिक छंदों में होती थी। व्यक्तिगत गायन के लिये रचित इन गीतों के क्षेत्र में सबसे प्रसिद्ध नाम आल्कीयस और कवयित्री सैफ़ो के हैं। इन व्यक्तिगत गीतों के अतिरिक्त सामूहिक (कोरस) गीतों का भी उदय हुआ। इनका चरमोत्कर्ष छठी-पाँचवी सदी ई. पू. में पिंदार की रचनाओं में हुआ।
धार्मिक कृत्यों के अवसर पर साधारण जन द्वारा गाए जानेवाले ‘कोरस’ गीतों से पाँचवीं सदी ई. पू. में प्राचीन यूनानी साहित्य में नाटकों का अत्यंत महत्वपूर्ण विकास हुआ। त्राजेदी (दु:खांत नाटक) के क्षेत्र में ईस्किलस, सोफ़ोक्लीज़ और यूरीपीदीज़ और कामेदी (सुखांत नाटक) के क्षेत्र में अरिस्तोफ़नीज के नाम विख्यात हैं।
गद्य का विकास साहित्य की अन्य विधाओं के बाद, प्राय: चौथी सदी ई. पू. में हुआ। तीन मुख्य दिशाएँ थीं : वक्तृता, जिसमें सबसे प्रसिद्ध नाम दिमास्थेनीज़ का है, इतिहास जिसमें सबसे प्रसिद्ध नाम हेरीदोतस, यूकिदीदीज़ (यूसिडाइडीज़) और ज़ेनोफ़ोन के हैं।

[संपादित करें]हेलेनिक काल

इस काल के साहित्य में मौलिक प्रयोगों के स्थान पर अनुकरण और विद्वत्ता की प्रवृति अधिक है। इस काल की कविताएँ प्राय: प्रेमविषयक, लघु और परिमार्जित हैं। अपोलोनियस रोदियस ने प्राचीन वीरकाव्य की परंपरा को जीवित रखने और लोकप्रिय बनाने का असफल प्रयत्न किया। कालीमाखस के नेतृत्व में स्फुट प्रेमविषयक कविताओं का प्रचलन अधिक हुआ। अन्य कवियों में एरातस और निकांदर उल्लेखनीय हैं।
यह नाटक का ह्रासकाल था। दु:खांत नाटक के क्षेत्र में इस काल का सबसे प्रसिद्ध लेखक ली क्फ्ऱोन है।
इस काल की कविता में विकास की एक नई दिशा के रूप मे थियोक्रितस, बियोन और मौस्कस के पशुचारण, शोकगीतों, ग्वालगीतों का महत्वपूर्ण स्थान है।
वस्तुत: यह कान गद्य में अधिक समृध है। गणित, ज्योतिष, इतिहास, भूगोल, आलोचना, व्याकरण, भाषाशास्त्र आदि के संबंध में रचनाएँ प्रस्तुत हुई। इस काल के इतिहासकारों में पोलीबियस, स्त्रावो और प्लूतार्क विशेष प्रसिद्ध हैं।

[संपादित करें]हेलेनिकोत्तर काल

रोम द्वारा यूनान पर विजय के बाद का, अर्थात्‌ ग्रेको-रोमन साहित्य गद्य में इतिहास और आलोचना शास्त्र की दृष्टि से ही महत्वपूर्ण है। रोम के ईसाई धर्म में दीक्षित होने के बाद प्रकृतिपूजक ग्रीस के साहित्य और संस्कृति को बहुत चोट पहुंची। फिर इस युग में प्लूतार्क और लूसियन जैसे इतिहासकार और दियोनीसियस तथा लाजिनस जैसे आलोचनाशात्री हुए।
प्राचीन रोमन या लातीनी साहित्य प्रसार और समृद्धि दोनों ही दृष्टियों से प्राचीन ग्रीक साहित्य से घटकर है। इसके भी तीन विभाजन किए जाते हैं : (१) रिपब्लिक या गणतंत्र युग (२५०-२७ ई. पू.), (२) आगस्तस युग (२७ ई. पू.- १४ ई.), (३) साम्राज्य युग (१४ ई.-५२४ ई.)।
1. रिपब्लिक युग में प्रहसन, नाटक गद्य कविता के क्षेत्र में विशेष कार्य हुआ। प्रहसन में माक्कियस प्लातस, स्तातियस और तेरेंस या तेरेंतियस आफ़ेर, गद्य में वारे और प्रसिद्ध वक्ता तथा राजनीतिज्ञ सिसरो और कविता में लुक्रिशियस तथा कातुलस इस युग के प्रसिद्ध साहित्यकार हैं।
इन सभी लेखकों की विष्यवस्तु रोम के जीवन से संबद्ध थी, लेकिन इनकी रचनाओं के रूप पर प्राचीन ग्रीक साहित्य का गहरा असर है।
2. आगस्तस काल लातीनी साहित्य का स्वर्णयुग माना जाता है। इसके साथ लातीनी कविता के सबसे महान कवि वर्जिल का नाम जुड़ा हुआ है। गड़ेरिया जीवन संबंधी दस कविताओं, एक्लोग्ज़ और ग्रीक योद्धा इस के जीवन पर आधारित महाकाव्य, ज्योर्जिक्स के लिये प्रसिद्ध है। उसके साहित्य में ग्रीक और रोमन सांस्कृतिक परंपराओं, रोमन साम्राज्य के तत्कालीन गौरव और एक महान यूरोपीय सभ्यता के उदय के स्वप्न की अत्यंत प्रौढ़, परिमार्जित और समन्वित अभिव्यक्ति है। उसके दृष्टिकोण की सार्वभैम व्यापकता और उदारता और उसकी कविता में ग्रीक और लातीनी कविता की रूपगत शालीनता और सौंदर्य के चरमोत्कर्ष का उल्लेख करते हुए टी. एस. ईलियट ने कहा है : ‘हमारा कलासिक, समसत यूरोप का क्लासिक, वर्जिल है’।
इस युग के दो अन्य विख्यात कवियों में होरेस और ओविद हैं। पहला अपनी व्यंग्य और कटाक्षपूर्ण रचनाओं और कसीदों (ओडों) के लिये और दूसरा प्रणयकविताओं और मरसियों के लिये प्रसिद्ध है।
लिवियस या लिवी इस यु ग का प्रसिद्ध इतिहासकार है। उसने रोम का इतिहास लिखा।
3. साम्राज्यकाल के दो उपविभाजन किए जाते हैं: (अ) रजत काल (१४ ई.-११७ ई.), (ब) ईसाई काल (११७ ई.-५२४ ई.)। रजतकान के प्रसिद्ध साहित्यकारों में सेनेका ने ग्रीक परंपरा में त्राजेदी, ल्यूकन ने महाकाव्य, फ्लाकस और जुवेनाल व्यंग्य और कटाक्ष, प्लिनी ने इतिहास, क्विंतिलियन ने साहित्यालाचन और इतिहास तथा तासितस ने जीवनचरित, इतिहास, साहित्यिक आलोचना इत्यादि की रचना से लातीनी साहित्य को समृद्ध किया । विद्वानों के मतानुसार वास्तव में रजतयुग के साथ लातीनी साहित्य के क्लासिकल युग की अंत हो जाता है, क्योंकि इसके बादवाले लातीनी साहित्य में भाषा और भाव की शालीनता का उत्तरोत्तर क्षय होता गया।
दूसरी सदी के बाद लातीनी साहित्य पर ईसाई धर्म की प्रभुता स्थापित हो गई। इस साहित्य में प्राचीन ग्रीक और लातीनी मूर्ति और प्रकृतिपूजक परंपरा और ईसाई धर्म की मान्यताओं के बीच तीव्र द्वंद्व की अभिवयक्ति हुई। इस युग के उल्लेखनीय साहित्यकारों में तरतूलियन, मिनूसियस फ़लिक्स, लाक्तांतियस, संत जेरोम, संत आगुस्तिन, बोएथियम, कासियादोरस, संत बेनेदिक्त, ग्रेगरी महान्‌, संत इसीदार आदि हैं।
ईसा की छठी सदी से लेकर पूरे मध्य युग तक लातीनी साहित्य की रचना होती रही । चर्च का सारा कार्य लातीनी में होता ही था, इसके अतिरिक्त लौकिक साहित्य, दर्शन और शिक्षा के क्षेत्र में भी इस भाषा का प्रमुख स्थान था। इस लंबे काल के रचनाकारों में कुछ प्रसिद्ध नाम ये हैं: कोलंबानस (५४३-६१५), बीड (६७३-७३५), अल्कुइन (७३५-८०४), संत बर्नार्ड (१०९०-११५३), संत तोमस अक्विनस (१२२४-७४), दांते (१२६५-१३२१)। इस युग में लातीनी की महत्वपूर्ण भूमिका का अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि इसके साहित्यकार ने केवल इटली या रोम के थे, बल्कि आयलैंड, इंग्लैंड और पश्चिमी यूरोप के अनेक देशों के भी थे।

[संपादित करें]पुनर्जागरण (रेनेसाँ ; १४५०-१५५०)

पुनर्जागरण यूरोप में ग्रीक और रोमन साहित्य, कला और दर्शन के प्रति नई सजगता और अभिरूचि का काल है। रैनेसाँ का उदय अधिकतर विद्वान्‌ १४५३ ई. के बाद से मानते हैं, जब तुर्को ने कुस्तुनतुनिया पर विजय प्राप्तकर ग्रीकरोमन सभ्यता को पश्चिम की ओर इटली में शनण लेने के लिये विवश किया। कुछ इसका प्रारंभ १४४० ई. में मुद्रण के आविष्कार से मानते हैं। इससे भी पूर्व १०वीं और १२वीं सदियों में नवस्फुरण के संकेत मिलते हैं। १५वीं सदी के पहले और उसके पूर्वार्ध में ही इस जागरण की पूर्वपीठिका इटली के अनेक नगरों में, जिनमें रोम और फ्लोरेंस प्रधान थे, तैयार हो चुकी थी। इसका नेतृत्व करनेवालों में दांते, पेत्रार्क : (१३०४-७४), बोक्काचो (१३१३-७५), कोजीमो मेदिची (१३८९-१४६४) इत्यादि प्रमुख थे । किंतु १५वीं सदी के मध्य से यह प्रक्रिया इतनी वेगवती और व्यापक हो गई कि यहां से मध्य युगीन यूरोप का आधुनिकता में संक्रमण माना जाता है। इस संक्रमण के साथ ग्रीक और रोमन साहित्य, संस्कृति और कला के उदार लौकिक एवं मानवतावादी दृष्टिकोण ने मध्ययुगीन यूरोप की संकुचित तथा रूढ़ धर्मिकता और परलोकपरायण्ता एवं उनके सहयोगी व्यक्ति-स्वातंत्रय-विरोधी सामंती अंकुशों को नि:सत्व कर दिया। पुनर्जागरण ने आदिपाप और हीनता के सिद्धांत के स्थान पर मानव काया की पवित्रता और व्यक्ति के विकास की अमित संभावनाओं में आस्था की प्रतिष्ठा की। यह प्रवृति इतनी प्रबल थी कि स्वयं चर्च को इसके साथ समझौता करना पड़ा। फ्रेंच विद्वान जसराँ के अनुसार लौकिकता और मानवतावाद की इस असंदिग्ध विजय का प्रतीक कांसे की बनी औरत की वह नंगी मूर्ति थी जो पुनर्जागरण के बाद स्वयं एक पोप की समाधि पर स्थापित की गई ।
पुनर्जागरण ने मानवतावाद के साथ साथ प्राचीन ग्रीक और रोमन साहित्यिक परंपरा को भी पुनरुज्जीवित किया, जिसके फलस्वरूप इतालवी साहित्य को काव्य, ताटक, आख्यायिका, इतिहास आदि की वस्तु और रचना के आदर्श विधान प्राप्त हुए। प्राचीन ग्रीक और लातीनी साहित्यकारों की रचनाओं से प्रेरणा ग्रहण करने के अतिरिक्त १६वीं सदी के इतालवी साहित्यकारों ने अरस्तु और होरेस की पोएतिक्स और आर्स पोएतिका नामक रचनाओं को काव्य के लक्षण ग्रंथ के रूप में स्वीकृत किया। पुनर्जागरण ने ही फ्लोरेंस में लोरेंत्सों मेदिची के नेतृत्व में नवअफ़लातूनवाद को भी जन्म दिया, जिसका गहरा असर इटली और यूरोप के अन्य देशों की प्रेमसंबंधी कविताओं पर पड़ा।
इटली की सीमाओं को लाँघकर क्लासिकल नवजागृति १५वीं १६वीं सदी में ्फ्रांस में और १६वीं सदी में स्पेन, जर्मनी और इंग्लैंड में पहूंची। इस नवजाग्रति ने रोमन कैथोलिक चर्च के अंतर्गत यूरोप की एकसूत्रता भंगकर इन देशों की निजी प्रतिभा को उन्मुक्त किया। इसलिये इनमें से हर देश ने इस नई चेतना को अपने अपने साँचों में ढाला। धर्म, संस्कृति, साहित्य, कला, विज्ञान, शिक्षा, सभी पर इस जागृति की छाप पड़ी। इस आंदोलन के संदेश को इटली के अग्रणियों ने यूरोप के देशों में पहुंचाया और उसे ग्रहण करने के लिये यूरोप के देशों के अग्रणी इटली पहुँचे। इटली के लियोनार्दो दा विंसी और अलामन्नी ्फ्रांस और कास्तिग्लिओने स्पेन पहुंचे। पश्चिमी यूरोप से महान्‌ धार्मिक नेता लूथर (१४८३-१५४६) और मेधावी मानवतावादी इरैस्मस (१४४६-६७-१५३६) इटली पहुंचे। ्फ्रांस के प्लेइया (Pleiad) के कवियों, जर्मनी के धर्मसुधार आंदोलन (रिफ़र्मेशन), स्पेन की लिरिक काव्यधारा, इंग्लैंड के एलिज़ाबेथयुगीन साहित्य की मूल प्रेरणा यही नवजागृति थी।
इस नवजागृति की विशेषता यह थी कि उसने जहाँ एक ओर अपने प्राचीन क्लासिकल आदर्श उपस्थित किए, वहां दूसरी ओर व्यक्ति की चेतना को मुक्तकर उसे प्रयोग और सृजन की नई दिशाओं में जाने का साहस भी दिया।
१७वीं और १८वीं सदियों में इन्हीं आदर्शो के रूढ़ि बन जाने के बाद इस रचनात्मक स्फूर्ति का भी लाप हो गया। प्राचीन क्लासिकों के प्रवाह को रीति के कुंड में बांध कर एक नए वाद ने जन्म लिया, जिसे नियोक्लासिसिज्म कहा जाता है। अक्सर ‘क्लासिसिज्म’ और ‘नियो-क्लासिसिज्म’ पर्याय के रूप में प्रयुक्त होते हैं, किंतु पुराने क्लासिकों के आदर्श और वाद में बंध जाने के बाद क्लासिसिज्म या नियो-क्लासिसिज्म के आदर्शो के भेद को समझना आवश्यक है।

[संपादित करें]क्लासिसिज्म या नियो-क्लासिसिज्म (रीतिवाद)

यूरोप मेंनियो क्लासिसिज्म को प्रतिष्ठित करने में मुख्य भूमिका १७वीं सदी के फ्रेंच साहित्यकारों और आलोचकों की थी, जिन्होंने १६वीं सदी के इतालवी आलोचकों द्वारा अरस्तु, होरेस आदि प्राचीन ग्रीक और रोमन साहित्यचिंतकों के सिद्धांतों पर किए गए मतैक्यहीन विचारविमर्श को कठोर व्यवस्थित, और प्राय: निर्जीव रीति का रूप दे दिया । ्फ्रेंच आलोचनाशास्त्री प्राचीन ग्रीक और रोमन चिंतकों के पास सीधे न पहुंचकर अपनी रुचि के इतालवी आलोचनाशास्त्रियों के माध्यम से पहुँचे, जिसके फलस्वरूप उन्होंने काफी स्वच्छंदता के साथ प्राचीन क्लासिको, विशेषत: अरस्तू के सिद्धांतों पर अपनी रीति-अरीति आरोपित कर दी।
आलोचना में इस रीतिवाद का प्रथम महत्वपूर्ण प्रचारक मैलर्ब (१५५५-१६२८) हुआ। १६३० से १६६० के बीच इस रीतिवाद का प्रसार और भी हुआ। यह कार्य शाप्लें (१५९४-१६७४), ब्वायलो (१६३६-१७११), रापैं, ले बोस्सू इत्यादि के द्वारा संपन्न हुआ और इसमें उन्हें लुई के दरबार के संरक्षण में संस्थापित ्फ्रेंच अकादमी, देकार्त के बुद्धिवाद और कैथोलिक चर्च से प्रेरणा और समर्थन प्राप्त हुआ।
नियो-क्लासिकल आलोचनाशास्त्र का ध्यान कविता, जिसमें महाकाव्य और दु:खांत तथा सुखांत रूपक भी शामिल थे, की ओर हो गया। उसके कुछ साधारण सिद्धांत थे, जैसे, कविता का लक्ष्य मनोरंजन से अधिक नैतिक शिक्षा है; काव्यशास्त्र या रीति का ज्ञान प्रतिभा से अधिक आवश्यक है; रीति का अर्थ कलासिकों का अनुकरण है: काव्य की वस्तु में ‘सत्य’ सर्वोपरि है और सत्य का अर्थ है मानव द्वारा अनुभूत सार्वभौम सत्य; और कल्पना के उद्वेग के स्थान पर बौद्धिक संयम और संतुलन होना चाहिए; अभिव्यक्ति में स्पष्टता और लाघव होना चाहिए; रचनाविधान में व्यवस्था, अनुपान और संतुलन का सम्यक्‌ निर्वाह होना चाहिए। संक्षेप में, इन साधारण नियमों की तीन धुरियाँ थी, बुद्धि, नीर-क्षीर-विवेक और कलात्मक अभिरूचि।
जहाँ तक काव्यरूपों का प्रश्न था, नियो-क्लासिकल आलोचना शास्त्रियों के अनुसार प्रत्येक रूप के विषय, लक्ष्य, प्रभाव और शैलियाँ प्राचीनों ने निश्चित कर दी थी। इसी आधार पर उन्होंने महाकाव्य और सुखांत नाटकों के रचनाविधान को रीतिबद्ध किया। उन्होंने दु:खांत में प्रहसन और प्रहसन में दु:खांत के तत्वों के सम्मिश्रण की निंदा की और काल, देश एवं घटना के संधित्रय को रूपक के रचनाविधान का केंद्रीय सिद्धांत माना।
नियो-क्लासिकल सिद्धांतों का गहरा असर तत्कालीन यूरोपीय साहित्य पर पड़ा क्योंकि १४वें लुई का ्फ्रांस यूरोप का सांस्कृतिक केंद्र था। १८वीं सदी का अंग्रेजी साहित्य नियो-क्लासिकल आदर्शो का प्रतिबिंब है।
स्पष्ट है कि प्राचीन ग्रीक और लातीनी क्लासिकों और रेनेसाँ के उनके अनुयायियों को नियो-क्लासिकल साहित्यकारों से एक नहीं किया जा सकता। एक ओर अन्वेषण या परंपरानुमोदित अन्वेषण है, दूसरी ओर इस अन्वेषण की उपलब्धि को रूढ़ि में बदल देने का प्रयत्न। टी. एस. ईलियट ने वर्जिल पर लिखे गए अपने लेख ‘ह्वाटइज़ क्लासिक’ में क्लासिसिज्म़ की जिन विशेषताओं का उल्लेख किया है वे संक्षिप्त रूप में इस प्रकार हैं : चिंतन और लोकव्यवहार की प्रौढ़ता की अभिव्यक्ति, इतिहास, परंपरा और सामाजिक नियति का बोध, भाषा या शैली में साधारणीकरण, दृष्टिकोण की उदार और व्यापक ग्रहणशीलता, सार्वभौमिकता। प्राचीन क्लासिकों ने अपना कार्य साहित्य, सामाजिक जीवन और चिंतन की महान्‌ परंपराओं के संदर्भ से संपन्न किया। नियो-क्लासिकल साहित्यकारों में भी यह बोध था, किंतु उनके सामने ये महान्‌ संदर्भ नहीं थे। नियो-क्लासिसिज्म ऐसे युग की उपज है जब समाज किसी विकास के दौर से गुजर कर जड़ता की स्थिति में आ जाता है, जब वह बंद गली के छोर पर पहुँचकर रुक जाता हैं। ऐसे समय साहित्य में वस्तु का स्थान गौण और रूप का स्थान प्रधान हो जाता है। यह रूपाशक्ति साहित्य में रूढ़ि या रीतिवाद की अत्यंत उर्वर भूमि है। यह आश्यर्च की बात नहीं कि पश्चिमी यूरोप के सांस्कृतिक संकट के इस युग में अंग्रेजी और अन्य साहित्य में निया-क्लासिसिज्म का पुनरूद्धार हुआ। आधुनिक अंग्रेजी कविता के प्रसिद्ध प्रवर्तक और सिद्धांतकार एजरा पाउंड टी. ई. हुल्श और टी. एस. ईलियट ने रेनेसाँ की मानवतावादी परंपरा के आधार पर विकसित रोमंटिक साहित्यधारा की तुलना में १८वीं सदी की नियो-क्लासिकल अंग्रेजी कविता को अधिक महत्व दिया है। हुल्श के अनुसार ‘मनुष्य असाधारण रूप से स्थित और सीमित जीवधारी है, जिसकी प्रकृति सर्वथा अपरिवर्तनीय है। केवल परंपरा और संगठन के द्वारा ही उसके हाथों किसी अच्छी चीज का निर्माण हो सकता है’। ‘मनुष्य अनंत संभावनाओं का स्रोत है’। -इस रोमंटिक आस्था को मानसिक व्याधि और इसलिये त्याज्य बतलाते हुए उसका कहना है : ‘मेरी भविष्यवाणी है कि शुष्क, कठोर, क्लासिकल कविता का युग आ रहा है’। जिसमें कल्पना से अधिक महत्व चित्रकौशल (फ़ैंसी) का होगा। इस प्रकार रोमांटिसिज्म और क्लासिसिज्म का संघर्ष केवल साहित्यिक संघर्ष ही नहीं बल्कि राजनीतिक और सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति प्रगति और रूढ़ि के दृष्टिकोणें का संघर्ष भी है।

[संपादित करें]भारतीय क्लासिक साहित्य

‘क्लासिक’ की रूढ़ परिभाषा के अंतर्गत यूनानी और रोमन साहित्य और उनके परिप्रेक्ष्य में यूरोपीय साहित्य की ही चर्चा ऊपर की गई है। उपर्युक्त साहित्य के संदर्भ में ह्यूम ने यह प्रश्न उठाया कि होमर आज से हजार-दो हजार साल पूर्व रोम और एथेंस पढ़े जाते थे और आज भी वे लंदन और पेरिस में पढ़े जाते हैं। अनेक विभिन्नताओं और परिवर्तनों के होते हुए भी आज तक उनका महत्व बना हुआ है इसका क्या कारण है? इस प्रश्न के उत्तर में यह अनुभव किया गया कि जो साहित्य काल की कसौटी पर खरा उतरे वही ‘क्लासिक' है। अतएव अब यह समझा जाने लगा है कि क्लासिक साहित्य वह है जिसमें जीवन के उन तत्वों का समावेश निश्चित रूप से हो जिनकी उपयोगिता और सार्थकता प्रत्येक युग और देश के लिये अपरिहार्य है।
भारतीय साहित्य को ‘क्लासिक’ की इसी परिभाषा की दृष्टि से देखा जा सकता है। इस दृष्टि से देखने पर रामायण और महाभारत तो क्लासिक की कोटि में आते ही हैं। संस्कृत के अनेक काव्यों और महाकाव्यों की गणना उसके अंतर्गत की जा सकती है।कालिदास का समग्र साहित्य अपने आप में क्लासिक है किंतु ‘रघुवंश’ और ‘अभिज्ञान शाकुतंल’ सर्वोपरि हैं।
हिंदी का साहित्यिक इतिहास अभी कुछ ही सौ बरसों का है। इस बीच जिस प्रकार का साहित्य रचा गया उसने अधिकांशत: संस्कृत के साहित्यशास्त्र के उन्हीं केंद्र बिंदुओं को अपनाया जिन्हें रस, ध्वनि, वक्रोक्ति, रीति और अलंकार कहते हैं। इस काल के लेखकों के प्रेरणास्रोत थे संस्कृत के ह्रासोन्मुख साहित्यिक आचार्य। अत: उस काल में ऐसा बहुत नहीं है जिसे क्लासिक कहा जाय। अकेले तुलसीदास के रामचरितमानस को इस कोटि में रखा जा सकता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने यों सूर और जायसी की रचनाओं का क्लासिक माना है। निओ-क्लासिक के रूप में प्रेमचंद के गोदान और जयशंकर प्रसाद की ‘कामायनी’ की गणना की जा सकती है।

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GHAZIABAD, Uttar Pradesh, India
कला के उत्थान के लिए यह ब्लॉग समकालीन गतिविधियों के साथ,आज के दौर में जब समय की कमी को, इंटर नेट पर्याप्त तरीके से भाग्दौर से बचा देता है, यही सोच करके इस ब्लॉग पर काफी जानकारियाँ डाली जानी है जिससे कला विद्यार्थियों के साथ साथ कला प्रेमी और प्रशंसक इसका रसास्वादन कर सकें . - डॉ.लाल रत्नाकर Dr.Lal Ratnakar, Artist, Associate Professor /Head/ Department of Drg.& Ptg. MMH College Ghaziabad-201001 (CCS University Meerut) आज की भाग दौर की जिंदगी में कला कों जितने समय की आवश्यकता है संभवतः छात्र छात्राएं नहीं दे पा रहे हैं, शिक्षा प्रणाली और शिक्षा के साथ प्रयोग और विश्वविद्यालयों की निति भी इनके प्रयोगधर्मी बने रहने में बाधक होने में काफी महत्त्व निभा रहा है . अतः कला शिक्षा और उसके उन्नयन में इसका रोल कितना है इसका मूल्याङ्कन होने में गुरुजनों की सहभागिता भी कम महत्त्व नहीं रखती.